बताते चले की बरबीघा में सरे शाम दो स्वर्ण व्यावसाई भाई को गोली मार दी गई है। दोनों भाई को चिन्ताजनक हालत में अस्पताल कें प्राथमिक उपचार के बाद पटना रेफर कर दिया गया है। सबसे दुखद पहलू यह कि घटना के दो घंटे बीत जाने के बाद भी बरबीघा की पुलिस को इसकी भनक नहीं लगी और न ही अस्पताल और नहीं घटना स्थल पर ही बरबीघा पुलिस पहूंच सकी। घटना कें सम्बंध में प्राप्त समाचार के अनुसार ढब्बा बाजार में जेवर की दुकान चलाने वाले स्वर्ण व्यापासी जमुना साव के पुत्र सुधीर कुमार एवं सुनील कुमार दुकान बन्द कर करीब आठ बजे आ रहे थे कि खचींचा गली से पहले सुनसान जगह पर उन्हें गोली मार दी गई। दोनों की हालत चिन्ताजनक बताई जा रही है। अशंका व्यक्त की जा रही है कि लूट की धटना कों अंजाम देने के क्रम में यह बारदात हुई है। घटना स्थल पर दो तीन चप्पत तथा दो गोली के खोखों समाचार पे्रशन तक विखरे परे थे। पिड़ित के परिजनों का बुरा हाल है और वे किसी से पुलिस को खबर करने की गुहार लगा रहे थे। राष्ट्रीय सहारा के द्वारा जब इसकी सूचना पुलिस कप्तान को दी गई तब जाकर बरबीघा पुलिस हरकत में आई और अस्पताल पहूंची। पुलिस कें इतने विलंब से पहूंचने को लेकर लोगों में अक्रोश बना हुआ है।
09 जुलाई 2010
08 जुलाई 2010
स्वर्ण व्यवसाई को गोली मारी, दो सहोदर भाई गम्भीर रूप से जख्मी।
बरबीघा में सरे शाम दो स्वर्ण व्यावसाई भाई को गोली मार दी गई है। दोनों भाई को चिन्ताजनक हालत में अस्पताल कें प्राथमिक उपचार के बाद पटना रेफर कर दिया गया है। सबसे दुखद पहलू यह कि घटना के दो घंटे बीत जाने के बाद भी बरबीघा की पुलिस को इसकी भनक नहीं लगी और न ही अस्पताल और नहीं घटना स्थल पर ही बरबीघा पुलिस पहूंच सकी। घटना कें सम्बंध में प्राप्त समाचार के अनुसार ढब्बा बाजार में जेवर की दुकान चलाने वाले स्वर्ण व्यापासी जमुना साव के पुत्र सुधीर कुमार एवं सुनील कुमार दुकान बन्द कर करीब आठ बजे आ रहे थे कि खचींचा गली से पहले सुनसान जगह पर उन्हें गोली मार दी गई। दोनों की हालत चिन्ताजनक बताई जा रही है। अशंका व्यक्त की जा रही है कि लूट की धटना कों अंजाम देने के क्रम में यह बारदात हुई है। घटना स्थल पर दो तीन चप्पत तथा दो गोली के खोखों समाचार पे्रशन तक विखरे परे थे। पिड़ित के परिजनों का बुरा हाल है और वे किसी से पुलिस को खबर करने की गुहार लगा रहे थे। राष्ट्रीय सहारा के द्वारा जब इसकी सूचना पुलिस कप्तान को दी गई तब जाकर बरबीघा पुलिस हरकत में आई और अस्पताल पहूंची। पुलिस कें इतने विलंब से पहूंचने को लेकर लोगों में अक्रोश बना हुआ है।
07 जुलाई 2010
कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ कैसे- बढ़ा हुआ भाड़ा नहीं देने पर महिला की बेरहमी से पिटाई।
शेखपुरा-सरकार के द्वारा पेट्रोलियम पदार्थाे की मुल्यवृद्वि का आम आदमी पर क्या असर पड़ता है इसका नजारा कई जगहों पर देखने को मिलता है। केन्द्र सरकार भले ही असंवेदनशिलता का परिचय देते हुए मुल्यवृद्वि को वापस नहीं लेने की बात कह रही हो पर गरीब आदमी को इसके लिए मार खानी पड़ रही है।
