06 नवंबर 2016

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है..

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है
(अरुण साथी)

गजबे बात हो, खेलाबन काका आज भारी गरम हका!! कहे..कि गांव के चंदू चाचा के दालान पर जे चौकड़ी लगल हे, ओकरा में नायका लड़का सब गर्गदह मचईले हल। सब नमो नमो के जय जय करो हल। खेलाबन काका धान काट के आ रहला हल। हाथ में हँसुआ अ माथा पर हरियर धान। फुदकना टोक देलक-

"का हो काका, नाइकी बहुरिया के नाईका चूड़ा खिलाबे के जोगाड़ कर देल्हो..?"

सब के पता हल काका भड़क जईता "तोहर बाप के की लगो हाउ।" ऊ बोझा पटक के भांजे लगला।।

खैर, इहे बीच हाथ में टीवी वाला मोबाइल लेले, पॉकेटमार काट बाल कटइले। (जिसे विराट कट आज कहा जाता है वह पहले पॉकेटमार के पकड़े जाने पे इसी तरह आधा माथ मुड़ा दिया जाता था) मसुदना के लफुआ बेटा गरजे लगल।

"ठीक होलो, ई पाकिस्तानिया चैनल पर इमरजेंसी लगा देलक। जब खोलहो त विरोधे में बोल रहल हें। भला बोलहो! ई कउनो बात होल। विरोधे करे के हो त राजनीति करहो, न्यूज़ चैनल काहे..!!

इतनै में झपुआ टोक देलक "हम तो कहो हियो ई इमरजेंसी ठीके हइ। ई सब ऐसे सुधरे वाला नै हो। चौहत्तर में जे इमरजेंसी लगल हल सुनो हूँ बड़ी अच्छा हल। भ्रष्टाचार बंद। अपराध बंद। केकर मजाल जे खोंख दे, तुरंत अंदर...।"

खदेड़ना बोल बैठल "एनकाउंटर सही हो तब सलाम, फर्जी हो तब लाखों सलाम। ई देश में एसहि कर दहो सबके काम तमाम।"

"हाँ हो, से तो ठीके कहलहीं, ई देश में बड़ी उमताहा सब बैठल हई। कोई पाकिस्तान जिंदाबाद करो हई, कोई भारत के टुकड़ा करो हई। मने जेकर जे मर्जी करे लगो हई। भला बोलहो ई कौन बात होल। ई देश के सुधार करे ले हिटलर के जरुरत है, फाइनल।।"खेसारी भी बोल देलक।

इतनै में काका टोक देलका
"चार दिन के लौंडा ससुर, इमरजेंसी के बात करे हें। तोरा की पता की आज़ादी की होबो हई। गुलामी देखलहिन हैं नै तब? अरे प्रजातंत्र हई तब सब के आज़ादी हई। जेकर मन जे करे। अब कोई बाल बच्चा ख़राब हे त ओकरा कोई बाप मार देहै!"

"हाँ काका, बगैर हिटलर ई देश नै सुधरतो। एकदम ठीक हो रहलो हें। ई विरोधिया सब अनाप-शनाप बोलते रहो हई।" कई लोग सुर में सुर मिला देलक।

काका में माथा जोर-जोर से घूमे लगल। सांय सांय के आवाज आबे लगल, हिटलर, हिटलर, हिटलर....काका के माथा में इमरजेंसी के दिन घूमे लगल। घर से उठा के पुलिस थाना ले गेल और उल्टा लटका के धो देलक हल, एक साल जेल में बंद रहला। आज तक पता नै चलल की उनका गलती की हल। पुलिस भी तब हिटलर बोलो हल अपना के..बाप रे..!

" ई प्रजातंत्र हई बउआ, एकरा में विरोधी के जगह देल जाहै। सब तोरे नियर "मन के बात" कहे करतौ। भाटगिरी औ चारणी सब नै करो हई। कोय कोय होबो हई जे सच बोले के, सच लिखे के बीमारी के मरीज होबो हाइ.. ओकरो रहे दहो...हाँ, बाकि ई देश में अब पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुसलमान इहे सब मुद्दा हो...हमर घर में अबरी छठ पर्व में मँहगा रहे से बूंट के दाल नै बनलो !! एकर कोय चिंता हो, इहो धर्म हई। उपजा देलियो औ धान खरीदे वाला कोई नै, बेटा बेरोजगार घर बैठल हई। रेलवे में नौकरी ले दस लाख मांग रहल हें..मने के ई कैसन अच्छा दिन आल समझे में नै आबे हे..बाकि हिटलर हो की औरंगजेब सब के भक्त होबे करो हइ, दुनिया एसहि चलो हई, चले दहो..!!! गाते रहो #बागों_में_बहार _है। हमको कट्टरता से प्यार हे। प्रजातंत्र बेकार है। नमो नमो जयकार है। मन की बात ही समाचार है। बाकी सब न्यूज़ बेकार है। डर के रहो, राजा सरदार है। राष्ट्रवाद सा नाजी हथियार है। आपातकाल आने को तैयार है।

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...