13 फ़रवरी 2018

नपुंसक समाज को लिंग दिखता एक नपुंसक

नपुंसक समाज को लिंग दिखाता एक नपुंसक

दिल्ली की खचाखच भरी  एक बस में जब एक नपुंसक आदमी नपुंसक समाज के सामने अपना लिंग निकालकर उसका प्रदर्शन करता हो और एक दिलेर छात्रा इसका वीडियो बनाकर ट्विटर पर सार्वजनिक करती हो तब इस बात को समझ लेना चाहिए कि आदिम युग से दुर्गा और महिषासुर कि पुनरावृत्ति आज भी होती रही है। वैसे तो उस बस में बहुत सारे लोग होंगे पर निश्चित रूप से उसमें कोई जिंदा आदमी सफर नहीं कर रहा होगा। लाशों के बीच एक जिंदा लाश भी थी जो अपनी बच्ची की उम्र के एक बच्ची को अपना लिंग दिखा कर अपनी राक्षसी मनोवृत्ति को तुष्ट कर रहा था।

दरअसल यह बस और इसकी यह घटना विकृत पुरुष समाज के मानसिक विकृति का एक आईना है जो सदियों से महिलाओं के साथ इसी तरह से पेश आता रहा है। बेटियां कैसे यह सब झेल कर आगे बढ़ती है यह उसके अदम्य साहस का ही परिचायक है।

इसी बस की घटना ने यह भी साबित किया की बेटी वास्तव में दुर्गा का रुप होती है और जब भी महिषासुर दानव अपनी विकृति का प्रदर्शन करता है तब उस का मान मर्दन करने, उसके रक्तबीज को खत्म करने के लिए दुर्गा अवतरित होती है। वही बेटी काली के रूप में भी राक्षसों के रक्तबीज का नाश करती है। दिल्ली के बस की यह घटना इस बात का भी धोतक है कि हम जिसे समाज कहते हैं दरअसल वह जिंदा लाशों का कब्रिस्तान है और इन जिंदा लाशों के कब्रिस्तान के पीछे हम सब सड़ांध पर केवल अपनी नाक पर रूमाल रख लेते हैं।

जिंदा लाशों के बीच कहीं-कहीं, कोई-कोई जिंदा आदमी भी दिखता है और वही जिंदा आदमी संभावना है इस बात का कि आज ना कल हमारा समाज भी जिंदा समाज बनेगा।

और गुलाटी जैसी बेटी हमें अक्सर जिंदा लाश साबित करने का साहस दिखाती रही है।

पर अफसोस इस बात का है कि इतनी शर्मनाक घटना के बाद तथाकथित अदम्य साहसी और पराक्रमी सरकार अभी उस महिषासुर को गिरफ्तार नहीं कर सकी है।

और तो और इस घटना पर उस महिषासुर की गिरफ्तारी ही सजा नहीं है बल्कि चौबीस घंटे के अंदर उसे स्पीडी ट्रायल के जरिए स्पेशल कोर्ट में सजा सुनाई जाए तभी एक दुर्गा रूपी बेटी के अदम्य साहस का हम सम्मान कर सकेंगे वरना केवल सोशल मीडिया पर उस दुर्गा रूपी बेटी को शाबाशी देने से यह एक औपचारिकता भर ही साबित हो कर रह जाएगी...

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