01 दिसंबर 2013

काचूर छोड़ता आदमी...

सांप की ही तरह
आदमी भी छोड़ता है काचूर ...
कभी धन-सम्पदा
कभी मान-प्रतिष्ठा
कभी कभी तथाकथित
विद्वता का...पारदर्शी काचूर ...

काचूर छोड़
सांप देह से उतार देता है
अपने अस्तित्व का एक हिस्सा....

और आदमी
ओढ़े रखता है
अपने अंहकार को
काचूर की तरह....

सुना है कचुराल सांप
डंसने से बचता है
पर कचुराल आदमी
डंसता रहता है
अपना-पराया
सबको....


वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर अरुण साथी ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। ...