22 जनवरी 2014

बांझ का बदला अंतिम कड़ी (सच्ची घटना पर आधारित एक कहानी )

पुराने ख्वाबों में खोई परवतिया आज अपने प्रेमी को कोस रही थी। कोढ़फुट्टा! तनियो हिम्मत नै हलई, आ चलल हल प्यार करे। आज ओकरे वजह से हमरा ई गैंजन हो रहल है। 
मन ही मन परवतिया बुदबुदने लगी। बातों ही बातों में परवतिया ने अपनी पिछली जिन्दगी का पन्ना उघार दिया। परवतिया ने बताया कि वह अपने परोस के गंाव के शिवचरणा से प्रेम करती थी। उससे शादी भी करना चाहती थी पर दूसरी बिरादरी का होने की वजह से यह शादी नहीं हो सकी। वैसे तो दोनो दलित थी पर समाजिक मापदण्ड में परवतिया का समाज उससे उपर माना जाता था।
परवतिया की मुलाकात शिवचरणा से भैंस चराने के दौरान हुई थी। परवतिया अक्सर जब अपने खेत से जानवरों के लिए हरयरी (हरा चारा) लेकर आती-जाती तो शिवचरणा भोजपुरिया गाना गाता रहता। परवतिया को लगा कि गाना वह उसी को देखकर गाता है, सो उसने एक दिन डांट दिया।
‘‘आंय रे मुंहझौंसा, हमरा देख के ‘‘सिन्टुआ के दीदी तनि प्यार करो दा’’ गाबो ही, नाका-मुंहा मेटा देतै हमरा गांव वाला के मालुम हो जइतौ तब।’’
शिवचरणा सकपका गया था। उसे तो भोजपुरिया गाना गाने की आदत थी और वह अक्सर गाता रहता था। उसने बहुत सफाई दी पर परवतिया नहीं मानी और उसे डांटती हुई चली गई। अगले चार-पांच दिन शिवचरणा भैंस लेकर वहां नहीं आया। परवतिया को कुछ कमी सी लगी। वह कई बार जाकर देखने लगी आया कि नहीं। जब वह चारा लेकर आती तो लगता जैसे वह गाना गा रहा है पर सिर उठा कर देखती तो कोई नहीं होता।
परवतिया को उसे डांटने पर पछतावा होने लगा। बेचारा बड़ा सीधा था। डरकर भाग गया। परवतिया को उसकी कमी खलने लगी, जाने क्यों वह उसे देखना चाहती थी। फिर एक दिन उस रास्ते से कुछ दूर शिवचरणा के होने की झलक मिली। परवतिया के पैर अपने आप उधर बढ़ गए। वह उस रास्ते कभी नहीं जाती थी पर आज अचानक जाने क्या हुआ।
‘‘आं रे छौंरा, एकदम डरपोक ही रे, माउगाबा।’’
‘‘अब की कैलियो जी, हमतो भैंस भी उधर चराबे ल नै ले जाहिओ।’’
‘‘काहे नै ले जाहीं, इत्ते अच्छा गाना सुने के मिलो हलइय।’’
और बातों का सिलसिला चल निकला। फिर परवतिया के कानों में अक्सर शिवचरणा के गीत गूंजा करते है। वह घर में भी होती तो उसे गली में शिवचरणा के गीत गूंजता सुनाई देता। यह सिलसिला जो चला सो चलता ही रहा। एक दिन परवतिया ने शिवचरणा को हरियरी का बोझा उठा कर अपने सिर पर रखने के लिए बुलाया। शिवचरणा बोझा उठाते हुए उसके देह को छू लिया। परवतिया का देह कांप गया।
अगले कई दिनों तक दोनों ने नजर नहीं मिलाई। शिवचरणा सहमा रहा और परवतिया शार्मायी। एक दिन जब दोनों की नजर मिली तो परवतिया ने मुस्कुरा दिया। फिर बोझा उठाने के बहाने देह के छूने की दूरी जो मिटा तो एक दिन दोनों की देह एक हो गया...
