25 नवंबर 2010

नीतीश, बिहार और जीत के मायने

बिहार को राजनीति का तीर्थ कहा जाता है तथा यहां के लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक और इस चुनाव परिणाम ने भी इस बात को नीतीश कुमार की जीत के रूप में पुख्ता कर दिया। नीतीश कुमार के इस जीत के कई मायने है और तरह तरह के विष्लेशण भी किये जा रहे हैं। सच भी है, ‘‘जो जीता वही सिंकदर’’।

पर बात अब यहां से यह शुरू होती है कि आखिर इतनी बड़ी जीत के क्या मायने है! राजनीति में किसी के पास जादू की छड़ी नहीं होती और इस बात को नीतीश कुमार ने अपनी जीत के बाद स्वीकार भी किया। तब फिर ऐसा क्या हो गया कि नीतीश कुमार के गठबंधन को 206 सीटें मिली और विपक्षी राजद गठबंधन को मात्र 22 सीटें । और तो और, कांग्रेस मात्र चार सीट पर सिमट गई। क्या यह सब कुछ किसी जादू के दम पर हुआ है। नहीं! 

नीतीश कुमार के इस ऐतिहासिक जीत के कई मायने है जिसमें से नेशनल स्तर की मायने की बात यदि की जाय तो बिहार के जागरूक मतदाताओं ने देश को वंशबादी राजनीति में महारानी और युवराज के तिलिस्म उघाड़ कर यह साफ कर दिया कि बात बनाने से बात नहीं नहीं बनती, काम करने से बात बनती है। राहुल गांधी की सभा को कवर करते वक्त ही इस बात कर एहसास हो गया था कि राहुल गांधी के पास आम आदमी की राजनीति की समझ नहीं है और वे एक युवराज सरीखे तिलिस्म के सहारे के देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। छोटी सी पर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात यह कि शेखपुरा जिले के बरबीघा में राहुल की सभा थी और सभा स्थल से 300 मीटर की दूरी पर स्थित थी बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्रीकृष्ण सिंह की प्रतिमा, जिसे बिहार के राजनीतिज्ञ तीर्थ के रूप में पूजते है पर राहुल गांधी ने प्रतिमा पर न तो माल्यार्पण किया, न ही सभा में उनके प्रति श्रद्धांजली व्यक्त की। यहां तक की सभा में जिस अषोक चौधरी के लिए वोट मांगने राहूल आये थे उनका भी एक बार जिक्र नहीं किया और दोनों बातों को सभा में आये लोगो ने तुरंत नोटिस लिया और इसकी चर्चा जंगल में आग की तरह फैल गई। 

सोनीया, मनमोहन और राहुल की सभाओं में भीड़ तो थी पर आम आदमी के मंहगे निबाले का दर्द भी सभाओं में था तब बिहार के जागरूक जनता ने लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर कांग्रेस को नकार कर देश को यह संदेस्श दिया की आम आदमी के दुखस-दर्द को समझने वाला ही लोकतंत्र का प्रहरी हो सकता है न की वह जो दलितों के घर जाने का प्रहसन करता हो!

लालू यादव की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। लालू यादव हुर्र हुर्र-हुर्र हुर्र की राजनीति के सहारे नीतीश को पटखनी देना चाहते थे और उन्हें यह समझ ही नहीं रही की बिहार जाति की राजनीति से उपर उठकर विकास की बात सुनना चाहता है। लालू यादव नीतीश कुमार के विकल्प नहीं हो सकते। वह इसलिए की नीतीश कुमार विकास की बात करते थे और लालू यादव अपने और रामविलास के स्वजातियों के सहारे स्वयं मुख्यमंत्री और रामविलास के भाई को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात पर वोट मांगते थे। अपनी सभाओं में लालू जी के द्वारा कोई गंभीर चर्चा नहीं की जाती थी। रटा-रटाया संबोधन और प्रहसन। स्टेज पर मौजूद कार्यकर्त्ता और पार्टी नेता को हड़काना और हुर्र हुर्र कर हंसी बटोरना, भाषण कम और नौटंकी अधिक करना। रही सही कसर लालू और रामविलास ने अपने अपने बेटे तेजस्वी-चिराग को आरजेडी-एलजेपी प्राइवेट लिमटेड कंपनी के पोलिटिकल प्रोडक्ट की लांचिग करके पूरी कर दी। जहां नीतश कुमार भाई भतीजाबाद से कोसों दूर थे वहीं बिहार लालू एण्ड कंपनी को देख रही थी।


नीतीश कुमार की बात की जाय तो यह अब साफ हो गया कि बिहार की नब्ज पर उनकी हाथ थी। विकास यात्रा और विश्वास यात्रा के माध्यम से जहां वे जनता को अपनेपन का एहसास कराते रहे वहीं महादलित और अतिपिछड़े की राजनीति से आगे बढ़ कर दुनिया की आधी आबादी को राजनीतिक रूप से जागरूक कर अपना एक प्रबल जनाधार बना लिया। चुनाव के दिन बुथों पर यही जनधार लंबी लंबी कतारों में दिखी। शायद देश की राजनीति में यह पहली बार हुआ होगा की घरेलू महिलाओं ने पतियों से विद्रोह कर अपनी पार्टी को तीर छाप पर वोट दिया। महिलाओं के मनोदशा को ऐसे समझा जा सकता है कि जब 24 की रात को मैं घर लौटा तो पत्नी ने उत्साहपुर्वक कहा ‘‘ देखे हमारी पार्टी की जीत हुई’’। यह नीतीश कुमार के इस बड़ी जीत का सबसे बड़ा कारक है। सड़क, शिक्षा और सुरक्षा जहां पर्दे के आगे दिख रही थी वहीं नीतीश का सोशल इंजिनियरिंग पर्दे के पीछे से निर्देशन कार्य को बखूबी अंजाम दे रहा था और इस सब में गुम हो गया गली गली  शराब की बहती नदी, शिक्षा के गिरते स्तर और नौकरशाहों को उदण्ड रवैये का मुद्दा गिरते

नीतीश कुमार ने जनता के नब्ज को अपने पहले चरण के चुनाव में नाप लिया और समझ गए की बिहार में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा है और अपनी सभाओं में भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने का ऐलान करते हुए उनकी संप्पति को जब्त करने की बात करने लगे।

नीतीश और भाजपा के द्वारा प्रायोजित तौर से नरेन्द्र मोदी को उछाला गया जिससे नीतीश कुमार का धर्मनिरपेक्ष चेहरा बाहर निकला और परिणामतः मुस्लीम बुथों पर भी जदयू को सर्वाधिक मत मिले।

और अन्त में यह कि नीतीश कुमार लालू यादव का भय दिखाते हुए जनता को यह संदेश देने में सफल रहे कि लालू यादव का मतलब बिहार में जात-पात की राजनीति है, अपराध-अपहरण का बोल बाला है। लालू यादव का मतलब लंबी लंबी कुर्तेवालों की गुण्डागर्दी है।

लब्बोलुबाब यह की नीतीश कुमार के इस बड़ी जीत के कई मायने भले हो सकते है पर बिहार में नीतीश कुमार का बिकल्पहीनता, एक बड़ा कारक है।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...