22 दिसंबर 2013

बैंगन बेचबा गांव

जब भी कहीं रिश्तेदारी में गया लोग मेरे गांव (शेरपर) के बारे में यही कहते थे कि मेरा गांव तो बैंगन बेचबा गांव है। इसको लेकर चिढा़ते भी थे। कहते थे कि जब मेरे गांव कुटूम-नाता जाता है तो वहां के लोग बैंगन के खेत में काम करते ही नजर आते है और जब उनसे पूछा जाता है तो वे इस प्रकार जबाब देते है-
‘‘रिश्तेदार-क्या हाल चाल है कुटूम?’’
‘‘किसान-जी बैंगन में बहुत बीमारी लगल है।’’
‘‘रिश्तेदार-और घर-परिवर सब बढ़िया?’’
‘‘किसान-हां जी बैंगन इस साल कनाहा हो गया है।’’
समय बदला, अब मेरे गांव में बैंगन की जगह फूलगोभी की खेती होती है जिससे किसान अच्छी कमाई करते है। फूलगोभी किसानों के लिए वरदान की तरह है। एक बीघा फूलगोभी लगाने वाले किसान तीस से साठ हजार छः माह में कमा रहे है। सोंचता हूं मेरे गांव के पुर्वज बहुत समझदार होगें जो सब्जी की खेती करना बर्षों पहले सीख लिया था...


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (23-12-13) को "प्राकृतिक उद्देश्य...खामोश गुजारिश" (चर्चा मंच : अंक - 1470) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. अरुण जी, आपके गाँव का फुचर ब्राईट है... मेरे ख्याल से आने वाले समय में किसान नकदी फसल से ज्यादा बागवानी में कमाएंगे.

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