28 अगस्त 2012

मैनेज कर लो भाई, अखबार या चैनल देता ही कितना....!

अरूण साथी
शुक्रवार, स्थान शेखुपरा जिले का बरबीघा नगर। पिछले 18 तारिख से बरबीघा थाना के ठीक सामने गेसिंग, जुआ का अड्डा खोल देने की सूचना मिली और 20 को जा कर जांच किया तो मामला सही पाया। फिर इसके बारे में जानकारी इक्कठी की तो पता चला कि उच्चाधिकारियों से 50000 प्रतिमाह में सेटिंग हुआ है। एसपी एक आइपीएस हैं पर उनके नाम पर उनका एक बोडीगार्ड रूपये का लेनदेन करता है जिससे जिले में भ्रष्टाचार की खुली छूट है।
  खैर, एक दिन बाद पता चला कि मीडिया को भी मैनेज किया गया है, कितना में यह कह नहीं सकता क्योंकि मेरे पास मैनेज करने कोई नहीं आ सकता, कारण सर्वविदित है कि यहां जाओगे तो उलटा पड़ सकता है। कई बार इस चक्कर में पुर्व में हंगामा हुआ है।
    खैर, 24 तारीख को सुबह प्लान बना कर गेसिंग के अड्डे पर धावा बोल दिया। साथ में कोई कैमरा मैन तो रख नहीं सकता क्योंकि कम्पनी अफोर्ड नहीं कर सकती तो हेल्प के लिए सहयोगी मुकेष कुमार को साथ ले चला। मन में डर भी लग रहा था कि जो लोग थाना के सामने गेसिंग खोल सकता है वह दबंग भी होगा पर चला गया। कैमरा खोलते ही संचालक और जुआ खेलने वाले भागने लगे। न्यूज धंटो बनाया। सारी बात उठाई। ऑफिस आ गया। दरोगा का बाइट लिया। एसपी को मोबाइल कर उसका वर्जन लिया, क्योंकि वह बाइट नहीं देती। पत्रकार के डर से ऐसे भागती है जैसे बिल्ली को देख कर चूहा।
    न्यूज भेजना शुरू किया। तभी मेरे एक बुजुर्ग सहकर्मी आ धमके। उनके मोबाइल पर फोन आया जो दूसरे अखबार के रिपोर्टर थे। दोनों में बाहर जाकर वार्ता हुई। फिर उन्होने चर्चा चलाई इस बार बख्स दिजिए, मैनेज कर लिजिए, न्यूज भेज कर क्या मिलने वाला, अखबार या चैनल देता ही कितना है।
    खैर, मैनेज तो नहीं किया पर इतने दिनों के बाद अब थकने सा लगा हूं ... ....भविष्य की सोंच कर..... ईमान भी डोलता है....देखें कब तक बचा पाता हूं..

20 जुलाई 2012

कसौटी पर असफल... अंडरग्राउण्ड राहुल गांधी......


