28 अप्रैल 2014

भगजोगनी

(केजरीवाल को समर्पित)

अमावस की रात
धुप्प अंधेरी
हाथ को हाथ नहीं दिखता
वैसे में
एक भगजोगनी
सूरज से कम नहीं लगती....
टिमिर टिमिर जलकर
वह दिखाती है राह...
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पर जब वह
आहिस्ते से आकर
बैठती है देह पर
तो चटाक से हम उसे
कुचल देना चाहते है....

आखिर है तो वह
एक कीड़ा-मकोड़ा ही न...

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सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...