महंगाई को लेकर जैसे ही वाहन मालिकों ने गाड़ी भाड़े में वृद्वि की कि अधिक भाड़े को लेकर वाहन संचालकों और यात्रियों के बीच मारपीट आम हो गई है और इसी का परिणामत: आज बरबीघा बस स्टेण्ड में एक महिला यात्री की जमकर पिटाई कर दी गई जिसकी वजह से महिला वहीं बेहोश हो गई। मारपीट बस स्टेण्ड कें एजेंटों कें द्वारा तब की गई जब महिला यात्री बढ़ा भाड़ा देने से इंकार कर दिया। जयरामपुर थाना क्षेत्र के तेउस गांव निवासी महादलित महिला इन्दू देवी बरबीघा से शेखपुरा जाने के लिए जीप (बीआर-21-1222) पर चढ़ी तब संचालक के द्वारा भाड़ा मांगे जाने पर उसके द्वारा तीन व्यक्ति का भाड़ा 46रू. लिया गया जबकि महिला 30 रू. पूर्व भाड़ा ही देने को लेकर जिद्द करने लगी और इसी को लेकर हुए विवाद में महिला के साथ बस स्टेण्ट कें एजेंटों एवं वाहन संचालाकों कें द्वारा मारपीट की गई। मारपीट इतनी वेरहमी से की गई की महिला वहीं बेहोश हो गई। इतना ही नहीं महिला के साथ जा रही उसकी बहन रंजू देवी के साथ भी बदसलूकी की गई। पिड़ित महिला को स्थानीय लोगों के सहयोग से सरकारी अस्पताल में ईलाज के लिए भर्ती कराया गया।
यह घटना भले ही महज छोटी हो पर केन्द्र की नितियों का ही असर ही की महादलित परिवार को महज 16 रू. की खातिर पीटाई खानी पड़ रही है।
27 जून 2010
भारत का प्रजातन्त्र पूजींपतियों के हाथ की कठपुतली।
जिस देश के प्रजातन्त्र को दुनियाभर के लोग सराहते है उस लोकतन्त्र की दुर्गति की चर्चा करना चाहता हूं। दुर्गती इतनी की एक वारगी यदि गम्भीरता से सोंचे तो हमारा प्रजातन्त्र पूंजीतन्त्र मेें तब्दील हो गया है। इसके कई खतरनाक उदाहरण है, पर हाल के दिनों में मंहगाई को लेकर हायतौबा होने के बाद जिस तरह चीनी की मंहगाई पर केन्द्र सरकार के मन्त्री शरद पवार के कब्जे का खुलासा हुआ और इस पर अंकुश लगाने की बात पर सरकार को गिरा देने की धमकी प्रकरण, यह सबसे खतरनाक संकेत थे। इसके बाद केन्द्र सरकार की असंवेदनशीलता ही है कि डीजल, पेट्रल और रसोई गैस की कीमत में इजाफा कर दिया गया। यह बात इतनी हल्की नहीं जितनी ली जा रही है। आज भारतीय राजनीति दो ध्रुविय हो चुकी है और दोनों ध्रुवों का संचालन परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से पूंजीपतियों के हाथों में है। याद करता हूं तो लगता है जो भारतीया जनता पार्टी आज मंहगाई का रोना रो घड़ीयाली आंसू बहाते नहीं थकती उसके शासन काल में भी जनता प्याज के आंसू रोई है। और फिर विनिवेश नीति के तहत अपने चहेतों को 1200 करोड़ तक का पांच सितारा होटल 200 से 300 करोड़ में दे दिया गया। काफी हाय तौबा हुआ पर जो नीति निर्धारक पूंजीपतियों को लाभ पहूंचाना चाहते है उनको कौन रोकता है। यही हाल आज केन्द्र के कांग्रेसी सरकार की है।