यह कितने दिनों तक छुपता। एक दिन गांव भर में यह खबर आग की तरह फैल गई। समूचे गांव में जैसे कोई विपत्ति आ गई हो। सबकोई परवतिया को कोस रहे थे। परवतिया के बाबू जी तक बात गई तो कोहराम हो गया। पहले परवतिया को लाठी से पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। और फिर शिवचरणा को गांव के युवकों ने घेर कर गाछ में बांध कर जो पीटा तो लगा जैसे आज उसको मार ही देगें। शिवचरणा के गांव से लोग दौड़ कर आए तो दोनों तरह से जैसे युद्ध हो गया। लाठी, भाला गंड़ास से दोनों तरफ से कई घायल हो गये। शिवचरणा को लोग छुड़ कर अपने घर ले गए और परवतिया का घर से निकलना बंद।
परवतिया पन्द्रह दिन तक दोनों सांझ पानी पी कर रही। माय के किरिया-कसम देने पर भी वह नहीं मानी। सांझ को परवतिया शौच के लिए खेत जाती थी तो भी उसके साथ कोई न कोई होता। एक दिन अचानक सांझ के शिवचरणा राह में खड़ मिल गया। परवतिया दौड़ कर उससे लिपट गई। दोनों फूट-फूट कर रोने लगे। परवतिया की भौजी आज उसके साथ थी। भौजी को परवतिया किरीया-कसम देकर मना लिया। 
फिर से यह सिलसिला चला। उधर परवतिया के शादी के लिए आनन फानन में लड़का खोज लिया गया। गांव के लोगों ने किसी सामाजिक काम में इतनी मदद नहीं की होगी जितनी लड़का खोजने में किया। घर-मकान पक्का पोस, तीन बीघा के जोतदार भी। कर्जा लेकर तीस हजार नकद और एक साईकिल दे दिया गया। दिन धरा गया।
परवतिया ने शिवचरणा को यह बात बताई। कुछ समझ नहीं आ रहा था। परवतिया घर से भाग जाने की बात कही तो शिवचरणा मुकर गया। वह बहुत गरीब था सो उसके घर परिवार को उजाड़ दिया जाता। परवतिया इसके लिए तैयार नहीं थी। उसके साथ धोखा हुआ। परवतिया का संसार जैसे लुट गया। वह एक लाश की तरह शादी में शामिल हुई और ससुराल चली गई। रात दिन उसके आंखों से आंसू बहते रहते। आज पांच साल बाद फिर से शिवचरणा को वह याद कर रही थी।
और अचानक थाने में शिवचरणा हाजिर हो गया। रात्री में एकाएक। उसे देख परवतिया फूटफूट कर रोने लगी। शिवचरणा उसे लेकर चला गया। वह शहर में ही डेरा लेकर अकेले रहता था। उसने बियाह नहीं किया था। पूछने पर परवतिया को बताया ‘‘कि दूसरी शादी क्यों करता?’’ उस रात परवतिया शिवचरणा के डेरा चली गई। शिवचरणा ने उसकी सेवा में जान लगा दी। गर्म पानी से जख्म सेंका और दवाई ला कर दी। खाना बना कर खिलाया। परवतिया रोये जा रही थी।
तीन साल बाद जब परवतिया एक दिन अचानक बाजार में मिली तो मैं दंग रह गया। उसकी गोद में एक-डेढ़ साल का बच्चा था। पूछने पर बोली-
‘‘ अरे साहेब उ मुंहझौंसा, हिजड़बा के छोड़ देलियो, शिवचरणा के साथ रहो हियो। ओकरे से ई बेटी हो।’’
मुझे लगा परवतिया पूरे समाज को मुंहझौसा, हिजड़बा कह रही हो, जिसने उसे बांझ का कलंक दिया था और अपने कोख से बेटी जन्म देकर उसने बदला ले लिया था।  

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