23 फ़रवरी 2014

सूरज और मैं

रोज रोज मद्धिम सा
लाल-पीला
हर घर, हर देह पर
पड़ती है धूप.....

सुबह में शीतल
दोपहर में गर्म
और शाम में फिर शीतल...

और फिर रात्री विश्राम
जिसमें होता है अंधेरे का साम्राज्य
और फिर सूरज निकलता है
यह जीवन चक्र
और मैं
जाने क्ंयू
अपनापा सा लगता है
कुछ कुछ...

4 टिप्‍पणियां:

  1. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अमीर गरीब... ब्लॉग-बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. अरूण जी इसी जीवन चक्र के साथ ना जाने कितने जीवन चक्र और जुडे हुये है. सुन्दर अभिव्यक्ति.

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