हलांकि लालू यादव, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह से लेकर मायावती कांग्रेस को मंहागाई बढ़ाने के लिए कोस रही है पर जनता को बेबकुफ बनाने में शातिर ये राजनीतिज्ञ शायद यह भूल जाते है कि अभी हाल ही में भाजपा कें द्वारा कट मोशन लाकर इनको कांग्रेसी हमाम में नंगा कर दिया गया। आखीर जब मंहगाई कें सवाल पर सरकार को गिराने की बात आई तो ये कथित सेकुलरवादी क्यों कांग्रेस के साथ चले गए। क्या कांग्रेसी मंहगाई की मार सिर्फ हिन्दू ही झेल रहें है।
बात साफ है कि नेताओं की पूरी की पूरी फौज पूंजीपतियों की कठपुतली है और सभी देश की अस्मीता को दाबं पर रख कर राजनीति करते है।
सवाल यह भी है कि आज हमारे संसद भवन और विधान सभा में कितने प्रतिशत आम लोग चुन कर जाते है। अभी विधान सभा का चुनाव बिहार में होना है और इसके लिए एक से तीन करोड़ का बजट बनाया जा रहा है। मुद्दा यह कि जहां से देश के आम लोगों के लिए नीतियां बनती है वहां आम आदमी का प्रतिनिधी होता ही नहीं, तब पूंजीवाद हाबी होगा कि नहीं। अभी सम्पन्न हुए राज्य सभा कें चुनाव में कितने प्रतिशत लोग आम आदमी के हितों के रक्षक आए है यह देखने वाली बात है। कोई वियर किंग तो कोई अरबपति वकील।
यहां पर वाम दलों की चर्चा भी लाजिम है। सर्वहारा की बात करते हुए बुर्जुआ को कोसने वाली पार्टी ही जब बुर्जुआ पार्टी की गोद में बैठ गई तो उसके पास भी महज संप्रदायिकता के कोई आम आदमी का मुद्दा नहीं रह गया। रही सही कसर सिंगूर औ नन्दीग्राम में उसकें पाले हुए कामरेड गुण्डों ने पूरी करते हुए यह जता दिया कि बुर्जुआ से लड़ने वाली द्वन्दात्मक भौतिकवादी पार्टी भी बुर्जुआ हो गई। हां यह बात दिगर है कि तर्क जाल के सुनहरे ताने वाने में इसे भी उचित ठहराने वाले वामपन्थी नेता इस काम की ट्रेनिंग अपना राजनीतिक जीवन प्रारंभ करने के साथ ही लेते हुए अब माहिर हो चुकें है।
किसे नहीं पता कि जनता कें विकास का पैसा पूंजीपतियों के साथ कदम ताल मिला कर दौड़ने की कोशिश कर रहे अधिकारियों और नेताओं कें हाथों में चली जाती है।
कौन नहीं समझता कि राहुल गांधी भले ही दलितों के घरों में खाना खाने का स्वांग कर रहे हो पर आम आदमी का दर्द समझना उनके बस की बात नहीं।
कौन नहीं जनता कि मायावती और रामविलास पासवान भी भले ही राजनीति दलितों की करते हों पर पूंजी ने उन्हें भी अपने चंगुल में ले लिया है।
कौन नहीं जानता कि केन्द्र सरकार के मन्त्रियों पर इतनी राशि खर्च हो रही है जिसमें कटौती कर हम रसोई गौस की सब्सीडी दे सकते है।
कौन नहीं जानता कि जिस संसद में हम प्रति धंटा लाखों खर्च करते है उसी में मात्र दो तीन सांसद ही मौजूद होते है तब क्या उसमें कटौती कर जनता के विकास पर खर्च नही किया जा सकता।
यहां बात चौथेखंभे की भी कि जानी चाहिए। क्या आज चौथाखंभा मिडिया कहीं आम जन के साथ खड़ी दिखती है। टीआरपी बढ़ाने के लिए भले ही मिर्च-मसाला मिला कर समाचार बनाया जाता हो पर उसमें भी आम आदमी रॉ मिटिरियल ही है।
कुल मिला कर लब्बोलुबाब यह कि भले ही हम प्रजातन्त्र के पैरोकार होने का दंभ भरे पर पूजींवाद ने प्रजातन्त्र को अपने कब्जे में ले लिया है।
23 जून 2010
नेपाल में सबकुछ मिलता है पर मैं हिम्मत न जुटा सका!
