14 जनवरी 2011

मकरसंक्रांति की हार्दीक शुभकामनाए.. रिश्तों की डोर जोड़ने वाला त्यौहार है मकरसंक्रान्ति। दही चूड़ा खा कर आराम कर रहा हूं।

दही चूड़ा के नाम से प्रसिद्व मकरसंक्रान्ति का त्योहार भले ही परंपरागत रूप से मनाया जाता है पर इस त्योहार का अपना एक अलग मायने है और यह त्योहार रिश्तों की डोर जोड़ने वाला प्रमुख त्योहार है।

कल ही लक्खीसराय के नन्दनामा गांव से लौटा हूं मोटरसाईकिल पर एक बोरा लाद कर सब्जी इत्यादी ले गया और फिर एक रात वहां रहा, जम कर कुटुमतारे की और फिर वहां से चूड़ा, फरही का चावल मोटरसाईकिल पर लाद कर लाया। मेरे यहां ंसुखा की वजह से धान नहीं हुआ सो चूड़ा की किल्लत है।

नन्दनामा मेरे दादा जी के बहन का ससुराल है और दादी फुआ का निधन सौ साल की उर्म में अभी पिछले साल ही हुआ है और जब से होश संभाला है वहां न्यैता लेकर मैं ही जाता हंू सो इस बार भी कड़ाके की ठंढ में मोटरसाईकिल चला कर 60 किलोमिटर गया।

इसी तरह अन्य रिश्तेदारो के यहां भी  न्यौता जाता है।

आज दही चूड़ा खाने का त्योहार है सो घर में बस आलूदम बना है और उसके साथ दही चूड़ा और तिलकुट खाकर आराम फरमा रहा हूं।

इस त्योहार की प्रमुखता है कि अपने अपनों को याद करते है और इसकी पहचान भी इससे होती है। रिश्तों की डोर जोड़ने वाला त्योहार मकरसंक्रान्ति को देखना हो तो बस स्टेण्ड और रेलवे स्टेशन पर देखा जा सकता है। एक सप्ताह पूर्व से इस त्योहार में अमीर से लेकर गरीबा तक अपने रिश्तेदारों के यहां न्योता पहूंचाने जाते है और इसको लेकर भाड़ी भीड़ देखी जा रही है। इस त्योहार की खासियत है कि कोई दही चूड़ा तो कोई मीठ्ठा लेकर अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाने जाते है। यह परंपरा गांवों में प्रमुखता से देखी जाती है तथा जिस गांव में जिस तरह की फसल होती है उसे अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है और उनके रिश्तेदार भी अपने यहां से कोई न कोई सौगात देते है। इसको लेकर जहां बरबीघा ईलाके से दीयारा क्षेत्र में लोग चूड़ा पहूंचाने जाते है तो वहां से प्रमुखता से लोग प्रसिद्व दही अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है। शेखोपुरसराय प्रखण्ड से लोग ईख और मिठठा अपने रिश्तेदारों के यहां पहूंचाते है तो सब्जी उत्पादक गांवों से प्रमुखता से सब्जी अपने रिश्तेदारो के यहां भेजते है। 
बताया जाता है कि यह परंपरा सदियों से है और इसका पालन अभी गांवों के लोगों के द्वारा किया जा रहा है।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...