06 नवंबर 2014

बिना बुर्का की मुस्लिम महिलाएं प्रगति की निशानी


ताजिया पहलाम में दो बातों की तरफ मेरा ध्यान गया । एक मुस्लिम समाज के उत्थान तो दूसरा पतन का परिचायक है । पहला यह की ताजिया पहलाम में बड़ी संख्या महिलाएं शामिल थी वो भी वगैर बुर्का के । यह एक बड़ा बदलाव है । बुर्का महिलाओं के मानवाधिकार का हनन है औए इस बदलाव को देख अच्छा लगा ।महिलाओं बुर्का को मैं दमन की निशानी मानता हूँ जो पुरुषवादी समाज धर्म की आड़ में जबरन महिलाओं पे थोप देता है । आधुनिक युग में महिलाओं की स्वतंत्रता ही नयी पीढ़ी को नया रास्ता दिखाएगी , उसे नयी उर्जा और नए मंजिल का पता बताएगी । जिस समाज में भी महिलाओं का दमन है वह अपना विनाश ही करता है ।

इसी तरह पतन के रूप में देखने को मिला की जिस इस्लाम ने शराब को हराम बताया उसी में ताजिया के दौरान कई युवा शराब के नशे में झूम रहे है...
हिन्दू समुदाय के पर्व होली, दशहरा का नाश शराब ने कर दिया । होली में अब बिना शराब पिए लोग सड़क पे नहीं निकलते क्यूँकि सभी नशे में धुत्त होते है और इस तरह हमारी सभ्यता और संस्कृति का नाश शराब कर रही है । आज मुस्लिम समाज में भी यही दिखा ।

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