11 मई 2014

भस्मासुरी मीडिया को कौन रोकेेगा?

जब किसी वीजेपी समर्थक अपनी ही पार्टी के नेता मोदी को लगातार दिखाए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहे कि ‘‘यह तो गेन्हा गया’’ तो समझा जा सकता है न्यूज चैनल पतन की पराकाष्ठा पार कर चुकें है मेरे जैसे आपके आस पास यह कहते हुए कई मिल जाएगें कि ‘‘मैने न्यूज चैनल देखना बंद कर दिया है सिर्फ एक ही नेता को दिखाते रहते हैैं।’’

  यह सब क्या है? बात जब संविधान प्रदत्त अधिकार की आती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरी माना गया है और इसी अधिकार का दुरूप्योग आज कॉपोरेट मीड़िया घराना और मीडिया के आड़ में छुपे भ्रष्टाचारी कर रहें है। वेशक इसमें न्यूज चैनलों ने बाजी मार ली है पर अखवारों नें भी इसी राह पर चलना श्रेष्यकर समझा।

निश्चित रूप से इस सब के पीछे पूँजीबाद है। पूँजीवादी व्यवस्था कभी भी लोकतंत्रिक और जनपक्षी नहीं हो सकती और इसलिए आज कॉरपोरेट घराना कमर बांध कर मोदी को प्रोजेक्ट करने में जुटे और सफल हुए। आज किसी चैनलों, अखबारों और पत्रिकाओं में नरेन्द्र मोदी का विज्ञापन पूँजीवादी व्यवस्था का सर्वोत्म उदाहरण है और इसका वाय-प्रोडक्ट के रूप में सुबह से शाम तक मोदीमय हुए न्यूज चैनल लोकतंत्र को लीलने के लिए व्याकुल दिखता है।

जिस तरह से न्यूज चैनल आज मोदीमय है उसी प्रकार से अन्नामय और राहुलमय होना भी निन्दनीय है। केजरीवाल को लेकर लगातार कवरेज और आज हाशिये पे उनको ढकेलना सवाल खड़े करते हैै?

ऐसा नहीं है कि भगत सिंह सरीखों को पैदा करने वाली रत्नगर्भा भारत माँ की कोख आज बांझ हो गई है पर यह भी सच है कि ऐसे सपूत भी पूँजीवादी जाल में उलझ कर दम तोड़ रहें है।
    आने बाले दिनों में भले ही इस देश का प्रधानमंत्री कोई बनें पर एक बात तो तय है मीडिया रूपी भस्मासुर से लोकतांत्रिक शिव को बचानें के लिए किसी न किसी को तो मोहनी रूप धारण कर आना ही होगा हमे तो उसी का इंजतार है और तभी हम कहेंगें सच्चे मायनों में  अच्छे दिन आने वाले है।

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर अरुण साथी ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। ...