24 अप्रैल 2015

बूढ़ा बरगद

बचपन का एक बड़ा हिस्सा इसी की गोद में बीता है और जाने कितनी ही यादों को समेटे हुए यह आज भी खिलखिला रहा है । हालाँकि अब यह बूढ़ा हो गया है पर जैसे ही इसके करीब गया तो लगा की इसने मुझे पहचान लिया है । एक अपनापन है मुझे इस बूढ़े बरगद से । जैसे यह भी कोई अपना ही हो; आत्मीय...
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इसकी गोद में बचपन का असीम सुख पाया ।
इसकी हवा में झूलती जड़ों ने हमें झूला झुलाया ।
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माँ सी विशाल हृदय शाखाओं ने चैन से सुलाया ।
माँ की मार से बचने के लिए दिन भर छुपाया ।।
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जेठ की गर्मी और भादो की बारिस से हमें बचाया ।
पशु-पंछी, बूढ़ा-बुतरू, सबने यहाँ जीवन गीत गाया ।।

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...