गत दिनों नेपाल जाना हुआ वजह कुछ खास नहीं, थोड़ा धूम-फिर लूं बस। वैसे तो नेपाल की खुबसुरती से सभी वाकिफ है और मैं भी था, पर नेपाल की जमीं पर कदम रखते ही जिस बात का एहसास हुआ वह मेरे लिए चौंकाने वाली थी। अपने एक मित्र अभय कुमार के साथ जैसे ही जोगवनी रेलवे स्टेशन उतरकर विराटनगर प्रवेश किया तोे किसी प्रकार की जांच के बिना प्रवेश कर गया और जिस चीज पर पहली नज़र पड़ी वह थी वीयरवार की लंबी कतार और अधिकतर दुकानों में महिला दुकानदार। मेरे मित्र सबसे पहले वियरवार का ही रूख किया। खैर हमलोग एक वीयरवार में बैठ गए, अभय ने अपने लिए वीयर मंगाया और मेरे लिए ठंढा, क्योंकि उसे पता है कि मैं वीयर नहीं पीता। वीयरवार के संचालक से जैसे ही मैेंने पूछा कि नेपाल में क्या-क्या है की उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान छा गई और कहा ``पहली बार आयो हो साहब´´ जब मैेने हां कहा तो उसने कहा ``नेपाल में सब कुछ मिलता है।´´ ``सब कुछ मिलता है´´ मैंने चौंकते हुए पूछा तो उसने नेपाली हिन्दी में कहा ``सब कुछ, मतलब सबकुछ।´´ मैं अभी तक दुकानदार के इशारों को नहीं समझ रहा था, तभी साथ ही बैठा एक युवक जो वीयर का मजा ले रहा था, खड़ी हिन्दी में कहा ``सर यहां लड़कियां और शराब छूट कर मिलती है, एक दम सस्ती, सब्जी के भाव। बगल के वीयरबार में ही यह व्यवस्था है और इण्डिया से लोग नेपाल इसीलिए आते है।´´ जब उस युवक से जान-पहचान बढ़ाई तो उसने अपना नाम नरेन बताया और कहा कि वह बहुत दिन इण्डिया में रहा है। खैर वीयरवार से निकल कर जब हम लोग धरान जाने के लिए बस के बारे में पूछा तो नरेन ने कहा कि चलिए सर आपको मैं ले चलता हूं। नरेन के ऐसा कहने पर मैं तो सकपकाया पर मेरे मित्र ने हामी भर दी। और हम लोंग वीयर सहित ठंढ़ा एवं नमकीन के लिए 250 नेपाली रू. चुकाया, वहीं दुकानदार ने बताया कि आई सी का 100 का 160 एन सी मिलता है। आई सी मतलब इण्डियन करेंसी और एन. सी. मतलब नेपाली करेंसी।
वहां से हम लोग नरेन के साथ बस अडडे की ओर चले तो नरेन ने कहा कि चलिए साहब आप लो जिस चीज के लिए आये है पहले वहीं ले चलते है। नरेन का मतलब वेश्यालय से था और हम लोग उसे बताने लगे कि हम लोग मात्र धूमने आये है तो उसने बहुत ही बेतक्कलूफ के साथ कहा कि छोड़िए साहब सभी लोग यही कहते है। अन्तत: बड़ी मुिश्कल से उससे यह कह कर पिण्ड छुड़ाया कि हम लोग लौटने के बाद उससे मिलेगें और उसका नंबर लिया ताकि उससे संपर्क कर सके और हम लोग धरान की बस पर सवार हो गए। विराट नगर से धरान के रास्ते कई मकानों के आगे सजी धजी महिलाऐं मिली और हमलोग स्वभावगत उसकी ओर देखने लगते थेे तभी थोड़ी दूर जाने के बाद जब चालक से जानना चाहा कि नेपाल में क्या खास है तो उसने भी कहा यहां सबकुछ मिलता है जी। हम लोग मुस्कुरा कर रह गए