26 दिसंबर 2009

प्रेम का यातनागृह, समाज और कानून

प्रेम का यातनागृह, समाज और कानून।
आदि युग से आज तक प्रेम को न तो किसी ने परिभाषित किया है और न ही किसी ने इसको समझार्षोर्षो पर एक बात जो आज के समय में सबसे दुखद है वह है आज का हमारा कानून और हमारा समाज। समाज और कानून दोनों प्रेमियों के लिए यातना गृह के रूप में तब सामने आता है जब प्रेमी समाज के बंधन को तोड़ अपनी जीवन यात्रा स्वतंत्र रूप से प्रारंभ करना चाहतें हैं। इस यातना गृह में यातनाओं की पराकष्ठा है और इसमें शामिल लोग धर्म, समाज और कानून के ठेकेदार है। प्रेमियों के लिए यह समाज यातनागृह तब बनता है जब समाज की उस परीधि से निकल कर प्रेमी बाहर आने की कोशिश करते है जिसके अनुसार समाज के अंदर रह कर अवैध संबंध को बनाए रखा जा सकता है। जिममें परिजन भी मददगार होते है तथा यदि अवैध शारीरिक संबंध के परिणामत: गर्भ रहता है तो गर्भपात की पूर्णत: व्यवस्था रहती है बस मामले को ढका-छुपा होना चाहिए। समाज के इस परीधी में ससुर-बहू और जेठ-देवरानी से लेकर कभी कभी विभ्रन्स चेहरा भी सामने आता है जिसको उधृत करना बलात्कार होगा। परन्तु प्रेमी जब समाज के इस परिधी से निकल कर प्रेम डगर पर यात्रा प्रारंभ करतें है तो समाज का कथित सभ्य चेहरा सामने आता है। इस कार्य को सामज के विरोध में बताते हुए इसके विरोध में सारी सीमाओं को पार कर जाता है। हलांकि इसका एक पक्ष यह भी है कि यही समाज फलंा कि बेटी फलां से फंसी हुई है या फंला तो अपनी बहू से ही फंसा है कह कर चौपालों पर चटखारा लेता है। कानून का भी चेहरा पेे्रमियों के लिए यातनागृह ही है। कानून के रखवाले जो हत्या, बलात्कार और अपहरण सरीखे कारनामों को अंजाम देते रहते है एक बारगी प्रेमियों के गिरफ्तार करने पर कानून की धाराओं को याद करने लगते है और उन्हें भारत का कानून और उसका संविधान भी याद आने लगता है जबकि उन्हीं के द्वारा प्रतिदिन कानून को ताक पर रख कर उसे भद्दी भद्दी गालियां
कानून के इस ठेकेदार को प्रेमी जोड़ा आतंकवादी नजर आने लगता है और समाज और कानून के यातनागृह में प्रेम का यह परिंदा कभी कभी फड़फड़ा कर दम तोड़ देता है। समाज के यातनागृह में वह भी प्रेमियों को गलियाने, यहां तक की काट कर फेंक देने की बात करते हुए इसकी पहल करता है जिसका अवैध संबंध अपने ही घर में किसी से होता है। फिर प्रारंभ होता है पंचायत का फैसला जिसके अनुसार कभी कभी प्रेमियों के लिए अमानवीय यातनाओं से गुजारा जाता है पर धन्य है प्रेम-कहा भी किसी ने सही है कि ``ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लिजिए, एक आग का दरिया है और डूब कर जाना होगा। कानून के ठेकेदार यह जानते हुए भी कि यह मामला प्रेम प्रसंग का है लड़कियों को वेश्या और चरित्रहीन साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। उम्र के हिसाब से बालिग होने के बाद भी मेडिकल टेस्ट के नाम पर परेशान किया जाता है और पुलिस से लेकर अस्पताल तक सभी के मन में यह भी गुदगुदी होती है कि इसके साथ एक मौका हमें भी मिल जाए सलाह वे भी देतें है, शर्म नहीं आती, मां बाप का नाक कटा दिया। धन्य है हमारे मां-बाप भी, बेटी दहेज लोभियों के जधन्य हाथों में बेटी को सौंप कर उनकी नाक नहीं कटती और तब भी उनकी नाक नहीं कटती जब वे अपनी बेटी के हत्यारे से पैसा लेकर समझौत करतें है पर प्रेम विवाह करने वाले बेटी के बाप की नाक कट जाती है। पता नहीं प्रेम की धार इतनी तिक्ष्ण क्यों है।
अन्त में मैं महज उपदेश नहीं देना चाहता और न ही किसी को कोस रहा, बल्कि भोेगे गए सच को रख रहा हूं। कहानी लंबी है फिर कभी, पर इस बहस में सभी भाग लें- कि क्या प्रेम को आज भी मान्यता मिली हैर्षोर्षो कानून और समाज दोनों कि नजरों में प्रेमी आतंकवादी से भी बड़ा गुनहगार क्यों है र्षोर्षो कानून में प्रेमियों के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है क्यों नहींर्षोर्षो उसके लिए भी अपराधियों का वहीं व्यवहार और प्रावधान है जो बलात्कारियों के लिए है आखिर क्योंर्षोर्षो प्रेमी कठधरे में बलात्कारी और अपहर्ता बन कर क्यों जाता हैर्षोर्षो जबाब कौन देगा।

सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...