19 मार्च 2012

एक छोटी सी बड़ी बात।


बड़की माई (चाची) आज अपनी पतोहू को गरिया रही थी-मुंह झौंसी, सोगपरौनी....।
मैंने पूछ लिया - की होलो बड़की माई...? 
बड़की माई का गुस्सा और भड़क गया- की बताइओ बेटा, ई मुंहझौंसी जब से अइलौ हें हमरा घर के उजारे पर पड़ल हौ, जैसे तैसे गोबर गोइठा ठोक के दो-चार रूपया जमा करो हियौ ई मंहगी के जुग में और ई एगो सलाय (माचिस) दू महिना भी नै चलाबो हौ।
काश की बड़की माई की यह आवाज देश के कर्णधार राजनेता सुन  पाते.....

1 टिप्पणी:

  1. राजनेता तो राजनेता ,क्या इस देश की जनता भी सुन पाती है ?किसी को पता है कि इनकी संताने कितना कागज़, कितनी पेंसिलें पेन और कितना सामान बर्बाद कर रही हैं .लोगों के पास कितने फ़लतू कपड़े हैं,कितने जोड़ जूते , और अल्लम-गल्लम सामान .कितना पानी बर्बाद होता है ,कितनी बिजली फुँकती है और भी जाने क्य-क्या ,कभी किसी ने सोचा ?
    अगर लोग सोचने लगें तो नेता तो उन्हीं लोगों में आने-जानेवाली
    चीज़े हैं कितना टिकेंगे !
    - प्रतिभा सक्सेना

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