02 मई 2018

कलयुगी विद्या: चने की झाड़ पे चढ़ाने की कला और कलाकार

आजकल चने की झाड़ पे चढ़ाने का जमाना है। इसके कई फायदे है। पहला तो यही की, चने के झाड़ पे चढ़ाने के लिए बहुत कुछ तामझाम नहीं करना पड़ता है। मेहनत एक फायदे अनेक। वैसे तो चने की झाड़ पे किसी को भी चढ़ाया जा सकता है पर नेताओं को इसका सर्वाधिक शिकार बनाया जाता है।

दूसरा फायदा यह कि जो चने की झाड़ पे चढ़ते है उनको कभी भी गिरने पे चोट ही नहीं लगती। कैसे लगेगा! जब कोई ऊंचाई ही नहीं तो चोट कैसा! हाँ ब्रेन चाहिए तगड़ा। खास कर नेताओं को चने की झाड़ पे चढ़ाना मने कुत्ते को बुर्ज खलीफा पे चढ़ाना हो जाता है। अब दुनिया जानती है कि ऊंचाई बुर्ज खलीफा की है पर कुत्ते को लगता है कि यह उसकी ऊंचाई है। खैर! लगने दीजिये इसमें किसका क्या जाता है। अपना काम बनता भांड में जाय जनता।

रुकिए, बात चने की झाड़ पे चढ़ाने की हो रही थी। वहीं रहते है। नेताओं की तरह दल बदल नहीं। सो चने की झाड़ पे चढ़ाना एक कला है। यह किसी किसी दिगंबरी आदमी में ही होता है। दिगंबरी आदमी तो बस मधु मिश्रित वचन से ही किसी को चने की झाड़ पे चढ़ा देता है।

कुछ माहिर लोग इसके लिए जिस नेता को चने की झाड़ पे चढ़ाना है उसके कान में कुर्सी कुर्सी नामक मंत्र फूंकते है। फिर कोई समारोह करके कुर्सी भरनी होती है। समारोह कुछ भी हो सकता है। शौचालय का शिलान्यास, (उद्घाटन का टेंशन नहीं)! गुल्ली-दंडा टूर्नामेंट! बाबा बकलोलानंद महाराज माहजग खरमंडल! कुछ भी! नहीं कुछ तो बकरी के बच्चे का जन्मोत्सव का आयोजन सर्वाधिक प्रचलन में है। आशीर्वाद देने ढेर लोग आ जाते है। बस फेसबुक, व्हाट्सएप्प पे धड़ाधड़ भेजते रहिये। प्रत्येक दिन। फिर कॉल भी करिये। बन गया काम। हाँ भोज में मटन शटन होना अनिवार्य शर्त है।

समारोह में भले ही कुर्सी खाली रह जाये पर फर्क नहीं। चने की झाड़ पे चढ़े नेता की खाली कुर्सी भी भड़ी दिखती है।

फिर कुछ लंपट, लफ्फड़ लोगों को दारू, मुर्गा, बाइक के पेट्रोल आदि इत्यादि का जोगाड़ कर दीजिए। हो गया काम। हाँ! चने के झाड़ पे चढ़ाने के लिए फूलों की माला सर्वाधिक उपयोगी यंत्र है। जितना अधिक फूलों की माला उतना अधिक काम आसान। मने समझिये की फूल की माला ही चने की झाड़ की सीढ़ी है। यदि बड़ा माला बना दिये जिसमे आठ दस आदमी आ जाएंगे तो समझ लीजिए काम चांदी।

क्या कहे उदाहरण! दुर्र महराज! अपने पप्पू भैया को देखिए न! इधर उधर काहे देखते है जी। हमेशा अपने आस पास के घटनाक्रम से जोड़ लेते सभी मैटर को। कभी तो ऊंचा उठिये। नेशनलिस्ट बनके के सोंचिये। या इंटरनेशनली सोंच रखिये। बाकी बात जीतो दा के बिलायती चाचा का फोन जाएगा तब न पता लगेगा। इंतजार करिये...तब तक कोई उपदेश, कोई शेरो शायरी, कोई प्रेरक कहानी जो किसी ने आपको भेजा हो और आपके स्वभाव, आचरण से वह विपरीत हो दूसरे को व्हाट्सअप करते रहिये..जय बकलोला नंद जी महाराज की जय..

मंदिर मस्जिद साथ साथ एकता दिवस पे बिशेष

#एकता_दिवस #मंदिर_मस्जिद साथ साथ आज एकता दिवस है। मंदिर मस्जिद का मुद्दा फिर चुनाव आते ही चरम पे है। विकास, रोजगार, रोटी का मुद्दा गौण। इ...