अरूण साथी
बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हूं, राहुल गांधी का यह बयान बड़ा ही हास्यास्पद है। इससे पहले दर्जनों छोटी भूमिकाओं को निभाने में असफल रहे राहुल गांधी जब इस तरह का बयान देते है तो माथा ठोकने का मन करता है।
राहुल का यह कहना कि यह निर्णय पार्टी नेतृत्व और मनमोहन सिंह पर निर्भर है और भी बचकाना है। सबको पता है कि अभी तक पूरी तरह से असफल युपीए सरकार और अन्डरएचीवर पीएम के नेपथ्य में निर्देशक मां-बेटे ही रहे है।
पहली बार राहुल गांधी को देखने भर का मौका पिछले विधान सभा चुनाव में मिला जब अपने उम्मीदवार अशोक चौधरी के लिए चुनाव प्रचार लिए आए थे। भीषण गर्मी, हजारों की भीड़। भारी भरकम सुरक्षा व्यवस्था। कवरेज के लिए कई चैनलों का ओवी वैन। पैड न्यूज का जलबा। तभी अचानक आजतक का ओवी वैन बैरीकेटिंग के बगल में आकर खड़ी हो गई। रिर्पोटर मंच के नजदीक जाने का रास्ता तलाशने लगे। तभी तीन चार सुरक्षा अधिकारी उनकी ओर लपके, राहुल के आने में  अभी देर थी। अधिकारी रिर्पोटर पर बरस रहे थे-गिरफ्तार कर आतंकबादी धोषित कर देगें, क्या समझतो हो। बैन को पीछे ले जाओ। सभी हतप्रभ। मुझे लगा कि राहुल गांधी न होकर कोई आठवां अजूबा आने वाला हो।
फिर राहुल ने भाषण पढ़ा। भावशुन्य, उनके उम्मीदवार का  पराजय।
बिहार में लोकसभा हो या विधान सभा चुनाव जहां जहां राहुल गए, उम्मीदवार को मुंह की खानी पड़ी। 
एक असफल भूमिका।
फिर 2012 के युपी चुनाव में अपने लोकसभा सीट में अथक परिश्रम के बाद भी उम्मीदवार नही ंजिता सके।
एक असफल भूमिका।
जिस दलित कलावती के घर खाना खाने का नाटक-नौटंकी किए उसके घर को दबंगों ने ढाह-जला दिया, एक व्यक्तिगत परिवार के साथ न्याय-विकास संभव नहीं हो सका।
एक असफल भूमिका।
2009 में मंत्रीमंडल गठन में इनके ईशारे पर कई चहेतों को मंत्री पद मिला और राहुल की भूमिका को देश को नई दिशा देने बाला बताया गया, वही सरकार आज घोटालों का प्रर्याय बन कर रह गई।
एक असफल भूमिका।

जनलोकपाल बिल, अन्ना टीम, बाबा रामदेव और रामलीला मैदान। नेपथ्य में राहुल गांधी मुख्य भूमिका में थे, संसद में जनलोक पाल का खुला विरोध और अपरिपक्व भाषण, अन्ना की गिरफ्तारी, अनशनकारियों पर रात में हमला...
राहुल गांधी अंडरग्राउण्ड...
देश के सामने आतंकबाद, किसानों की आत्महत्या, छद्म धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक कट्टरवाद, आतंकियों को सम्मान जैसे मुद्दो पर.. 
राहुल गांधी अंडरग्राउण्ड....

यह राजनीति का वंशबाद नही ंतो और क्या है कि अनेकों बार कसौटी पर असफल रहे, ज्वलंत मुद्दों की समझ नहीं रखने वाले राहुल गांधी को बार बार नई भूमिका देने की बात होती..या फिर रसातल में जा रहे देश के लिए अंतिम कील की व्यवस्था हो रही है।

08 जुलाई 2012

सत्यमेव जयते का दलित उत्पीड़न! सिक्के का दूसरा पहलू भी है..


सत्यमेव जयते में आज दलितो के उत्पीड़न की कहानी दिखाई गई, इसे सिरे से नकारा नहीं जा सकता, पर इनती बुराईओं के बाद भी इसी समाज में अच्छाई भी है जिसको सामने आना चाहिए।

बात बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह से शुरू करना चाहूंगा। श्रीबाबू (पुकारू नाम) ने 1961 में बिहार के देवघर मंदिर में दलितों के साथ मुख्यमंत्री होते हुए प्रवेश किया। भेदभाव और छूआछूत निश्चित ही निंदनीय है पर इसको तोड़ने के लिए भी बहुत लोगो ंने सराहनीय योगदान दिया है। बाबा साहेब अंबेदकर से लेकर अपने गांव तक यह नजारा मुझे दिख जाता है। बाबा साहेब के कार्टून को लेकर भले ही बबेला मचा हो पर उनको अंबेदकर बनाने मंे एक पंडित शिक्षक का ही हाथ रहा है।

