04 जनवरी 2015

‘‘ नमन उस स्वतंत्रता सेनानी को जिन्होंने देश भक्ति नहीं बेचीं"

(अरूण साथी)
आज उस महान स्वतंत्रता सेनानी श्रीकृष्ण मोहन प्यारे सिंह उर्फ लाला बाबू की 115वीं जयंती है जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन यह कहते हुए ठुकरा दी थी कि ‘‘ देश भक्ति बेचने की चीज नहीं है, मैंने जेल में यंत्रणाएं इसलिए नहीं सही थी कि कभी इसका दाम बसूलूंगा।’’ गांधी जी के सच्चे भक्त वही थे और गांधीवाद को अपने जीवन में उतार कर सादगी और जनसेवा को जीवन का मूल बना लिया। 
वे अनगिनत छात्रों को पढ़ाई के लिए प्रतिमाह निश्चित राशि देते थे और जब उनके शुभचिंतकों ने उनसे एक ट्रस्ट बना कर ऐसा करने की बात कही तो वे इसका विरोध करते हुए बोले ‘‘यही षड़यंत्र बनाते है आपलोग। मैं उपकार की दुकान खुलबाउं और यश बटोरू! कैसे सोंच लिया आप सब ने यह सब। मुझे अपने तरह से जीने दिजिए।’’
उनके द्वारा बरबीघा का श्रीकृष्ण रामरूची कॉलेज सहित पूरे बिहार में कई हाई स्कूल और अस्पताल की स्थापना की गई। आज उनके द्वारा स्थापित श्रीकृष्ण रामरूची कॉलेज का जो हाल है निश्चित ही उनकी आत्मा रोती होगी, क्यांेकि वे कहते थे ‘‘ मेरे मरने के बाद मेरी लाश फेंक दी जाय, मुझे दुख नहीं होगा। उसे कुत्ते ले जायें, मुझे शोक नहीं होगा पर यदि मेरी यह प्यारी संस्था लड़खड़ा जायेगी तो मरणोपरांत भी मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।’’      
लाला बाबू ने अपनी सारी संपत्ति अपने भाई को दान में दिया और राज्य सभा सदस्य रहकर भी फकीर ही रहे और अंतिम समय में उनकी मुफलिसी के किस्से सुन कर आंखों से आंसू आ जाते है। कैसे कोई ऐसे दधीची के लिए निष्ठुर हो सकता है? खैर लाला बाबू आज भी इसलिए ही अमर है। नमन है उस सच्च संत को..

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