18 नवंबर 2010

हत्यारी पुलिस, खामोश मीडिया और बढ़ता नक्सलबाद

इससे पहले कि सुख जाऐं
आओ चलो
झीलों में पंख छपछपाएें
हत्यारी गोलियों को
चोंच में दबाऐं
और उड़ते चले जाऐं

दिनेश कुमार शुक्ल की यह कविता दस बारह साल पहले वामपन्थी पत्रिका समकालिन जनमत में पढ़ा और उसकी कतरन आज भी मेरी डायरी में दबी हुई है और आज बरवस उसकी याद आ गई....
मंगलवार को धनबाद की घटना गरीब आदमी के प्रति पुलिस और मीडिया को कठघरे में खड़ी करती है। एक केन्द्रीय अर्ध सैनिक बल (सीआईएसएफ) के स्कूल भान चालक नौजवान को धनबाद पुलिस चोरी की मोटरसाईकिल बेचने के आरोप में पकड़ती है पर पुलिस को उसके जेब से एक वोट वहिष्कार का नक्सली पर्चा मिलता है। फिर पुलिस की यातनाओं का सिलसिला और मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज फ्लैस करने की होड मच जाती है। न तो मीडिया यह पता लगाती है कि गिरफ्तार युवक नक्सली है या नहीं और न ही पुलिस इसकी छानबीन करती है और पुलिस की बर्बर थर्ड डिग्री से युवक की हाजत में ही मौत हो जाती है। झारखण्ड राज्य के बोकारो के नाबाडीह थाना क्षेत्र के मानपुर निवासी 30 वषिZय धिरेन्द्र सिंह कसे नक्सली कह कर पुलिस के द्वारा मार दिया जाता हैं और मीडिया में यह खबर दब जाती है या फिर खानापुर्ति की जगह पाती है। 

इस घटना में युवक के मरने के बाद धनबाद एसपी ने यह बात कबूली है कि गिरफ्तार युवक नक्सली नहीं है और उसके विरूद्ध कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। 

जब हमने इसकी जांच करने के धनबाद के मीडिया सहकर्मियों से बात की तो उनकी झुंझलाहट सामने आई और इसमें जो बात सामने आई वह चौंकानेवाला और खतरनाक है। मृतक युवक धिरेन्द्र सिंह को रास्ते में कहीं नक्सली पर्चा मिला और उसे उसने पढ़कर जेब में रख लिया था और उसी के आधार पर पुलिस और मीडिया ने उसे नक्सली धोषित कर दिया। कई चैनलों और अखबारों ने थाने में नक्सली की मौत की खबर परोसी। किसी ने रहस्यमय तरीके से मौत लिखा तो किसी ने पुलिस की पिटाई से नक्सली की मौत।

खतरनाक बात यह कि जिस बरवाअडडा पुलिस इंस्पेक्टर सहदेव प्रसाद ने उसकी हत्या कि वह पोस्टमार्टम को प्रभावित करने के लिए डाक्टर को खरीद चुका है और सादे कपड़े में वह पोस्टमार्टम हाउस में लगातार देखा गया।

सहकर्मी मीडियाकर्मी ने अपने गुस्से का इजहार कुछ यू किया ``क्या कहें लगातार चैनल को हर धंटे खबर करता रहा और फीट भेजता रहा पर न्यूज को महत्व ही नहीं मिला।´´
छोटी छीटी खबर को खेलने में माहीर मीडिया को क्या हो गया। क्या युवक गरीब था इसलिएर्षोर्षो

मामुली मारपीट के मामले में घरों को घेर का अभियुक्त को गिरफ्तार करने वाली पुलिस आज अपनों के साथ ऐसा क्यों नहीं कर रहीर्षोर्षो


अन्त में नक्सलबाद के दशकों सफर में इसके दमन को लेकर जितने प्रयास हुए असफल रहे और  नक्सलबाद का दायरा बढ़ता गया। नक्सलबाद आज भी है पर आज चारूमजुमदार और कानू सान्याल के सिद्धान्त की तिलान्जली देकर धन और ताकत के लिए नक्सलबादी होने का आरोप लगता है और इस सब के बीच हम चूक जाते है उस आम आदमी के नक्सली बनने के दर्द को समझनेे में जिसने यातनाओं और अन्याय के विरूद्ध हथियार उठाया और उसे सिखाया गया हथियारों के बल पर शोषण के विरूद्ध संधर्ष करना।

जब तक विकास से वंचित वर्ग के लिए योजनाओं को जमीन पर नहीं उतारा जाएगा और जब तक ऐसे निर्दोश युवक को पुलिस इसी तरह मौत के घाट उतारती रहेगी नक्सलबाद बढ़ता रहेगा..........

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