मैं अपनी बात भी कहना चाहूंगा। लगन मांझी की पत्नी जिन्हें मै चाची कहता हूं आज भी जब तब कहते रहती है ‘‘अपन छतिया के दूध पिलैलियो हैं बेटा।’’ दरअसल किसी कारणवश टोना टोटका को लेकर मां ने जन्म के समय में ही मुझे इनके यहां बैना (उधार) दे दिया था और उनका ही दूध पी कर मैं इस दुनिया जीना सीखा। आज तक कर्ज है मेरे उपर। 

फिर जब से होश संभाला तब से कभी छूआछूत को नहीं माना। बहुत सारी बातें है पर सहज है। इंटर के समय में बरबीघा में कुछ लोगांे से दोस्ती हुई जिसमें से नीरज, श्रीकांत, कारू, दीपक इत्यादि का नाम है। बाद के दिनों मे दोस्तों की जाति का पता चला। उसी में जाना कि श्रीकांत और दीपक चमार जाति का है, श्रीकांत बगल के गांव जगदीशपुर का रहने वाला। सबकुछ सहज। फिर सबके साथ कई बार धूमने टहलने गया। ककोलत झरना में स्नान के बाद सबने मिल कर खाना बनाया और एक ही थाली में श्रीकांत और मैं खाया। फिर श्रीकांत कें पिताजी का निधन हुआ। सब दोस्तों के साथ मुझे भी न्योता दिया। दोस्तों के साथ मैं श्रीकांत कें घर चला गया। श्राद्ध का भोज खाने। बरसात का दिन और धुप्प अंधेरिया में उसके गांव पहूंचा तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं भोज खाउंगा। किसी ने संकोचवश मुझे खाने के लिए नहीं कहा, पर मैं सहजतापुर्वक सबके साथ पंगत में बैठ गया और भोज खाया।

आज तक भी कहीं  भी मन में यह बात नहीं उठती है। सिक्के के दो पहलू होते है, पर इसमें यह भी सच है कि एक पहलू में अंधेरा धना है और दूसरे पहलू में रौशनी कम। बात जब अंधकार की हो तो साथ साथ रौशनी की चर्चा भी हो जाए तो इसे ईमानदारी कहते है, वरना सदियो से यह मुददा राजनीति भेंट चढ़ती रही है और चढ़ती रहेगी।

24 जून 2012

संपादक हरीश पाठक के जाने की खुशी


राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संपादक हरीश पाठक से बास्ता बस एक जिला कार्यालय प्रभारी और संपादक का था। स्वभावगत चापलूसी नहीं करने और काम से काम रखने की आदत आज के दौर में भारी पड़ती है और मेरे साथ भी ऐसा ही था। दर्जनों बैठकों में उनके साथ बैठना हुआ और पत्रकारिता के अधोपतन देखने को मिला। साल डेढ़ साल पहले बिहारशरीफ में हुए बैठक में सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन की चर्चा होना और संपादक का खामोश, तमाशाबीन बना रखना मुझे खटका और मैंने उसे अर्न्तजाल पर व्यक्त क्या किया महोदय को बुरा लगा था और फिर अगले बैठक में ही हरीश पाठक ने तल्ख और व्यंगात्मक लहजे में कहा कि हां आपके सुविचार मुझे न्यूज पोर्टलों पर पढ़ने को मिल जाते है पर मैंने कोई नोटिस नहीं लिया। सबसे निचले स्तर पर पत्रकारिता करते हुए किसी से डरने की बात नहीं होती और यह साहस विज्ञापन की वजह से होता है और फिर कोई नौकरी तो होती नहीं कि निकाल दोगे। मामूली सा मानदेय की परवाह क्या? विज्ञापन के वजह से यह कि जब विज्ञापन आप अच्छा खासा देते है तो आप एक कमाउ पूत होते है और मैं विज्ञापन का टारगेट हमेशा पूरा करने वालों में से था। सो परवाह नहीं किया और मुझपर गाज भी नहीं गिरी। अभी एक मार्च को हुए बैठक में जब युनिट हेड मृदुल बाली नहीं आए तो सिर्फ संपादक का ही आना हुआ और बैठक में एक बार फिर मुझसे उनकी तल्खी सामने आई और मिटिंग में ही लगभग सबपर बरस पड़े। मुझपर विशेष, अरूण साथी जी के विचार नेट पर बड़ा ही उत्तेजक होते है पर कभी किसी समाचार को लेकर मुझसे संपर्क नहीं किया जाता। कोई संपर्क नहीं करता। मोबाइल पर भी नहीं। सही भी था। आज तक कभी संपादक से समाचार को लेकर संपर्क नहीं किया। कभी उनसे मिलता भी नहीं। यह विज्ञापन की वजह से संपादक के घटे कद की महिमा थी और हताश संपादक की व्यथा। यह भी की विज्ञापन ने एक संपादक का कद इतना छोटा कर दिया कि संवाददाता का उनसे कम सरोकार रहता है और विज्ञापन प्रबंध से  अधिक।

