16 मार्च 2015

"किट्टी" और मौत का अनुभव

यह मेरे गाँव की कुत्ती किट्टी है । बच्चों ने यह नाम दिया है । अभी दो माह की है । कुछ दिन पहले भतीजा गोलू सुबह सुबह आया और बहुत उदास होकर अपनी तोतली आवाज़ में कहने लगा "अंकल..डोक्टल बुला दहो, छोटुआ ओक्ला जहल दे देलकै ।" दरअसल उसने दो तीन बार समझाया तो समझ सका की जिस कुत्ते के बच्चे को वह रोज खाना खिलाता है उसे एक बच्चे ने जहर खा कर मर गया चूहा खिला दिया, इस वजह से वह दो दिन से पड़ी हुयी है और उसका एक भाई मर गया है माँ भी गंभीर है । मैंने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया तो वह डॉक्टर बुलाने की जिद्द करने लगा । मैंने जाकर देखा तो सच में किट्टी बेसुध पड़ी हुयी थी, मरणासन्न ।
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मुझे कुछ समझ नहीं आया । एक आवारा कुत्ते के बच्चे के लिए डॉक्टर कहाँ से बुलाता । यह मेरी असंवेदनशीलता थी । मैंने उसे समझा दिया की यह भी मर जायेगी । डॉक्टर खोजता हूँ मिलेगा तो लेता आऊंगा ।
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7 साल का गोलू बहुत उदास हो गया । लगभग रोने लगा । दो दिन बाद पता लगा की किट्टी को पड़ोस का कोई भी बच्चा या बड़ा खाना देता है तो वह नहीं खाती है पर गोलू खाना देता है तो खा लेती है । संतोष हुआ की वह जीवित है और इस सब के पीछे गोलू का बहुत योगदान है । उसने झाड़ में बेसुध पड़े किट्टी की लगातार सेवा की । उसे समय समय पे खाना और पानी देता रहा । माँ की पिटाई के बाद भी अपने हिस्से का दूध वह किट्टी को दे आता ।
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आज किट्टी जीवित है और गोलू से बहुत प्यार करती है । दूसरे का दिया खाना अभी तक किट्टी नहीं खाती । हर खाना देने वाले को संदिग्ध नजर से देखती है ! किट्टी को देख मैं खुद लजा जाता हूँ, अपनी संवेदनहीनता पर, पर गोलू की संवेदना और उसके प्रेम में शायद एक जीवन को बचा लिया । काश की हम सब में इतना ही निश्छल, निःस्वार्थ, अबोध प्रेम होता । गोलू जैसा....ही...@ अरुण साथी

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मार्मिक ........सच बच्चों सा मासूम और निश्छल कोई नहीं

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-03-2015) को "मायूसियाँ इन्सान को रहने नहीं देती" (चर्चा अंक - 1921) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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