14 दिसंबर 2014

फैंसी मैच जानबूझ कर हारना खेल भावना के साथ बलात्कार....


आज कॉलेज मैदान में जिला प्रशासन और नागरिक एकादश के बीच फैंसी क्रिकेट टुर्नामेंट का आयोजन हुआ जिसमें एक खिलाड़ी के रूप में मैं भी आमंत्रित था और खेलने गया भी। पच्चीस साल बाद मैं उसी मैदान में उतरा जहां कभी अपने गांव की आरे से कप्तान हुआ करता था पर उस समय मुझे आत्मग्लानी हुई जब एहसास हुआ की जिलाधिकारी, एसपी सहित अन्य अधिकारियों को जानबुझ कर जीतने का मौका दिया जा रहा है। 

इस बात की खबर मुझे तब लगी जब तीसरे या चौथे ऑवर में बहुत ही परिश्रम से मैने जिलाधिकारी का कैच पकड़ लिया पर एम्पायर ने उसे नो वॉल घोषित कर दिया तब भी मुझे इस बात की भनक नहीं लगी, खबर तब लगी जब थोड़ी देर में मेरे आयोजक मित्र ने कहा कि इस तरह का कैच नहीं पकड़ना है और जिला प्रशासन की टीम को जीतने देना..! जानकारी मिलते ही मैं मैदान छोड़ कर बाहर हो गया। सचमुच जिला प्रशासन की टीम की जीत हुई। सारे शिल्ड और पदक पदाधिकारियों के बीच वितरित कर दिया गया और चम्चागिरी की सारी सीमाओं को लांध दिया गया। बतौर खिलाड़ी मुझे भी पदक लेने बुलाया गया पर मैंने अपना विरोध दर्ज कराते हुए पदक ग्रहण नहीं किया।
निश्चित ही प्रशासन और नागरिक के बीच इस तरह का मैच एक सराहनीय पहल है जिसकी वजह से मैं भाग लिया पर जिस तरह से खेल भावना के साथ बलात्कार किया गया वह धोर निंदनीय है... और आज मैं आत्मग्लानी से भरा हुआ इस मौच का हिस्सा बनने पर अपने आप को कोस रहा हूं.....

6 टिप्‍पणियां:

  1. बचाना भगवान चमचो से चमचो से बचाना वैसे है बड़ा मुश्किल काम

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (15-12-2014) को "कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू" (चर्चा-1828) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कम से कम खेल भावना का तो सम्मान होना ही चाहिए.
    नई पोस्ट : गया से पृथुदक तक

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  4. बहुत ही अच्छा लिखते हो जनाब लगे रहिये (Keep going so Inspirational and motivational)

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    जवाब देंहटाएं
  5. अधिकारीयों की चापलूसी करने का यह भी एक अच्छा तरीका है , सरीखे स्वाभिमानी व्यक्ति को यह अनुचित लग सकता हो, पर जिन्होंने इस हेतु ही इसे आयोजित किया हो उन्हें खेल, व आप की भावना से क्या लेना देना

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