26 सितंबर 2014

नवरात्री, गेरूआ और डायन



नवरात्री की रात को बिहार के गांवों में गेरूआ प्रवेश कर जाता है। गेरूआ को गांव के लोग अशुभ मानते है और इसमें कोई शुभ काम नहीं किया जाता। यहां तक की नया वस्त्र अथवा किसी नये सामान का उपयोग नहीं किया जाता है। इसमें बाल और दाढ़ी बनाने को भी अशुभ माना जाता है। 
यह एक ऐसी परम्परा है जिसे अंधविश्वास कहा जा सकता है। गेरूआ को लेकर मान्यता है कि इसमें डायन और ओझा सब दुर्गा और काली का अनुष्ठान करते है। इसी से बचने के लिए हर घर में महिलाऐं नजर लगने से बचाने का उपाय करती है। इसके तहत घर के बाहरी दिवाल को गोबर से लकीर बना कर बांध दिया जाता है और दरवाजे पर काले मिट्टी का बर्तन फोड़ कर रख दिया जाता है और टोटो-माला बांध दिया जाता है।
टोटो-माला काले कपड़े से महिलाऐं बनाती है जिसमें बालू, मिर्च, लहसून, काला और पीला सरसे तथा रैगनी का कांटा डाल कर एक थैली नुमा बना दिया जाता है। इस टोटो माला को बच्चे के गले में लटका दिया जाता है। इतना ही नहीं लोग मवेशियो के गले में भी इसे लटका देते है ताकि इनको नजर लगने से बचाया जा सके। किसान आपने खेतों में भी यह टोटका करते है..
रात्री में बच्चों के आंखों में काजल लगा दिया जाता है और बड़ों को नाभी में काजल लगा कर नजर लगने से बचाने का उपक्रम किया जाता है। 
आज हम आधुनिक युग में जी रहे है। एक तरफ हम मंगलयान को मंगल ग्रह पर पहूंचा रहे है तो दूसरी तरफ इस तरह के अनुष्ठान अंधविश्वास के अतिरिक्त कुछ नहीं।
इस अंधविश्वास को लेकर मुझे बचपन की एक घटना याद आ जाती है। बचपन में गांव में एक महिला को डायन कहा जाता था और वह मेरे मित्र की मां थी। गेरूआ प्रवेश करते ही फुआ, बचपन से इसी के पास रहा हूं,  मुझे उसके घर जाने पर बहुत पीटती थी पर मैं अपने मित्र के पास बिना किसी डर के चला जाता था। उसकी मां मुझे बड़े लाड़-प्यार से कुछ खाने के लिए देती थी तो मैं पहले बाल सुलभ डर से डर जाता था फिर भी दोस्त की मां का दिया खाना खा लेता था। मेरी फुआ मुझे पीटते हुए कहती थी गेरूआ प्रवेश करते ही डायन बच्चों का कलेजा निकाल कर खा जाती है। इतना ही नहीं जागरण की रात में डायन के शमशान में नंगा होकर नाचने और बच्चों के गड़े मुर्दे उखाड़ कर अनुष्ठान करने की अफवाह आज तक फैली हुई है।
मुझ तक भी यह अफवाह बचपन में पहूंची थी तब मैं दशवीं का छात्र था और मैं बचपन में एक जागरण की रात बारह बजे अपने दो तीन दोस्तों के साथ शमशान पहूंच कर इस अनुष्ठान को देखने चला गया। उस डरावनी रात में सभी दोस्तों का कलेजा हल्की सी आवाज पर मुंह में आ जाती। डर से सभी दोस्त थरथर कांप रहे थे पर शमशान से थोड़ी दूर रात भर डायन के आने का इंतजार करता रहा, पर कोई नहीं आई।
मैं आज भी दोस्त की उस मां का प्रणाम करता हूं तो वह अन्र्तमन से आर्शीवाद देती है और जब जब गेरूआ आता है मुझे बचपन की बातें याद आ जाती है। सोंचता हूं कि यह अंधविश्वास जाने कब पूरी तरह से खत्म होगा..

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे ............................... एक महीने के भीतर फिर एक पत्रकार मारा गया है. इस बार बुरी ...