29 जनवरी 2014

यक्ष प्रश्न...


















यक्ष की तरह
आकर खड़ा हो जाता हूँ मैं
खुद के ही सामने
पूछने लगता हूँ सवाल
उसी तरह
जैसे, लगा हो दांव पर
अपना ही जमीर...

और मैं ही हो जाता हूँ
निरूत्तर
निःशब्द
निविर्य
आदमी हूँ ?
जीता  हूँ जहां
उस धरा को

क्या देकर जाउंगा ?
क्या देकर जाउंगा ?

मौत से लड़कर रोहित का चला जाना गम दे गया...

मौत से लड़कर रोहित का चला जाना.. गम दे गया.. (अरुण साथी) मुझे ऑक्सीजन की जरूरत है, कहाँ मिलेगा.…..तकलीफ हो रही है...रोहित का कॉल। एक लड़खड़ात...