23 अगस्त 2010

पत्रकारों के आत्मदाह के लिए उकसाने से हुए युवक की मौत का जिम्मेवार कौन................



यह कोई आम खबर नहीं है। मीडिया के लोगों ने खबर के लिए आत्महत्या के लिए उकसाया, उसे वह बचाने नहीं गया और युवक की मौत हो गई । अखबरों नें न्यूज चैनल को नीचा दिखाने के लिए तो मिडिया को कोसने वाले पोर्टलों पर टिप्पणी बटोरने के लिए खबर दे मारी गई है। एक तो यह बात हजम होने वाली नहीं कि मीडिया वालों ने उसे आत्मदाह के लिए उकसाया और बचाने की कोशिश नहीं की, दूसरी यह की यादि ऐसा हुआ तो पुलिस क्या कर रही थी जिसके सामने यह हो रहा था और जिसकी वजह से हो रहा था। और इस घटना के पीछे मीडिया के महारथियों को भी अपने दामन पर खून के छींटे तलाशने होगें।



बात महज एक खबर भर की नहीं है बात उससे आगे की है। मैं मीडिया का पक्ष लेकर यह नहीं कहना चाहता कि यहां सब कुछ अच्छा-अच्छा है। गुजरात के उंझा पुलिस स्टेशन में धटी घटना जिसमें पुलिस जुल्म के खिलाफ कपलेश मिस्त्री ने आत्मदाह कर लिया और उसकी मौत हो गई। इस घटना का आरोप टीबी 9 के पत्रकार कमलेश रावल और स्थानीय चैनल रिपोर्टर मयुर रावल पर आया। आरोप है कि पत्रकारों ने आत्महत्या के लिए उकसाया और बचाने का प्रयास नहीं किया। इस मामले में बहुत सी बातें हैं जिसकी जांच होनी चाहिए। पत्रकारों पर पुलिसबाले वैसे भी खार खाये रहते है और जब वह चंगुल में फंसता है तो वे कोई कोर कसर नहीं रखना  चाहते। इस मामले में चाय दुकानदार की गवाही है जो की पुलिस से प्रभावित हो सकती है। दूसरी बात मोइबाल पर बातचीत है जो कि आत्मदाह करने वाला कोई भी पुलिस पर दबाब के लिए पत्रकार के साथ करेगा। 

इस घटना से कई बात एक साथ सामने आती है। एक तो यह कि समाचार के लिए पत्रकार इस हद तक जा सकते है कि किसी की मौत हो सकती है कल्पना कर ही कलेजा कांप जाता है। दूसरी यह कि अंधाधुंध मीडिया में हो रही पत्रकारों की फैज भर्ती प्रक्रिया में आज जो लोग आ रहें है उनसे इसी तरह की उम्मीद की जा सकती हैंं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि पुलिस के द्वारा पत्रकारों को फंसाने के लिए यह एक प्रायोजित प्रक्रिया भी हो सकती है। बहरहाल यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएगा पर अभी जो बात सामने है और वही सच है तब भी इस हत्या का आरोपी महज वह पत्रकार नहीं हो सकते जिन्होंने ऐसा किया है बल्कि वे सभी लोग इसमें शामिल है जो टीआरपी के दौर में रेस लगा रहें हैं और खबरों के लिए पागल हो रहे है। वे लोग भी इसके गुनाहगार है जो पत्रकारों की नियुक्ति में मापदण्ड को दरकिनार कर महज विज्ञापन देने वाले और सनसनी खेज खबर देने बाले चिरकुट को पत्रकार बना रहें है। कोई मापदण्ड नहीं कोई पैमाना नहीं। मैं यह खीज कर नहीं कह रहा हूं बल्कि ऐसा होता देख रहा हूं । आप सब मिडिया से जुड़े बंधू इससे बाकिफ हैं।

 कल तक लफुआ की श्रेणी मे आते थे आज पत्रकार कहलाते है। कोई अब्बल दर्जे का फ्राड है तो कोई चैनल में काम करने से पहले पॉकेटमारी का काम करता था और आज चौथेखंभे का दंभ भरता है। वानगी देखिए- ताजा ताजा नम्बर 1 कहलाने वाले अखबार के रिर्पोटर बने एक परिचित का मुझसे इस बात के लिए बार बार आग्राह किया जाता था कि उन्हें भी पत्रकार बना दिया जाए पर उनके बारे में मैं जानता था और कई अवसर आने के बाद भी मैंने उनके लिए पहल नहीं की पर आज वे पत्रकार है और इसके लिए उन्हें एक बड़ी सी पार्टी देनी पड़ी जिसमें सभी ने छक कर शराब पी। दूसरे एक मित्र के अखबार में शिकायत जाने के बाद उसकी जांच के लिए रांची से जांच दल आई और जांच दल के ठहराने के लिए होटल का कमरा, जांच के लिए जाने के लिए एसी गाड़ी से लेकर भोजन तक की व्यवस्था आरोपी के द्वारा की गई और जिसने शिकायत की थी उनके यहां पत्रकार के साथ जांच दल के सदस्य गए और पूछा, वैसे तो मुझे अपने रिपोर्टर पर भरोसा है पर फिर भी आप से इसकी पुष्टी के लिए आये है। एक भोजपुुरिया न्यूूज चैनल के रिर्पोटर समाचार संकलन के बाद लौटते ही सुनाते है साला एक हजारा ही दिया बहुत कंजूस है चलिए बोहनी हो गया। क्या क्या कहें सब लोग सब कुछ जानते है तब दोषी कौन और निर्दोष कौन।

बस दूसरे की तरफ उंगली उठाकर हम खुद को बेगुनाह साबित करते रहें और लोकतन्त्र का चौथा खंभा शर्मशार होता रहे। जय हो.............................







क्या होगा, ऐसे लोग क्या करेगे। जहां नैतिकता नहीं, संवेदना नहीं और आत्मसम्मान नहीं वहां पत्रकारिता कहां बचेगी। तब बचेगा सिर्फ दूसरे को कोसने की वजह और अपने गिरेवां में नहीं झांकने का सुनहला तर्क जिसके सहारे हम बेगुनाह होगें और सामने वाला गुनहगार।

सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...