11 अप्रैल 2018

भारत बंद! आग ही आग! सोशल मीडिया का बड़ा खेल कैसे...

सोशल मीडिया की ये आग कब बुझेगी! आरक्षण, दलित, सवर्ण, मुस्लिम, हिन्दू.. आग ही आग

जिस समय सोशल मीडिया कॉल पे भारत बंद में नंगई हो रही थी ठीक समय फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग से उनकी सरकार पूछताछ कर रही थी और वे माफी मांग रहे थे। बाद में जुकरबर्ग ने प्रेस में कहा कि कैंब्रिज एनालिटिका में लीक हुए डाटा का असर भारत के चुनाव में नहीं पड़ने देगा और उसी समय भारत जल रहा था।

फेसबुक और व्हाट्सअप पर भारत बंद के बेनामी आह्वान को हाथों में स्मार्ट मोबाइल रखने वाले कम उम्र के नौजवानों ने हाथों हाथ लिया। इस बेनामी आह्वान पर कम उम्र के नौजवान सड़क पर उतरे और मेरे यहां बिहार के बरबीघा में जम कर आतंक मचाया। युवाओं में इतना आक्रोश था कि वह मरने-मारने पर उतारू थे। यहां तक की जब पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े तो बंद समर्थकों की भीड़ की तरफ से गोलीबारी की गई! खैर!

सोशल मीडिया इम्पैक्ट

दस अप्रैल को भारत बंद ने साबित कर दिया कि भारत में सोशल मीडिया का गहरा इम्पैक्ट है। चुनाव को प्रभावित करने से कहीं ज्यादा। समाज को प्रभावित करने का। दो अप्रैल को हुए भारत बंद पर भी सोशल मीडिया इंपैक्ट रहा। सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटी एक्ट में कोई बदलाव किए बिना पुलिस के अधिकारों के दुरुपयोग में हस्तक्षेप करने की बात को सोशल मीडिया पर एससी एसटी एक्ट में बदलाव करके प्रचारित किया गया। इस बदलाव को वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं ने हवा दे दी और फिर देश में नंगा नाच हुआ। दस लोगों की जानें गई। करोड़ों का नुकसान हुआ। ठीक उसी दिन फेसबुक और व्हाट्सएप पर दस अप्रैल को भारत बंद लिखकर एक पोस्ट को वायरल किया गया और फिर दस अप्रैल को भी नंगई सामने आए।

देश नहीं बचेगा

वर्तमान परिस्थिति में यदि किसी से भी बात किया जाए जो सोशल मीडिया पर हैं तो अपने अपने पक्ष को अतार्किक रुप से सही बताते हैं। हाल ही में एक पोस्ट वायरल नजर आया जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों को लगता है कि आरएसएस आईएसआईएस जैसा बन जायेगा। हिंदुओं को लगता है कि मुसलमान इतनी जनसंख्या में आएंगे कि भारत पर उनका कब्जा हो जाएगा औरंगजेब का शासन होगा। दलितों को लगता है कि मनुस्मृति लागू की जा रही है। सवर्णों को लगता है कि आरक्षण नहीं तो जीवन का अंत हो जाएगा। यह सब बहुत हद तक सोशल मीडिया इंपैक्ट है और यह सच भी है। यही लगता है। और इसी लगने का नजीता है भारत बंद। दंगा। उन्माद।

कांग्रेसी सहित बिपक्ष को लगता है हिन्दू को तोड़कर ही मोदी को मात दे सकते है इसलिए दलित मुद्दा भड़का रहे। सवर्णो को लगता है बीजेपी उनके आरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रही। बीजेपी के नेता चुप है। जान रहे है दलित वोट बैंक बड़ा। खिसका की खेल खत्म। मुस्लिम तो खैर आजतक मोदीजी को अपना प्रधानमंत्री तक नहीं मानते। नफरत इतना कि पाकिस्तान जिंदाबाद कर देते है। सब शतरंजी खेल है। पोलटिक्स। कौन सा घोड़ा कब लंघी मरेगा यह सिर्फ माहिर खिलाड़ी ही भांप सकता है। आम आदमी तो प्यादे है। प्यादे की तरह चलते है। एक घर। सीधा। सपाट।

बाकी मंत्री और राजा का जलवा जमा हुआ है। नेताजी अपनी अपनी रोटी सेंक लेंगे। सबका फायदा। दोनों तरफ ध्रुविकरण है। आम आदमी को हमेशा की तरह मिलेगा शक्करकंद...घरिघण्ट

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मौत से लड़कर रोहित का चला जाना.. गम दे गया.. (अरुण साथी) मुझे ऑक्सीजन की जरूरत है, कहाँ मिलेगा.…..तकलीफ हो रही है...रोहित का कॉल। एक लड़खड़ात...