रोज रोज मद्धिम सा
लाल-पीला
हर घर, हर देह पर
पड़ती है धूप.....
सुबह में शीतल
दोपहर में गर्म
और शाम में फिर शीतल...
और फिर रात्री विश्राम
जिसमें होता है अंधेरे का साम्राज्य
और फिर सूरज निकलता है
यह जीवन चक्र
और मैं
जाने क्ंयू
अपनापा सा लगता है
कुछ कुछ...
लाल-पीला
हर घर, हर देह पर
पड़ती है धूप.....
सुबह में शीतल
दोपहर में गर्म
और शाम में फिर शीतल...
और फिर रात्री विश्राम
जिसमें होता है अंधेरे का साम्राज्य
और फिर सूरज निकलता है
यह जीवन चक्र
और मैं
जाने क्ंयू
अपनापा सा लगता है
कुछ कुछ...
भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...
जवाब देंहटाएंअरूण जी इसी जीवन चक्र के साथ ना जाने कितने जीवन चक्र और जुडे हुये है. सुन्दर अभिव्यक्ति.
जवाब देंहटाएंवाह...यही जीवन चक्र है ....
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