अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने क्या लिख दिया!
इसे शब्दों में लिख पाना कठिन है। हाँ, जो महसूस हुआ, वह बेहद विचलित करने वाला है। इस महीने में पढ़ा गया यह एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम-प्रसंग के माध्यम से उपनिषद के ज्ञान को जिस सहजता से रख देता है, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
कुछ प्रसंग यहाँ रख रहा हूँ। इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि शायद कोई इसे पढ़कर इस पुस्तक को खरीदने और पढ़ने के लिए प्रेरित हो जाए।
पुस्तक में संन्यास आश्रम से बड़ा गृहस्थ आश्रम बताया गया है।
पढ़ते-पढ़ते समझ आया कि गृहस्थ जीवन निकृष्ट जीवन नहीं है।
आत्मा के प्रसंग में लिखते हैं—
“आँख क्या है? देखने का साधन है। जो देख रहा है, वही आत्मा है।”
“एकांत का ताप बड़ा तप नहीं है।”
"विवाह के माध्यम से पुरुष और स्त्री पूर्णता प्राप्त करते हैं और संसार के सबसे बड़े लक्ष्य—प्रेम—को प्राप्त करते हैं।"
“किसान की स्त्री हूँ, भीख नहीं माँग सकती...?”
“पति की कामना के लिए पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना के लिए पति प्रिय होता है!”
“पत्नी की कामना के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती, अपने आत्मा की कामना के लिए पत्नी प्रिय होती है!”
एक जगह संवाद है—
“आप बिना परीक्षा किए ही कोई बात मान लेते हैं? विचित्र है। यह तो नेयता हुई। यही शूद्र धर्म है।”
यहाँ एक और बात मन को छूती है—
“कोई चिंता नहीं। रास्ता ही रास्ता बता देता है। कुछ करते-करते ही सही ढंग सीखा जा सकता है।”
वर्तमान राजनीति के लिए भी संवाद है,
"तपस्या और स्वाध्याय के क्षेत्र में राजा का किसी प्रकार का दबाव धर्मसंगत नहीं है।"
विवाह के एक प्रसंग में (दहेज) के संदर्भ में संवाद आता है—
“धन-संपत्ति तो छोटे लोगों में देखी जाती है, ब्राह्मण लोगों में तो विद्या और ज्ञान देखा जाता है।”
और प्रेम...
एक ऋषि कुमार अपनी प्रेयसी जबाला का ध्यान करके ही ध्यानस्थ हो जाता है। बस...
जानश्रुति शूद्र राजा थे—यह भी आभास हुआ कि शूद्र भी राजा होते थे।
यह भी समझ आया कि उपनयन संस्कार गुरु अपने शिष्यों का करते थे और इसका जाति से कोई संबंध नहीं था।
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