फिर मुझे लगा कि एक ही संस्था मंे काम करते हुए इस तरह की तल्खी ठीक नहीं सो उनसे जाकर केबीन में मिला। उन्हांेने मुझे बैठने के लिए नहीं कहा! तब भी मुझे लगा कि बात करनी चाहिए। जब बात प्रारंभ की तो वे लगभग बरस पड़े। आप नेट पर क्या क्या लिखते है, बहुत बड़े विद्वान समझे है? मैं भी कोई बेकार आदमी नहीं हूं। मेरे भी कई किताब छप चुके है। विद्वता का दर्प। मैं तुरंत बाहर आ गया। फिर कभी उनसे बात नहीं की। फिर मुझसे अखबार का कार्यालय छीन लिया गया। शेखपुरा रिर्पोटर नवीन सिंह को दिया गया और मैंने अखबार को अलबिदा कह दी। बात खतम।
मैंने कोई लॉबिंग नहीं की। किसी से नहीं मिला। कोई फरियाद नहीं की। सोंचा, पत्रकारिता निष्ठा और ईमानदारी से करनी है तो चापलूसी कैसा? पर मन में यह बात खटकटी रहती कि सच अगर ब्लॉग पर नहीं लिखता तो आज कार्यालय प्रभारी बना रहता पर क्या करें कुछ आदतें है कि बदलती नहीं और जब मीडिया मंच पर उनके जाने की खबर देखी तो लगा कि इस गरीब की हाय लग गई।
कल ही तो कहीं पढ़ा है-
कहो तो खरीद लूं दुनियां, कहां की मंहगी है।
बस जमीर का सौदा बुरा सा लगता है।।

22 जून 2012

पेसुआ हनुमान (चुटकी)


अरूण ‘‘साथी’’

