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गजेन्द्र की मौत पर उनको खुशी क्यों है..?

 (अरूण साथी)
जंतर मंतर पे आप पार्टी की रैली में किसान गजेन्द्र जी ने पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली और आत्महत्या के बाद भी आप नेता केजारीबाल सहित अन्य रैली को संबोधित करते रह गए, यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है और इसकी जितनी निंदा की जाय कम होगी। इसके पीछे राजनीतिक चमकाने को लेकर भी सवाल उठ रहे है तो इसकी भी न्यायिक जांच होनी चाहिए और सच को सामने लाया जाना चाहिए। इस तरह की अमानवीय घटना को यदि राजनीति चमकाने के लिए प्रायोजित किया गया होगा तो वह केजरीबाल हो यह कि भगवान उसे सजा मिलनी चाहिए।
इस सबके बीच एक बात भी ध्यान खिंचती है। गजेन्द्र की मौत पर एक खेमे में एकबारगी खुशी की लहर क्यों दौर गई? क्या यह सवाल नहीं उठता कि किसानों के मुददे पर घिरे मोदी सरकार का खेमा इस मौत पे मातम कम जश्न अधिक मना रहे है। इस खेमे में कहें तो सोशल मीडिया पर सक्रिया उनके भक्त और कुछ न्यूज चैनल भी शामिल नजर आ रहे है। इस पूरे घटनाक्रम में किसान की मौत का मुददा गौन हो गया और केजरीबाल की रौली में मौत होने और केजरीबाल के रैली करते रहने का मुददा प्रयोजित तरीके से प्रमुख हो गया, क्यों? 
कुछ बातें जो सामने आ रही है वह यह कि गजेन्द्र कोई इतना भी गरीब किसान भी नहीं थे कि आत्महत्या की नौबत हो। वह एक सम्पन्न किसान थे और वह साफा का व्यापारी भी, जिसकी तस्वीरें भी सामने आई है। उनके गांव में शव पहूंचते ही गांव के लोग उन्हें एक शहीद बता रहे है। गांव वालों की माने तो वह किसानों की आवाज सत्ता तक पहूंचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी। वे चाहते थे कि किसानों की सही आवाज सत्ता तक पहूंचे, तो क्या आज उसकी आवाज सत्ता तक पहूंच सकी, या कि जो माध्यम है, वही उनकी मौत की आवाज की दिशा को बदल दिया है?
वैसे किसानों की छाती चटटान सी होती है। उसे आत्महत्या नहीं करनी चाहिए। इस तरह के कायराना हरकत से कुछ लोग पूरी किसान कौम को शर्मसार कर रहे है। जो किसान बंजर जमीन की छाती को चीर कर अन्न उपजा ले, वह आत्महत्या क्यों करेगा? 
फिर भी किसानों की समस्याओं को कमतर आंका जाता है। अभी बिहार में धान खरीद में अरबों अरब का घोटाला हुआ है। सभी जिलों में असल किसान का धान व्यापारी औने पैने दामों पर खरीद लिए और फिर उसी को उचीं कीमत पर सरकार को बेच दिया, यह है किसानों की असल समस्या। खेती के समय किसानों को 280 पर बिकने वाला उर्वरक 500 सौ में खरीदनी पड़ती है और अधिकारी कालाबाजारियों से मोटी उगाही कर चुप रहते है, यह है किसानों की असल समस्या। केसीसी लॉन भी असल किसानों को नहीं मिलती और मिलती भी है तो बीस प्रतिशत कमीशन देकर, यह है किसान की असल समस्या। मेरे शेखपुरा जिले में (बिहार) 95 प्रतिशत सरकारी नलकूप बंद है और सरकारी फाइलों पर पच्चास प्रतिशत चालू और फाइलों पर चल रहे इन नलकूपों पर करोड़ों खर्च हो रहे है, यह है किसानों की असल समस्या। अनुदान पर मिलने वाले नलकूप हो यह कृषि यंत्र तीस से चालीस प्रतिशत कमीशन खाई जाती है और किसान  तड़प कर रह जाता है, यह है किसानों की असल समस्या। फसल बीमा का लाभ किसानों को मिलता ही नहीं है, यह है किसानों की असल समस्या। शेखपुरा जिले के किसान मेहनत कर प्याज उपजा लिए है पर आज उसे कोई खरीदने वाला नहीं है, हाय रे किसान...।
किसानों के समस्याओं का अंबार है और खुदा के लिए गजेन्द्र जी की मौत को जाया न जाने दिजिए और किसानों के बाजीब समस्याओं को लाइम लाइट में लाइए, राजनीति से हट कर, ताकि हासिए पर गए किसान फिर से खेती कर सकें और देश खुशहाल हो सके....केजरीबाल की धोर निंदा किजिए पर प्लीज मातम के विषय पर खुशी न मनाइऐ....और अन्त में बिहार में उसी समय आए चक्रवाती तुफान में 60 से अधिक लोग मर गए कोई हमारी भी तो फिक्र किजिए...

टिप्पणियाँ

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.04.2015) को "आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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