27 अप्रैल 2015

गाँव के लोग ...

भूकंप ने सबको डरा तो दिया है पर गाँव के लोग बहुत कम भयभीत है । गेहूँ मैंजने का समय है और खलिहानों में ट्रेक्टर के साथ चलनेवाला हथिया थ्रेसर गडगड गरज रहा है । गाँव में भूसे का गर्दा उड़ रहा है । अपने बेटे को कोसते हुए शिबालक का कह रहे है " नलैकबा दिन-रात टंडेली करते रहो हो । हथिया थ्रेसर में बिना तीन-चार आदमी के मैंजनी होबो है । जीन्स औ टीसट झाड़ के गुटका चिबैते रहो है यहाँ हमरा गाड़-गोहलत होल है ।" भूकंप के बारे में पूछने पे कहते है " हमरा कहाँ पता लगलो, कट्टु ढो रहलियो हल, यहाँ किसान के जिनगी में तो रोज भूकंपे आबो है, एक बीघा में आठ मन गहूँम होलो हें औ ओकरा उपजाबे में ओकरा से जादे खर्चा हो । की करियो छो मासी पैदा है अबरी नै तो अगला बार होतई । 
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गाँव में अफवाह का भी कोई खास असर नहीं दीखता । सब अपने अपने कम के हिसाब से जुटे हुए है । आठ बजते बजते ज्यादातर लोग सो जाते है । नाइकी चाची चिल्ला रही है । "ऐतना पाप धरती पर बढ़ गेलो है बउआ त धरती डोलबे करते नै । कुल पपियहा सब लूट पाट के जग हवन करो है त नाग बाबा पुछिया हिला दे हखिन औ भूकंप आ जा है ।"
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उधर फुफ्फा सुराज सिंह गरम हें । जहाँ दुनिया बेटी के जन्म पे शोक मनाती है और गर्भ में ही मार देती है वहीँ उनकी गाय ने चौथी बार बाछा (बेटा) को जन्म दिया है । बहुत चिंतित है । " बोलहिं तो सोंचलिय की बाछी बिया जेतै त जरोह हो जात पर बाछे बिया रहल हें ।" 
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मैं उसी बाछा के साथ सेल्फ़ी खीच लिया । आज बिसतौरी (जन्म के बीस दिन बाद गाय का दूध पीने की परम्परा) पूरा हो गया है और इसी की माँ का दूध आज से पीने का सौभाग्य मिलेगा । देशी गाय का दूध अहोभाग्य होता है । ओशो कह गए है की मौत तो निर्धारित समय पे ही आनी है फिर मौत से पहने क्या रोज रोज मारना.? फिर ही भूकंप में मरे लोगों की वजह से मन गम में डूब जाता है । उनको एक श्रद्धांजली..

एक भूमिहार ब्राह्मण रमेश सिंह भला भूख से कैसे मर सकता है...? सबका यही सवाल..

( मैं हूँ ट्विटर पे @arunsathi ) घटना उद्वेलित भी करती है और उद्विग्न भी। मंगलवार की शाम जब यह खबर मिली की भूख और आर्थिक तंगी की वजह से शे...