भले लोग बहुत हैं
यह ट्रक की सवारी का चित्र है। पिछले दिनों मोकामा से घर आना था। इस मार्ग में आज भी यात्री वाहन कम ही चलते हैं। संध्या का समय था। मेरे मित्र अभय जी हमेशा यहां से अपने घर ट्रक अथवा किसी से भी सहयोग लेकर ही पहुंचते हैं। उनका प्रयोग मैंने भी आजमाया। एक दो को हाथ दिया । गाड़ी नहीं रुकी।
फिर एक को हाथ दिया। ट्रक सामने नहीं रुका। थोड़ी दूर जाकर रुका। दौड़ कर चढ़ गया। अंदर दो लोग थे। आत्मीयता से स्वागत किया।
"कहां जाना है?"
"बरबीघा"
"मैं सरमेरा जाऊंगा..।"
"ठीक है, वहीं उतार दीजिएगा..।"
बैठ गया। फिर बातचीत शुरू किया। क्या नाम। कहां घर। आदि इत्यादि। औपचारिकता। चालक के बगल में बैठे व्यक्ति ने अपना नाम शायद संजय बताया। घर नालंदा जिला के परवलपुर के सोनचरी।
हम बिहारी साधारणतः नाम, अथवा पिता का नाम पूछ कर उपनाम से जाति का पता करते है। और यदि यह जुगत काम न आए तो गांव का नाम से भी जाति का पता लग जाता है।
सो, मेरे गांव का नाम शेरपर जान कर उन्होंने अपनी रिश्तेदारी बताई। मैंने उनके गांव का नाम जानकर, अपने रिश्तेदार का परिचय दिया। और इस तरह, बिना पूछे दोनों एक दूसरे के स्वजातीय का आत्मसात कर लिए। किसी ने किसी से स्पष्ट रूप से जाति नहीं पूछी!
खैर यात्रा आगे बढ़ी, तो नया बिहार, पुराना बिहार, जंगलराज, संघर्ष और विकास के साथ साथ उद्योग और रोजगार, सबकुछ विमर्श का केंद्र बिंदु रहा।
चर्चा कि शुरुआत मैंने ही किया। अपनी मातृ भाषा, मगही में।
पूछा, "कहाँ से आ रहलो..?"
"नेपाल के वीरपुर से।"
"कौची लादले हो.."
"रिफाइन तेल हो.."
इस वार्ता में उन्होंने बताया कि अजीब अर्थव्यवस्था है। बताया कि कुछ केमिकल है जो बिहार से नेपाल जाता है और नेपाल में तेल बनता है फिर उसे बिहार और झारखंड इत्यादि में बेचा जाता है। वह समझाने की भी कोशिश कर रहे थे कि यह सब चीज बिहार में भी बन सकता है, परंतु नहीं बन रहा है।
यह भी बताया कि वह 1995 से ही गाड़ी चला रहे हैं। कमाने खाने में लाज कैसा..?
बताया कि पहले कहीं भी कोई रोक कर लूट लेता था, मारपीट करता था। आज यह सब नहीं होता है। सड़क की भी बहुत बिहार में अच्छी हो गई है। हालांकि पुलिस की वसूली पहले जितनी तो नहीं होती, परंतु अभी भी यह जारी है।
एक प्रसंग में बताया कि वह लखीसराय जिला के बड़हिया से सन 2000 में गाड़ी चला कर आ रहे थे तो उनकी गाड़ी को दबंगों ने पकड़ लिया और फिर खेत में ले जाकर उससे एक सप्ताह तक फसल की ढुलाई करवाता रहा और फिर जाने दिया।
खैर, मैं सरमेरा में उतर गया। हालांकि अनुभव नहीं होने की वजह से उतरने के क्रम में धड़ाम से सड़क पर गिर गया, बगल में खड़ी कुछ महिलाएं हंसने लगी।
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