25 दिसंबर 2009

लोगों के जीवन में मिठास धोलने वाले की जिन्दगी कड़वी

लोगों के जीवन में मिठास धोलने वाले की जिन्दगी कड़वी
शेखपुरा जिले के शेखोपुरसराय प्रखण्ड के किसान सालों से ईख की खेती करते
आ रहे है पर अब उनकी परम्परागत खेती धीरे धीरे विलुप्त होने के कगार पर
आ गई है और किसान समस्याओं से जुझते जुझते थककर इसकी खेती करना बंद कर
रहे हैं। प्रखण्ड के नीमी, अंबारी, पनहेसा, महबतपुर, ओनामा सहित दर्जनों
गांवों में किसान ईख की खेती करते थे तथा इससे मिटठा तैयार कर उसे बेचते
थे। पूर्व में किसान ईख की खेती करते थे और उनकी फसल वारसलीगंज चीनी मिल
मे बिक जाती थी और इसी से प्रेरित होकर अधिक से अधिक किसान ईख की खेती
करने लगे। कुछ दिनों के बाद जब चीनी मिल बंद हो गया तो किसानों ने ईख की
खेती का काम बंद नहीं किया और इसे जारी रखा। किसानों ने ईख की खेती को
बंद तो नहीं किया पर धीरे धीरे किसान ईख की खेती करना बंद कर रहें है
और जो किसान आज भी इसकी खेती कर रहे है उसे एक साल के हाड़ तोड़ मेहनत
के बाद भी कुछ नहीं मिलता है। वर्तमान में किसान ईख की फसल काट कर उससे
मिटठा बना रहे है। इस प्रक्रिया में किसान पहले ईख की फसल काट कर उससे रस
निकालने के लिए उसे खलीहान में लेकर जातें है जहां अब परंपरागत बैलों की
जगह डीजल से चलने बाले पेराई मशीन में अपनी ईख की पेराई कराते है जिसके
लिए किसान को एक मोटी रकम पेराई मशीन चलाने के लिए देनी पड़ती है। सरकार
के गलत नितीयों और महंगाई का असर यहां भी देखने को मिलता है। किसानों को
ईख की पेराई के एबज में एक मोटी रकम चुकानी पड़ती है। ईख की फसल उपजाने
के लिए किसान को एक साल पर मेहनत करनी पड़ती है। उसके बाद पेराई कर
प्राप्त रस को परंपरागत चुल्हे पर धीरे धीरे गर्म कर मिटठा मनाया जाता
है। बाजार में भले भी मिटठे की कीमत 35 रू0 प्रतिकिलो है पर किसानों के
यहां से व्यापारी 12 से 15 रू0 प्रतिकिलों खरीदतें है और वह भी उधार।
यहां भी मेहनत करने वाले किसानों के बजाय मोटी आमदनी व्यापारियों की होती
है। किसानों के लिए ईख की खेती करना एक मुिश्कल भरा काम है पर किसान तब
भी अपनी परंरागत खेती करते है। अपनी बदहाली बयां करते हुए किसान सरोज
सिंह ने बताया कि ईख की पैदाबार के लिए यह क्षेत्र प्रसिद्ध है पर अब यह
खत्म होने बाला है और इसका मुख्य कारण सरकार की उपेक्षा और
जनप्रतिनिधियों का इस ओर ध्यान नहीं देना है। उनके अनुसार यदि यहां फसल
की बिक्री की व्यवस्था कर दी जाए तो किसानों मे खुशहाली आ जाएगी पर किसी
के द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।
बहरहाल किसानों के इस समस्या को लेकर किसी भी जनप्रतिनिधियों के द्वारा
कोई पहल नहीं की जाती और किसान अपनी बदहाली पर आठ आठ आसूं बहाते रहतें
है।

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