और जब बगल की सीट पर बैठे एक भारतीय जैसे बुजूर्ग से मैंने पूछा ये सभी लोग ऐसा क्यों कह रहे है तो उसने बताया कि नेपाल आने वाले ज्यादातर लोग लड़कियों के लिए ही नेपाल आते है और नेपाल का मुख्य धंधा ही वेश्यावृति है तो हमलोगों को आश्चर्य हुआ। नेपाल के विराट नगर से धरान तक का सफर वादियों से होकर चलता हुआ था। रास्ते में महिलाओं का काफिला पीठ पर लकड़ी का गठ्ठर लिए बेपरवाह चली जा रही थी। किसी महिलाओं के सीने पर आंचल नहीं। घुठने तक लहंगा उठाऐ महिलाऐं अलमस्त चल रही थी।
जब हम लोग धरान पहूंचे तो पहलीबार किसी विदेशी जीम पर होने का एहसास हुआ। मैं चूंकि गांव का रहने वाला हूं इसलिए कौतूहल भी हुआ। मिनी स्कर्ट और मिनी टॉप पहने सजी-धजी सुन्दर युवतियां और महिलाऐं सभी जगह अपना जलबा विखेर रही थी। कुछ साड़ी तो कुछ समीज-सलवार पहनेे महिलाऐं भी नज़र आ रही थी पर किसी ने आंचल या ओढनी के लिए कष्ट नहीं उठा रखी थी और हमलोग जिन नजारों को सिनेमा में देखते थे उसे जिवन्त देख देख प्रफुिल्लत भी हो रहे थे और झेंप भी रहे थे। जब मैंने एक बुजुर्ग, जो हाथ में सेविंग बॉक्स लिए जा रहे थे और इससे यह समझने मे मुझे देरी नहीं हुई की ये नाई है और चेहरा भी भारतीय है, तो उनसे काली मन्दिर जाने का रास्ता पूछा तो उन्होनों पक्की सड़क होकर जाने का रास्ता बताया साथ ही यह भी हिदायत दी की सामने वाले रास्ते से भी जा सकतें है पर रास्ते में गलत लोग रहते है।
हमलोग गये तो पक्की सडक से काली मन्दिर और वहीं से उंचे पहाड़ों पर बादलों की अटखेलियों को कैमरे में कैद करते हुए जब लौटने लगे तो दूसरे रास्ते से होकर जाने का कौतुहल हुआ। जब हमलोग नीचे उतरने लगे तो थोड़ी दूर जाने के बाद नजारा कुछ यूं था। झाड़ियों के बीच जोड़े आलिंगनबद्ध जहां तहां आनन्द में डूबे हुए थे और बगल में एक आधा लड़की भी खड़ी नज़र आ जाती, जैसे की मेरा ही इन्तजार कर रही हो।
इतनी सुगमता से उपलब्ध नारी सौन्दर्य का पान करने के लिए बरबस ही मन मचलने लगा और अन्दर ही अन्दर द्वन्द चलने लगा। हम दोनों मित्र एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। शायद पहल कौन करे यही द्वन्द थी और मैंने पूछ ही लिया -क्या अभय ने कहा ``हिम्मत हैंं।´´ इसी द्वन्द के साथ हम लोग अपने अपने हिम्मत को टटकोलते हुए सीढ़ियों के साथ साथ नीचे उतरते चले गए। द्वन्द भी अजीब अजीब आखिर तर्क तो सभी के लिए रास्ता बनाता है। एक मन कहे कि ``आज यह अरमान भी पूरा कर लो´´ पर एक मन रोकते हुए तर्क देता `अरमान पूरा कर भी लिया तो क्या आनन्द तो नहीं मिलेगी, बिना प्रेम के संसर्ग में आनन्द कहां,
