27 दिसंबर 2009

सेम-सेम शीला दिक्षित

सेम-सेम शीला दिक्षित

दिल्ली की मुख्यमंत्री का शीला दिक्षित एक सुलझी हुई नेत्री मानी जाती
हैं और कई बार उन्होंने इसे साबित भी किया, पर आखिर बिहारियों को बोझ बता
कर उन्होंने यह भी साबित कर ही दिया कि वे भी एक नौकारशाही मानसीकता और
रिजनल फोबिया से ग्रसीत है । आम जनता की भावनाओं से उन्हें कोई लेना देना
नहीं। मुझे तो हंसी आती है जब विधान सभा चुनाव में शीला जी आम आदमी की
सरकार होने का दाबा कर रही थी और वह आम आदमी बिहारी भी होता है।
बिहारियों की जो सबसे दुखद पहलू है वह है उनका बंधूआ मजदूर होना। भले ही
देश से बंधूआ मजदूर की परंपरा खत्म हो गई हो पर बिहार से बाहर बिहारी आज
भी बंधूआ मजदूर की तरह ही जीते है। बिहारी कभी किसी पर बोझ नहीं होता और
बिहारी हमेशा अपना बोझ स्वंय उठाते हैं। दिल्ली से यदि बिहारियों को भगा
दिया जाए तब शायद शीला जी को एहसास होगा कि बिहारी बोझ बनते नहीं बोझ
उठाते है। फिर भी उन्होंने बिहारियों को गाली तो दे ही दिया और राजनीति
के इस खेल को कोई भले न समझे पर बिहार के लोग तेा समझतें है। शीला जी
दिल्ली में कांग्रेस की प्रतिनिघि है और विधान सभा का चुनाव भी बिहार में
होने वाला है तब कांग्रेस से नेता जब बिहार आएगें तो उनसे कोई पूछे न
पूछे मैं तो पूछूगां कि बिहारी बोझ कैसे। बिहारियों ने पूरे भारत में
अपनी प्रतिभा और परिश्रम से लोगों को अपना लोहा मनवाया है और जब हम कहते
है भारत हमारी माता है तो हम बिहारी भी भारत की ही संतान है और मां के
लिए अमीर और गरीब सभी पुत्र समान होतें है। आज बिहार की जो बदहाली है
उसमें शीला जी की पार्टी कांग्रेस का भी बड़ा अहम रोल है। आजादी के बाद
लगभग तीन दशक तक बिहार पर कांग्रेस ने शासन किया और बिहार कें प्रथम
मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह के बाद से बिहार को लूटने में कांग्रेस
का सबसे बड़ा योगदान है । लालू यादव के सहारे भी बिहार को पिछे ले जाने
में कांग्रेस ने वहीं किया जो कुछ दिन पहले तक झारखण्ड में किया जा रहा
था। कभी समय था जब बिहार को अव्वल माना जाता था और आज भी बिहार अपने
सहारे दौड़ने लगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कम से कम
बिहारियों के लिए सम्मान की एक शुरूआत तो कर ही दी है।
शीला दिक्षित एक प्रदेश की मुख्यमंत्री है इसलिए उन्हें गालियां तो नहीं
दे सकता पर शिला के लिए सेम सेम, सेम सेम, सेम सेम, सेम सेम तो कह ही
सकता हूं।

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