बाबा बाचाल है! जंगलराज के समय बाबा का बड़ा प्रताप था। इन्हें राजा का खासम-खास माना जाता था और प्रतापी बाबा खूब नेम-फेम कमाए। जैसे ही जंगल राज गया बाबा की बोलती बंद। ई बात बाबा बर्दास्त नहीं कर सके सो बाबा चित्त-पटांग हो गए। बाचाल बाबा भानूमति के कुनबे के नए सु...शासनी राजा के राज दरबारी बन गए। बाचाली बाबा, फटाफट बोलने लगे। हंगामा होने लगा। फिर जब बाबा ने कहा कि गठबंधन रहे कि खत्म हो, हम सेकूलर के साथ रहेगें तब किसी स्वनाम धन्य राजसी दरबारी को आकाशवाणी हुई की बाबा पोसुआ हनुमान है। जय हो। 
पोसुआ हनुमान, काफी शोध-विचार करने के बाद कल्कुलेटर से जो नतीजा निकला वह तेंतिस हजार के करंट का झटका था। हनुमान मने उ हनुमान नहीं जो राजा राम के भगत थे, हनुमान मने बंदर, उछल-कूद करे वाला। और पोसुआ मने पालतू। बड़का बात यह कि पोसुआ हनुमान को पोसना हजार हाथी रखने जैसा है। बड़ा खर्चा है। पुराने राज से जब इनका खर्च उठाया नहीं गया तो नये दरबार में है।
वैसे यह तो हमारा मतिभ्रम ही है कि कभी जंगलराज तो कभी सु....शासन के फेरा में फंस जाते है। सब माया है, बाकि सब ऐके है। मतिभ्रम नहीं होता तो जंगलराज के कई जनावर सु...शासन में दरबारी है, नाम में क्या रखा है, काहे कह दे, डर तो लगता ही है।
क्या कहा डर के आगे जीत है, लिजिए तो एक नाम और काला (श्याम) अक्षर भैंस बराबर....बाकि आप बताईए। आदत ही है आप सबकी, दूसरके के कंधा पर बंदूक रख के छोड़े के।
चर्चा तो पुराना दरबार में भी हो रही है, भले ही दरबारी नहीं थे पर भौजी तो थी, गर्मा कर बोली-साहेब आप फेरा में फंस गए, ई सब तरे मलाई खा रहा है।
साहेब कहां चुप रहते, बोल-जमाना औसने है जी, गुड़ खाए और गुलगुला से परहेज....। ससुरा हम तो गुड़ और गुलगुला दोनों से परहेज के फेरा में कलट गए।
जो हो सो की- भिसलरी वाटर और गुलाब मिलाकर नहाने वाले नेता जी टपक पड़े। चुपेचाप तमाशा देखिए, सब मिलकर इनका क्रिया करम करे में लग गया है।
धत्त तेरी के बुरबक, चोप रहिए, यहां तो करेजा पर भौंसा लोट रहा है। मैडम से जोंक नियर चिपके के फेरा में ई लगा हुआ है। ई हमरे सेकुलर वाला फंडा से चिमोकन नियर चिपके बाला है, जहां मैडम चिपका की सब गुड़ गोबर हो जाएगा।
तभी भौजी टुभुक पड़ी-साहेब, ई सेकुलर कौनो सौतनिया के नाम है, नींदों में आप बड़बड़ाते रहते है।
ई ला, अब इनकरा कैसे समझाबें, सुना- जो बहुसंख्यकों को गरिताया है और अल्पसंख्यकों को पुचकारता है, उसे सेकुलर कहते हैं।
अच्छा साहेब, तभिए सेकुलर सरकार में कसाब और अफजल गुरू ऐश कर रहल हें,, 
जय सेकुलर भगवान की,, जय हो...

24 मई 2012

कांग्रेसियों के नाम मैडम की एक अपील। उर्फ यह साढ़े सात रूपया कितना होता है।

अरूण साथी
हमारी लोकप्रिय सरकार ने पेट्रोल की कीमत क्या बढ़ाई, लोग चिल्ल पों करने लगे । हद है भाई, आखिर सरकार मैडम जी चलाएगीं की चिल्ल पों करने वाले लोग संधी। अजी जब वोट देते वक्त जनता को तकलीफ नहीं होती और हमारा समर्थन करती है तो यह इस बात को साबीत करने के लिए काफी नहीं की जनता का हाथ कांग्रेस का साथ है। और फिर हो न हो चिल्लाने वाले मीडिया के पीछे आरएसएस का हाथ ही है। मैडम के दरबार में बैठकी सजी हुई है और एक गांधी टोपी पहले नेता जी ने मख्खन लगाई तो दरबार में कई लोगों ने बोलने की हिम्मत जुटा ली। हलंाकि दादा के चेहरे पर थोड़ी तल्खी थी पर वे उसे छुपाने में सफल होते हुए बोले-दीदी को क्या हो जाता है मैडम, जब-तब विपक्षी के साथ जाकर खड़ी हो जाती है। हमने तो अपने अनुभव के आधार पर ही सोंच समझ कर तेल की कीमत बढ़ाई है। मैडम आपका यह फैसला बिल्कुल जनहितकारी है। आखिर आप दूरदर्शन है। दूर तक देखकर कोई भी फैसला करतीं है। पहली बात तो यह कि संसद का सत्र खत्म हुआ और पेट्रोल की कीमत एकाएक साढ़े सात रूपये बढ़ा दी। ज्यादा चिल्लाओंगे तो एक रूपया घटा देगें। बस।