और फिर भला इस पाप के बोझ के साथ क्या अपनी पत्नी का सामना कर पाउंगा, जिसने आन्नद के अतिरेक स्वर्ग में बार बार डुबोया हैर्षोर्षो और आखिर कर हम सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए भी नीचे नहीं गिरे। दोनों दोस्त एक दूसरे को हिम्मत नहीं जुटा सकने के आज भी कोस रहे है पर मेरा मन मुझे हिम्मत नहीं जुटाने के लिए धन्यवाद दे रहा है।
19 जून 2010
गुड़ खाकर गुलगुला से परहेज कर रहे है नीतीश कुमार
``राजनीति में कोई किसी का दोस्त नहीं होता´´ यह कहावत कई बार सुना है और कई बार इसे देखा भी है। बिहार के मेनोफेस्टो सीएम कहे जाने वाले प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह जब बेलगाम घोड़े की तरह सरपट दौड़ रहे थे तो उनके सामने बिहार सरकार के मन्त्री भी कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे और विधायकों को उनसे मिलने के लिए नाको चने चबाना पड़ता था तब आम लोगों की विशात ही क्या थी और फिर राजनीति के उपरोक्त कथन ने करवट बदली और मेनोफेस्टो सीएम जमीन पर गिर कर उसी तरह छटपटाने लगे जिसतरह पर कटे पंक्षी। आज बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार की बाढ़ राहत राशि को लौटा कर सालों से चली आ रही राजग गठबंधन में पड़ी दरार के संकेत दे दिए। भाजपा के कद्दबार नेता और गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी के साथ हाथ में हाथ लिए नीतीश कुमार के विज्ञापन से नराज नीतीश कुमार बैखला कर पहले तो भाजपा नेताओं के भोज को केंसिल किया उसके बाद आज 5 करोड़ की राहत राशि को लौटा का भाजपा के नेताओं को यह साफ संकेत दे दिया उनकी खिचड़ी कुछ और ही पक रही है। हलांकि मेरी नज़र में नीतीश जी का यह कदम बेमानी है। नरेन्द्र मोदी भी जनता के द्वारा चुनी गई सरकार के प्रतिनिधि है और भाजपा कें माने हुए नेता भी और जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार चला रहे है तो लोगों को यह पता है की नीतीश कुमार भाजपा के नीतियों का कमोवेश समर्थन करते है। पर नीतीश कुमार ने गुजरात सरकार की राशि को लौटा का यह जता दिया कि वे भाजपा के साथ तो है पर उनकी नीतियों का विरोध करते है। पर नीतीश कुमार का यह कदम गुड़ खाऐ और गुलगुला से परहेज की बात हो गई। जब भाजपा के साथ हमारी सरकार चल रही है तो उनके नेताओं का अपमान करना कदापि उचित नहीं है इससे बेहतर तो यही होता कि नीतीश कुमार गठबंधन को खत्म कर देते और जनता के बीच जा कर इसके लिए जनाधार मांगते। हलांकि नरेन्द्र मोदी कें मामले में मेरा मत कभी भी तथाकथित सेकुलरवादियों के साथ नहीं रहा। मैं वामपन्थ विचारधारा का समार्थक रहा हूं पर गोधरा काण्ड पर सभी की चुप्पी और गुजरात दंगे पर हंगामा में मुझे इस विचारधार से विमुख किया और आज भी जब कोई नरेन्द्र मोदी को कठधरे में खड़ा करता है तो हमे गोधरा की याद हो आती है और लगता है कि इस देश में हिन्दू होना जैसे कोई गुनाह है और कांग्रेस, राजद की राह चलते हुए नीतीश ने भी यही जताया है। हम अपने को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कें रूप में खुद को पेश करते है पर समानता मेरे विचारों में नहीं होती। मेरी नज़र में गोधरा और गुजरात दंगा दोनो गलत है और दोनों की निन्दा उतनी ही तिब्रता से होनी चाहिए।
