22 मार्च 2016

जी लूँ जरा

जी लूँ जरा
*****
मन भर दुःख
दिए
और छटांक भर
ख़ुशी

पहाड़ सी
परेशानी दी
और
मुठ्ठी में रेत सी
हंसी...

अमावस की
रात सी
नफरत दी
और
जुगनू सा
टिमिर-टिमिर
प्रेम

परमपिता
टनों से राख तौलते है
और
रत्ती से सोना

रत्ती भर जो मिला
उस अमृत रस को
पी लूँ जरा
छटांक भर
ख़ुशी को
जी लूँ जरा
जी लूँ जरा

(अपने जीवन और अनुभव पे #साथी के दो शब्द)
22/03/2016

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...