24 जुलाई 2018

दलित और गरीबी

भूख की तस्वीर

(शादी समारोह से बचा हुआ खाना लेकर आते बच्चे..)

जय भीम का नारा देकर दलितों की राजनीति करने वाले वैसे लोग जो मर्सिडीज-बेंज का मेंटेन करते हैं और करोड़ों-अरबों में खेलते हैं उनके लिए यह तस्वीर चुल्लू भर पानी में डूब मरने की है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण का प्रावधान इनके लिए किया था। यह बच्चे शादी समारोह में बचे हुए खाने के लिए लेकर अपने घर जा रहे हैं।

सभ्य समाज के माथे पर भी यह एक कलंक है परंतु सबसे अधिक बड़ा कलंक उनके माथे पर है जो बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के दिए आरक्षण के आधार पर आज बुलंदी पर हैं परंतु इनका हकमारी कर रहे हैं।

आरक्षण का असली हकदार यही लोग हैं। सबसे अधिक दलितों में गरीबी मुसहर जाति में ही है परंतु आरक्षण की मलाई खाने वाले बड़े बड़े करोड़पति दलित नेता, दलित अफसर और अन्य तरह के लोग आरक्षण को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। आरक्षण की बात हुई नहीं कि उनकी तलवारें निकल जाती है। सब अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे हैं। गरीब की भलाई की लड़ाई कोई नहीं लड़ने के लिए तैयार हैं।

यह तस्वीर कलंक तो हमारे समाज के माथे पर भी है जो शादी-समारोह और अन्य समारोह में लाखों खर्च कर देते हैं और अनाज को बर्बाद करते हैं।

कहीं भूख की बेहिसाब जिल्लत है तो कहीं शान ओ शौकत की बेहिसाब दौलत है। असमानता की खाई बहुत बड़ी है परंतु अपने देश में आज समानता की बातें कहां होती है। बातें तो गाय, मंदिर-मस्जिद की हो रही है। भूख और रोटी हाशिए पर है! दोषी हम हैं दूसरा कोई नहीं...

आरक्षण गरीब को मिलना चाहिए जाति को नहीं। बाबा साहब ने शायद यही सपना देखा होगा परंतु वोट बैंक की राजनीति में आज गरीबी का कोई महत्व नहीं, महत्वपूर्ण वोट बैंक है।

इन सब परिस्थितियों के लिए हम किसी एक नेता को जिम्मेवार तो नहीं ठहरा सकते परंतु वर्तमान में जो केंद्र की सरकार है उनके लिए एक शब्द विरोध में लिखना भी जहमत मोल लेना है। इसलिए कौन आफत मोल लेगा, पता नहीं कौन पीट-पाट देगा!! देशद्रोही कहके!!

जय भीम!! जय भारत!!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

जो लोग अपने मां—बाप को प्रेम दे पाते हैं, उन्हें ही मैं मनुष्य कहता हूं..

ओशो को पढ़िए आपने कल माता और पिता के बारे में जो भी कहा , वह बहुत प्रिय था। माता—पिता बच्चों को प्रेम देते हैं, लेकिन बच्चे माता—पिता को प्र...