17 फ़रवरी 2010

दृष्टिहीनता नहीं रोक सकी सपनों की उड़ान

``खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तहरीर से पहले, खुदा बन्दों से खुद पुछे
बता तेरी रजा क्या है´´ 'शायर के इस उक्ती का चरितार्थ करता है दृष्टिहीन
युवक रामाषीश। दृष्टिहीन युवक रामाषीश दृष्टिहीन हो कर भी समाज के लिए
प्रेरणाश्रोत बना हुआ है और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जजबा रखता है।
खासकर अपने दृष्टिहीन समाज के लिए। दृष्टिहीन रामाषीश शेखपुरा जिला के
घाटकुसुम्भा प्रखण्ड के डीह कुसुम्भा गांव का निवासी है तथा पुरैना मध्य
विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्यरत है। उनकी नियुक्ति विकलांगों के
मिले आरक्षण के आधार पर किया गया था। शुद्व हिन्दी में उच्चारण करने वाले
रामाषीश बतातें है कि उनका बचपन गांव में ही गरीबी से संधर्ष करते हुए
बीता है और उन्होंने अपनी पढ़ाई ब्रेल लिपि के द्वारा पटना के बलाइण्ड
विद्यालय से मैट्रिक तथा दिल्ली के रानी झंासी विद्यालय पहारगंज से इण्टर
की पुरी की है तथा अपने समाज के लोगों को भी शिक्षित करना चाहतें है।
रामाषीश ब्रेल लिपि के द्वारा रामायण, महाभारत, कुरान और बाइबिल का भी
अध्ययन किया है तथा वे रामायण की चौपाई का पाठ भी करतें है। रामाषीश जिले
में दृष्टिहीनों के लिए आवासीय विद्यालय की मांग जिलाधिकारी से करते हुए
कहते हैं कि वे अपने दृष्टिहीन समाज के लोगों के लिए कुछ करना चाहतें है
और यदि उन्हें सुविधा मिले तो ऐसा कर सकतें है। उनके अनुसार अंधा होना
भले ही कमजोरी है पर वे किसी से कम नहीं है तथा वे भी सारे कायोंZ को
पुरा कर सकतें है और यदि तकनिक उपल्बध करा दी जाए तो जहाज भी उड़ा सकतें
है। उनके अनुसार मेहनत ही ईश्वर का दूसरा रूप है तथा मेहनता से किसी भी
तरह की सफलता पाई जा सकती है। दृष्टिहीन युवक रामाषीश अपना भोजन स्वयं
बनातें हैं तथा अपने सारे कार्योंं को भी वे स्वयं निवटातें है। शतरंज और
क्रिकेट से शौकिन दृष्टिहीन युवक रामाषीश दिल्ली की अपनी पढ़ाई आर्थिक
तंगी की वजह से मोमबत्ती बेच कर पुरी की है तथा आज शिक्षक होकर भी इसी
आर्थिक तंगी से जुझ रहें है।
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