बात अगर बीजेपी की कि जाए तो उनकी हालत सबकुछ लुटा कर होश में आये तो क्या आये बाली हो गई। नीतीश कुमार जब पहली बार विकास पर निकले थे और उनके इस मुहिम में कही उपमुख्यमन्त्री या भाजपा कें नेता नज़र नहीं आये तभी भाजपा को यह समझ लेनी चाहिए थी नीतीश कुमार की मंशा अपनी छवि को इतना बड़ा कर लेने की है कि सभी उनके सामने बैने नज़र आए। नीतीश कुमार लगातार जनता में जाकर अपने विकास का िढढोरा पिटते रहे और शौचालय से लेकर गली-सड़क, पूल और भवन सभी का उदधाटन अपने ही करने लगे। उनके द्वारा एक नई परंपरा का जन्म दिया गया और वे पटना में बैठे बैठे भी रिमेट से पूल पुलिया का उदधाटन कर यह जताते रहे की बिहार में जो कुछ हो रहा वे सिर्फ और सिर्फ उनकी देन है और इस बीच एक बार फिर से फिलगुड में रहने वाले भाजपा के मन्त्री या तो नगद नारायण के फेरा में लगे रहे यह हाथ पर हाथ धर कर बैठे। इन सारे घटना चक्र में भाजपा के कार्यकत्र्ता उपेक्षित रहे और उन्हे लगने लगा की सरकार में उनकी पार्टी की नहीं चलती। अथक परिश्रम पर भी कई केन्द्र की सरकार से चूकी भाजपा को भी सत्ता में रहने का खुन लग गया और संध के द्वारा नीतीन गडकरी के हाथ में भाजपा की कमान सौंप तो दिया गया पर उन्हें पुरे देश की राजनीति समझते हुए बिहार की राजनीति को समझने में इतनी देर कर दी और नीतीश कुमार उनके सामने एक हौअआ की तरह खड़ा हो गए है कि उनके किसी भी नेताओं में उनके विरोध का साहस नहीं है। ( एक मात्र गिरीराज सिंह ने साहस तो दिखाया है पर इसके भी कारण कुछ और ही माने जा रहे है।)
अब नीतीश कुमार बिहार विधान सभा चुनाव से पहले ही भाजपा को आंख दिखा कर यह जताने की कोशिश कर रहे है कि भाजपा यहां दोयम दर्जे की पार्टी है और वह अपनी औकात में रहे। हलांकि भाजपा के जनाधार और समर्थकों की बात की जाए तो इसको एक बडे तबके और विभिन्न जातियों का समर्थन प्रप्त है और जो भी हो नीतीश कुमार आज एक जातिवादि नेता के रूप में खड़े है और भाजपा के कार्यकत्ताओं में इस बात का रोष भी है कि उन्होने ने जिस सरकार को बनाने में अपना खून-पसीना बहाया वह सरकार उनकी नहीं है। बात चाहे जो हो पर नीतीश कुमार अपनी राह बड़ी चतुराता से बना रहे है और मुस्लिम वोट बौंक की राजनीति उनके द्वारा भी की जा रही है और यह उनके द्वारा कांग्रेस से हाथ मिलने की चर्चाओं को भी हावा देने वाला कदम है। अब गेन्द भाजपा कें पाले में है और देखना है कि स्वाभिमान की बात करने वाली भाजपा कितना स्वाभिमानी है और अपने खिसकते जनधार को वे क्या सन्देश देती है।
