01 फ़रवरी 2010

घर में ही किसी ने नहीं ली श्रीबाबू की सुध, पुण्य तिथि पर रहे उपेक्षित

``शहीदों की मजारों पर लगेगें हर वरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही
बाकी निशां होगा´´ इन पंक्तियों की सार्थकता श्रीबाबू की इस उपेक्षित
प्रतिमा को देख कर समझी जा सकती है। श्रीबाबू की पुण्यतिथि पर उनके ही
गांव बरबीघा में उनको उपेक्षित रखा गया और श्रीकृष्ण चौक पर स्थापित उनकी
प्रतिमा पर किसी ने एक फूल भी चढ़ाना उचित नहीं समझा। बिहार के प्रथम मुख्यमन्त्री डा. श्रीकृष्ण सिंह को लोग प्यार से श्रीबाबू पुकारते है। बिहार को संवारने में इनका योगदान अपूणीZय रहा है तथा गांधी जी के असयोग आन्दोलन में कूद श्रीबाबू देश के सच्चे सिपाही की तरह स्वतन्त्रता आदोलन की लड़ाई लड़ी।महापुरूषों की इस
उपेक्षा के लिए भले ही लोग एक दुसरे को जिम्मेवार ठहरा देगें पर राजनीति
लाभ के बगैर महापुरूषों को इसी तरह से उपेक्षित किया जाता है। अभी कुछ ही
माह पूर्व श्रीबाबू की जयन्ती के अवसर पर कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए
गए थे जिसमें कांग्रेस के द्वारा आयोजित समारोह में बिहार के राज्यपाल ने
भाग लिया था। इस समारोह के बाद कई तरह क आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला
और जदयू की ओर से भी एक सादे समारोह में श्रीबाबू की प्रतिमा पर
माल्यार्पण किया गया था। पर आज श्रीबाबू की पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा की
ओर किसी ने रूख नहीं किया और श्रीबाबू की प्रतिमा उपेक्षित रही।
श्रीबाबू को लेकर हमेशा से राजनीति होती रही है। श्रीबाबू का वास्तविक
उत्तराधिकारी बनने और उनके सहारे राजनीति करने की भी होड़ रहती है पर
अपने घर में ही श्रीबाबू उपेक्षित है। इसको लेकर स्वतन्त्रता सेनानी
वासुदेव वरणवाल कहते है कि महापुरूषों को श्रद्धांजली देने की परंपरा महज
अब राजनीति भर रह गई और किसी के द्वारा देश प्रेम की भावना से प्रेरित
होकर यह नहीं किया जाता है। श्रीबाबू बिहार के निर्माता थे और इसलिए
उन्हें बिहार केसरी कहा जाता है। श्रीबाबू की प्रतिमा की देख रेख की
जिम्मेवारी अभी तक तय नहीं है, न ही किसी संस्थान ने इसकी जिम्मेवारी ली
है इसलिए ही कभी प्रतिमा स्थल पर धूम धाम से मेला लगता है तो कभी विरानी
रहती है। प्रतिमा स्थल नगर पंचायत क्षेत्र में है और नगर पंचायत के
द्वारा इसकी देख भाल की जिम्मेवारी ली जानी चाहिए थी पर राजनीतिक चेतना
के अभाव ही है कि इसकी जिम्मेवारी नगर पंचायत की नहीं है। नगर पंंचायत तो
महज एक वानगी है पर श्रीबाबू की इस उपेक्षा को लेकर हम सभी जिम्मेवार है
और इसके लिए आगे आकर एक संस्था का गठन कर श्रीबाबू की जयन्ती और पुण्य
तिथि पर उन्हें श्रद्धांजली देने की परंपरा बनाये जाने की आज जरूरत है।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...