12 अप्रैल 2020

कोरोना महामारी और ढीठ समाजसेवी

अरुण साथी
समाज सेवी बनना कोई हंसी ठठ्ठा नहीं है। जान हथेली पर रखकर समाजसेवी बनना पड़ता है। इतना ही नहीं, इसके लिए बहुत ढीठ भी बनना निहायत ही आवश्यक है। उनका क्या, जो लोग पेड़ा भी छील छील कर खाते हैं। वे तो उपदेश देंगे ही। घर में बैठे जो रहते हैं।

तुम क्या जानो चुन्नी बाबू। जान हथेली पर रखना क्या होता है। कोरोना नाम वायरस जैसे खतरनाक महामारी में गांव गांव जाकर भीड़ इकट्ठा करना और उनको एक साबुन अथवा एक मास्क अथवा एक किलो राशन अथवा एक किलो आलू हाथ में देना। सामाजिक दूरी के बगैर बगल में खड़ा होना। मास्क मुंह के बजाय फोटो खिंचाते वक्त गले में लटका लेना क्या होता है!


वैसे तो समाजसेवियों की कई श्रेणियां हैं परंतु कुछ का उल्लेख जरूरी है।

गुमनाम समाजसेवी 

इस श्रेणी में वैसे समाज सेवी आते हैं जो चुपचाप ईश्वर सेवा मानकर समाज की सेवा करते हैं। इस श्रेणी में भी कुछ लोग हैं। 

छपास समाजसेवी 

इस श्रेणी में वैसे समाज सेवी आते हैं जो  छपास भाव से सेवा करते हैं। पहले एक बढ़िया स्मार्ट मोबाइल रखना पड़ता है। फिर फोटो खींचने और वीडियो बनाने वाले एक अनुभवी व्यक्ति को भी साथ रखना होता है। और फिर समाज सेवा के लिए जाना पड़ता है। इस श्रेणी में राजनीतिज्ञ अधिक पाए जाते है।

ढीठ समाजसेवी 

इस श्रेणी में वैसे लोग हैं जिनकी हिम्मत की दाद देनी होगी। ये लोग बाजार से दस-बीस लाइफबॉय साबुन अथवा मास्क खरीदते हैं। फिर एक साबुन देने के बाद एक फोटो खिंचवाते है। उसे सोशल मीडिया पर ऐसी लगाते हैं जैसे यह नहीं होते तो दुनिया पलट जाती। 


प्रवचनकर्ता समाजसेवी

इस श्रेणी में कई संत, महात्मा और लोक-परलोक विजेता समाजसेवी आते हैं। जो प्रवचन देते हैं। वीडियो भी बनाते हैं । ये अमीर घर का वीडियो बनाकर कहते हैं कि फोटो लेने वाले से राशन नहीं लेंगे। ये उपदेश देते हैं की सेवा करना है तो फोटो खींचना क्या जरूरी है। 

इनको भूख के बारे में पता नहीं होता। परंतु भूख पर कई साल प्रवचन दे सकते। मघ्घड़ चाचा कहते हैं भाई जिसको भूख लगी हो वहां जाकर देखिए। दिन भर धूप में खड़ा कर दीजिए। पांच किलो अनाज दीजिए । तब भी उन्हें मंजूर है । ऐसे ही यदि दोनों की भूख मिट रही है तो मिटने दीजिए। किसी को समाज सेवी कहलाने की भूख है। तो किसी को पेट की आग बुझाने की भूख।

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