बात अगर बीजेपी की कि जाए तो उनकी हालत सबकुछ लुटा कर होश में आये तो क्या आये बाली हो गई। नीतीश कुमार जब पहली बार विकास पर निकले थे और उनके इस मुहिम में कही उपमुख्यमन्त्री या भाजपा कें नेता नज़र नहीं आये तभी भाजपा को यह समझ लेनी चाहिए थी नीतीश कुमार की मंशा अपनी छवि को इतना बड़ा कर लेने की है कि सभी उनके सामने बैने नज़र आए। नीतीश कुमार लगातार जनता में जाकर अपने विकास का िढढोरा पिटते रहे और शौचालय से लेकर गली-सड़क, पूल और भवन सभी का उदधाटन अपने ही करने लगे। उनके द्वारा एक नई परंपरा का जन्म दिया गया और वे पटना में बैठे बैठे भी रिमेट से पूल पुलिया का उदधाटन कर यह जताते रहे की बिहार में जो कुछ हो रहा वे सिर्फ और सिर्फ उनकी देन है और इस बीच एक बार फिर से फिलगुड में रहने वाले भाजपा के मन्त्री या तो नगद नारायण के फेरा में लगे रहे यह हाथ पर हाथ धर कर बैठे। इन सारे घटना चक्र में भाजपा के कार्यकत्र्ता उपेक्षित रहे और उन्हे लगने लगा की सरकार में उनकी पार्टी की नहीं चलती। अथक परिश्रम पर भी कई केन्द्र की सरकार से चूकी भाजपा को भी सत्ता में रहने का खुन लग गया और संध के द्वारा नीतीन गडकरी के हाथ में भाजपा की कमान सौंप तो दिया गया पर उन्हें पुरे देश की राजनीति समझते हुए बिहार की राजनीति को समझने में इतनी देर कर दी और नीतीश कुमार उनके सामने एक हौअआ की तरह खड़ा हो गए है कि उनके किसी भी नेताओं में उनके विरोध का साहस नहीं है। ( एक मात्र गिरीराज सिंह ने साहस तो दिखाया है पर इसके भी कारण कुछ और ही माने जा रहे है।)
अब नीतीश कुमार बिहार विधान सभा चुनाव से पहले ही भाजपा को आंख दिखा कर यह जताने की कोशिश कर रहे है कि भाजपा यहां दोयम दर्जे की पार्टी है और वह अपनी औकात में रहे। हलांकि भाजपा के जनाधार और समर्थकों की बात की जाए तो इसको एक बडे तबके और विभिन्न जातियों का समर्थन प्रप्त है और जो भी हो नीतीश कुमार आज एक जातिवादि नेता के रूप में खड़े है और भाजपा के कार्यकत्ताओं में इस बात का रोष भी है कि उन्होने ने जिस सरकार को बनाने में अपना खून-पसीना बहाया वह सरकार उनकी नहीं है। बात चाहे जो हो पर नीतीश कुमार अपनी राह बड़ी चतुराता से बना रहे है और मुस्लिम वोट बौंक की राजनीति उनके द्वारा भी की जा रही है और यह उनके द्वारा कांग्रेस से हाथ मिलने की चर्चाओं को भी हावा देने वाला कदम है। अब गेन्द भाजपा कें पाले में है और देखना है कि स्वाभिमान की बात करने वाली भाजपा कितना स्वाभिमानी है और अपने खिसकते जनधार को वे क्या सन्देश देती है।
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बिहार की शिक्षा नीति पर अक्सर सवाल उठते रहे है और परिक्षाओं में नकल यहां की परंपरा है। बिहार में शराब नीति और शिक्षा नीति दोनों आलोचना...


