27 जून 2010

भारत का प्रजातन्त्र पूजींपतियों के हाथ की कठपुतली।

जिस देश के प्रजातन्त्र  को दुनियाभर के लोग सराहते है उस लोकतन्त्र की दुर्गति की चर्चा करना चाहता हूं। दुर्गती इतनी की एक वारगी यदि गम्भीरता से सोंचे तो हमारा प्रजातन्त्र पूंजीतन्त्र मेें तब्दील हो गया है। इसके कई खतरनाक उदाहरण है, पर हाल के दिनों में मंहगाई को लेकर हायतौबा होने के बाद जिस तरह चीनी की मंहगाई पर केन्द्र सरकार के मन्त्री शरद पवार के कब्जे का खुलासा हुआ और इस पर अंकुश लगाने की बात पर सरकार को गिरा देने की धमकी प्रकरण, यह सबसे खतरनाक संकेत थे। इसके बाद केन्द्र सरकार की असंवेदनशीलता ही है कि डीजल, पेट्रल और रसोई गैस की कीमत में इजाफा कर दिया गया। यह बात इतनी हल्की नहीं जितनी ली जा रही है। आज भारतीय राजनीति दो ध्रुविय हो चुकी है और दोनों ध्रुवों का संचालन परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से पूंजीपतियों के हाथों में है। याद करता हूं तो लगता है जो भारतीया जनता पार्टी आज मंहगाई का रोना रो घड़ीयाली आंसू बहाते नहीं थकती उसके शासन काल में भी जनता प्याज के आंसू रोई है। और फिर विनिवेश नीति के तहत अपने चहेतों को 1200 करोड़ तक का पांच सितारा होटल 200 से 300 करोड़ में दे दिया गया। काफी हाय तौबा हुआ पर जो नीति निर्धारक पूंजीपतियों को लाभ पहूंचाना चाहते है उनको कौन रोकता है। यही हाल आज केन्द्र के कांग्रेसी सरकार की है।

हलांकि लालू यादव, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह से लेकर मायावती कांग्रेस को मंहागाई बढ़ाने के लिए कोस रही है पर जनता को बेबकुफ बनाने में शातिर ये राजनीतिज्ञ शायद यह भूल जाते है कि अभी हाल ही में भाजपा कें द्वारा कट मोशन लाकर इनको कांग्रेसी हमाम में नंगा कर दिया गया। आखीर जब मंहगाई कें सवाल पर सरकार को गिराने की बात आई तो ये कथित सेकुलरवादी क्यों कांग्रेस के साथ चले गए। क्या कांग्रेसी मंहगाई की मार सिर्फ हिन्दू ही झेल रहें है।
बात साफ है कि नेताओं की पूरी की पूरी फौज पूंजीपतियों की कठपुतली है और सभी देश की अस्मीता को दाबं पर रख कर राजनीति करते है। 

सवाल यह भी है कि आज हमारे संसद भवन और विधान सभा में कितने प्रतिशत आम लोग चुन कर जाते है। अभी विधान सभा का चुनाव बिहार में होना है और इसके लिए एक से तीन करोड़ का बजट बनाया जा रहा है। मुद्दा यह कि जहां से देश के आम लोगों के लिए नीतियां बनती है वहां आम आदमी का प्रतिनिधी होता ही नहीं, तब पूंजीवाद हाबी होगा कि नहीं। अभी सम्पन्न हुए राज्य सभा कें चुनाव में कितने प्रतिशत लोग आम आदमी के हितों के रक्षक आए है यह देखने वाली बात है। कोई वियर किंग तो कोई अरबपति वकील।
यहां पर वाम दलों की चर्चा भी लाजिम है। सर्वहारा की बात करते हुए बुर्जुआ को कोसने वाली पार्टी ही जब बुर्जुआ पार्टी की गोद में बैठ गई तो उसके पास भी महज संप्रदायिकता के कोई आम आदमी का मुद्दा नहीं रह गया। रही सही कसर सिंगूर औ नन्दीग्राम में उसकें पाले हुए कामरेड गुण्डों ने पूरी करते हुए यह जता दिया कि बुर्जुआ से लड़ने वाली द्वन्दात्मक भौतिकवादी पार्टी भी बुर्जुआ हो गई। हां यह बात दिगर है कि तर्क जाल के सुनहरे ताने वाने में इसे भी उचित ठहराने वाले वामपन्थी नेता इस काम की ट्रेनिंग अपना राजनीतिक जीवन प्रारंभ करने के साथ ही लेते हुए अब माहिर हो चुकें है।
किसे नहीं पता कि जनता कें विकास का पैसा पूंजीपतियों के साथ कदम ताल मिला कर दौड़ने की कोशिश कर रहे अधिकारियों और नेताओं कें हाथों में चली जाती है।
कौन नहीं समझता कि राहुल गांधी भले ही दलितों के घरों में खाना खाने का स्वांग कर रहे हो पर आम आदमी का दर्द समझना उनके बस की बात नहीं।
कौन नहीं जनता कि मायावती और रामविलास पासवान भी भले ही राजनीति दलितों की करते हों पर पूंजी ने उन्हें भी अपने चंगुल में ले लिया है।

कौन नहीं जानता कि केन्द्र सरकार के मन्त्रियों पर इतनी राशि खर्च हो रही है जिसमें कटौती कर हम रसोई गौस की सब्सीडी दे सकते है।

कौन नहीं जानता कि जिस संसद में हम प्रति धंटा लाखों खर्च करते है उसी में मात्र दो तीन सांसद ही मौजूद होते है तब क्या उसमें कटौती कर जनता के विकास पर खर्च नही किया जा सकता।

यहां बात चौथेखंभे की भी कि जानी चाहिए। क्या आज चौथाखंभा मिडिया कहीं आम जन के साथ खड़ी दिखती है। टीआरपी बढ़ाने के लिए भले ही मिर्च-मसाला मिला कर समाचार बनाया जाता हो पर उसमें भी आम आदमी रॉ मिटिरियल ही है।
कुल मिला कर लब्बोलुबाब यह कि भले ही हम प्रजातन्त्र के पैरोकार होने का दंभ भरे पर पूजींवाद ने प्रजातन्त्र को अपने कब्जे में ले लिया है।

सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...