27 अप्रैल 2010

दहेज की आंच में जल रहा है समाज, मुंह मांगी कीमत पर बिक रहे दुल्हे।

दहेज की आंच दिन व दिन बढ़ती ही जा रही है। आलम यह कि बेटियों की शादी के लिए जूते घिसने की बात आज भी चरितार्थ हो रही हैं। दहेज को लेकर बरतुहारी करने वाले परिजन जहां कड़ाके की धूप में भी बेटियों की शादी के लिए भटक रहे हैं वहीं बेटों के बाप के पैन्तरे देख उनका हलक तक सूख रहा है। दहेज को लेकर दुल्हों की कीमत दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है और अब तो यह सामाजिक स्वीकार्य हो गई है। दहेज में जहां नौकरी बालों के भाव सातवें आसमान पर है वहीं बेरोजगार दुल्हें भी अपनी कीमत बढ़ा चढ़ा कर बसूलने में लगे हुए हैं। सबसे पहले बेरोजगार दुल्हों की बात की जाय तो जातियों के आधार पर इनकी कीमत भी अलग अलग है। जहां सवर्ण बेरोजगार दुल्हे की कीमत दो लाख से लेकर तीन लाख तक है वहीं यदि उसके पास यदि पुस्तैनी जमीन हो तो कीमत चार से पांच लाख भी जा सकती है वहीं अन्य समुदायों में बेरोजगार दुल्हे भी एक से दो लाख में िेबक रहे है। दलितों में भी दहेज का चलन बढ़ता ही जा रहा है और दिहाड़ी मजदूरी करने वालों के लिए भी अपनी बेटी की ंशादी एक समस्या बन गई है। दूसरे पैदान पर व्यापार करने वाले दुल्हे आते है जिसकी कीमत तीन से पांच लाख होती है। हलंाकि उसकी कीमत व्यापारिक स्थिति पर निर्भर करती है और यदि व्यापार अच्छी रही तो कीमत उपर भी जा सकती है। तीसरे पायदान पर कर्मचारी स्तर के तथा सिपाही दुल्हे आते है जिसकी कीमत अब चार से छ: लाख होती है। सिपाही दुल्हे की मांग हलांकि उसके उपरी कमाई को देखते हुए अधिक भी हो जाती है। उसके बाद चौथे पायादान पर अन्य शिक्षक स्तरिय तथा प्रखण्ड स्तरिय कर्मचारी की मांग भी अच्छी है और इनकी कीमत भी छ: लाख के आस पास होती है। हालत यह भी है कि निविदा पर नियुक्त दुल्हे की मांग भी बढ़ गई है और मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर बेटी के पिता इन दुल्हों को खरीदने में भी कोेई कोताही नहीं कर रहें। यही हाल उनके दुल्हों की भी है जिसके पिता या माता नौकरी करतें है और बेटा बेरोजगार हो। छठे पायदान पर अधिकारी वर्ग के दुल्हे आते है और इस सब में यह देखा जाता है कि लड़के की उपरी कमाई कितनी अधिक होती है। जिसमें जितना अधिक कमाई का चांस होती है उसकी मांग उतनी ही अधिक है और इनकी कीमत दस लाख से पन्द्रह लाख तक जाती है। सातवें पायदान पर राजपत्रित अधिकारियों आते है और इन दुल्हों की कोई कीमत ही नहीं होती जो जितना अधिक देते है शादी उसी के साथ होती है। दहेज के इस दवानल में जहां बेटियों के बाप जल रहे है वहीं दिन व दिन बढ़ते इस विकराल दानव के दमन का कोई आस लोगों को नज़र नहीं आता।
कुछ साल पहले तक निजी कंपनियों में काम करने वाले की डिमाण्ड उतनी अधिक नहीं थी पर जैसे जैसे लोग निजी कंपनी के दुल्हे को तरजीह देने लगे है वैसे वैसे यह और विकराल होता जा रहा है। बेटियों के पिता कें लिए बेटी की शादी करने में आज जो सबसे बड़ी दिक्कत हो रही है वह यह कि दुल्हे के पिता के पास जब शादी की बात लेकर लोग जाते है तो ंअभी शादी नहीं करने की बात कह कर टरका दिया जाता है उकसे बाद शुरू होता है दौर दुल्हे के पिता को शादी के लिए राजी करने का दौर और फिर सारी उर्जा लगा कर जब उन्हें शादी कें लिए राजी किया जाता है तो उनकी फर्माइशंंंें की फेहरिस्त इतनी लंबी होती है कि उसे पूरा करने में पसीने छूट जाते है और दहेज में कटौती की बात ही नहीं आती है।

दहेज के इस विकराल रूप की वजह से जहां कन्याओं को जन्म से पहले ही मार दिया जा रहा है वहीं पुरूष और महिला अनुपात में महिलाओं की संख्या कमने का प्रभाव भी दहेज पर पड़ता नज़र नहीं आता है। कन्या भ्रुण हत्या जैसे जधन्य अपराध करने वाले मां-बाप जहां दहेज को ही तर्क बना रहें है वहीं समाजिक स्तर पर इसके लिए कोेई पहल होती नज़र नहीं आती।


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