08 नवंबर 2016

पत्रकारिता मरी तो लोकतंत्र भी मर जायेगा...

Ndtv पे प्रतिबंध हटाये जाने से कुछ लोग खुश है और कुछ दुखी।  ndtv पे एक दिन का प्रतिबंध लगाए जाने से बहुत लोग बहुत खुश भी थे।

स्वाभाविक है, कुछ लोग गुजरात दंगे पे आज भी खुश होते है। खैर सबकी अपनी-अपनी मानसिकता है। हाँ थोड़ा दुःख है कि कुछ पत्रकार मित्र भी ndtv पे बैन से खुश थे। (सरदाना को पत्रकार नहीं कहा जा सकता..)
कुछ बातें कहने से पहले यह साफ़ कर दूँ की मैंने बैन का विरोध किया, इसका मतलब यह नहीं कि एनडीटीवी के पूर्वाग्रही पत्रकारिता का समर्थन करता हूँ। मैंने कई बार ndtv और रविश कुमार की पत्रकारिता की आलोचना की है।

खैर, कुछ लोग कहते है कि यह एक सहज प्रतिबंध था, मीडिया का आपातकाल नहीं! सही कहते है। यह मीडिया का आपातकाल नहीं था, यह आपातकाल का एक छोटा सा प्रयोग था। राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटी हुयी। यह प्रयोग जन  दबाब में असफल हुआ। भारत यही है। विश्व में भारत का मान इसी से है। भारत सेकुलर राष्ट्र इसलिए है कि भारतीय (बहुसंख्य) सेकुलर है।

खैर, आज ndtv को पूर्ण बैन करने की मांग करने वाले भी बहुत है, होंगे ही। वही लोग बैन के खिलाफ लिखने पे ट्रोल कर रहे थे। स्वाभाविक है उनको ये बाते अच्छी नहीं ही लगेगी। उनके लिए जी न्यूज़ सर्बश्रेष्ठ है पर यही यदि काँग्रेस की सरकार उस समय जी न्यूज़ पे बैन करती तो शायद प्रतिक्रिया यही होती, जो मेरी थी।

एक बात और साफ कर दूँ कि बहुत लोग पत्रकारिता पे प्रश्नचिन्ह लगा रहे है, लगनी भी चाहिए। यह हमारी उदारता है कि हम समाज तो गन्दा रखेंगे और दूसरे से इसे साफ़ रखने की उम्मीद! फिर भी मैं इस राय का हूँ कि लाख पतन के बाद भी पत्रकारिता अभी जिन्दा है। जिस दिन पत्रकारिता मरी, उसी दिन देश में लोकतंत्र मारेगा।।

दूसरी बात यह की बैन के बहाने न्यूज़ चैनलों को आत्ममंथन का अवसर मिला है। ndtv बिलाशक पूर्वाग्रही पत्रकारिता करती है। रविश कुमार को नरेंद्र मोदी से नफरत है, यह कैमरे के सामने दिखता है। ठीक उसी तरह जैसे जी न्यूज़ वाले प्रवक्ता पत्रकारिता करते है। सरदाना का मोदी भक्ति कैमरे से सामने मुखर होता है। आज हम कह सकते है कोई मीडिया हॉउस विश्वसनीय नहीं है। कोई इसके तो कोई उसके सापेक्ष है। निरपेक्ष कोई नहीं।

रामनाथ गोयनका अवार्ड देते हुए प्रधानमंत्री ने एक तीखी बात कही थी। उन्होंने कहा कि आज भारतीय मीडिया विश्वसनीय नहीं है। इसके लिए लोग विदेशी मीडिया हॉउस की तरफ देखते है, हमें विश्वसनीय बनना होगा। आज के सन्दर्भ में शायद ही यह हो।

और अंत में
आखिर ऐसा क्यों है कि आज पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने पे वह लोग हंगामा नहीं करते जो मनमोहन के समय में करते थे! सर्जिकल स्ट्राइक पे तो सभी लोग सीना छपन्न कर लिया पर आज भी रोज जवान शहीद हो रहे तो छाती पिचुक क्यूँ नहीं जाती...! आज भी तो दाल मंहगी है...फिर ॐ शांति क्यूँ? मतलब साफ है, आप भगवा पार्टी के प्रवक्ता है...आम आदमी नहीं...!

(ख़बरदार जो किसी ने आम आदमी के नाम से केजरीवाल का नाम जोड़ा, खून पी जाऊंगा।।। श्रीमान अभी करोड़ों से खेल रहे है)

(नोट:- पोस्ट पे अपनी राय दें, ट्रोल न करें। वैसे ट्रोल वालों को रविश ने कहा था "ओ आप ट्रोल है। नेताजी का लठैत।")

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...