          यह तो आपकी उदारता है कि अब भी डेढ़ रूपया घाटा लग रहा है पर आपने उसे सहने की हिम्मत दिखाई। मैडम जी मैं तो कहता हूं कि अपने कार्यकर्त्ताओं के नाम एक अपील जारी कर यह बात बताई जानी चाहिए कि तेल के दाम बढ़ने से जनता का कितना भला होने वाला है। सबसे पहला दुरदर्शन फैसला तो यही है कि पूरे विश्व में जहां प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है वहीं अपने देश में भी ग्लोबलवार्मिंग का मामला जोरों पर है फिर भी लोग दनादन गाड़ी पर गाड़ी खरीद रहे है। आखिर हमारी सरकार ने लोगो ंको सम्पन्न बना दिया है सो लोग बाज कहां आने वाले, इसलिए तेल के दाम बढ़ने से लोग गाड़ी खरीदना कम करेगें और इससे प्रदूषण और ग्लोबल बार्मिंग की समस्या कम होगी। 

तभी दरबार के रत्न सिप्पल जी महाराज से रहा नहीं गया और उवाच दिये- मैडम, पेट्रोल की कीमत बढ़ने से सबसे बड़ा फाइदा तो आम आदमी का ही हुआ है। महानगर से लेकर गांव की सड़कों पर गाड़ियां सरपट दौड़ती रहती है और इससे एक नहीं कई परेशानी होती है। पहली परेशानी तो यह कि महानगर में रोड जाम, आम हो गया है। अब मंहगे तेल से जाम से निजात तो मिलेगी ही, दूसरा फायदा यह कि अब लोग या तो पैदल चलेगें या साइकिल से। दोनों ही हाल में उनका सेहत सुधरेगा। देश में डायबटीज की शिकायत तेजी से बढ़ रही है और जब लोग साईकिल की सवारी करेगें तो इस बिमारी में सुधार आएगा ही।

और अन्त में दरबार में कहीं से कुत्ते के भौंकने की आवाज आई और सब उसकी तरह मुखातिब हो गए। आश्चर्य कि मैडम से लेकर सभी दरबारी तक उसकी भाषा को समझ रहे थे। सो उस डॉगी ने भौंक दिया। मैडम जी यह सब आरएसएस का प्रोपगंडा है। जनता तो इससे खुश है, खुश नहीं होती तो आज सड़कों पर गाड़ियां नजर आती? और मीडिया वाले भोंपी तो आरएसएस से मिले हुए है सो आज यहां से ही अपने कार्यकर्त्ताओं के नाम उक्त आशय की अपील जारी कर दी जाए और यह फरमान कि कलेजा तान के कांग्रेसी पेट्रोल के ंदाम के बढ़ने के जनहितकारी फायदे को लोगों को बताए और देश को विकास की राह पर पैदल लेकर जाए...।

मैडम जी खामोश रही, तभी वहां युवराज ही आ गए।  सभी ने एक सुर से युवराज को अभी अन्डरग्राउण्ड ही रहने की सलाह दी। मैडम ने भी कहा-यह सब बेकार की समस्या है और इस सबसे टूमको कुछ लेना डेना नहीं, साइलेंट रहो, और रूम से बाहर मट निकलो कोई मीडिया बाला पकड़ लेगा।
पर मम्मी ओबामा अंकल का कॉल आया था, पेट्रोल की कीमत बढ़ाने के लिए थैंक्स कह रहे थे, अंकल बोले-मम्मी को कहना कि मैंने भारत मंे तेल की अधिक खपत पर चिंता जताई थी और आपने समझदारी से काम ले लिया।

जाते जाते युवराज ने पूछ लिया-मम्मी यह साढ़े सात रूपया कितना होता है।