09 जनवरी 2011

सरकार की गलत नीतियों की वजह से देश में गरीबीं।

भारत में कृषि अन्तरिक उपनिवेश का शिकार।

गरीबी मापदण्ड को सुधारे बिना खाद्य सुरक्षा अधिनियम बेमानी।

भारत में गरीबी का सबसे बड़ा कारक सरकार की गलत नीतियॉ है और जवाहर लाल नेहरू ने पाश्चातय नीतियों के प्रभाव में आकर देश में औधौगिकीकरण कारण पर घ्यान दिया जिससे किसानों की स्थिति दयनीय हो गई और कृषि को अन्तरिक उपनिवेश की तरह इस्तेमाल करते हुए इसका शोषण किया गया। उक्त बाते प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं जवाहर लाल नेहरू विश्वविधालय के सेवा  निवृत प्रध्यापक ईश्वरी प्रसाद ने कही। ईश्वरी प्रसाद खाद्य सुरक्षा एवं गरीबी उन्मूलन पर आयोजित व्याख्यानमाला को संबोधित कर रहे हैं। इसका आयोजन बरबीघा एसकेआर कॉलेज में लाला बाबू की जयंती पर किया गाय था। इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा भारत के आजादी का सपना आज भी शोषकों के द्वारा जारी शोषण की वजह से अधूरा है। उन्हांेने कहा भारत सरकार को गरीबी की पहचान का मापदंड बदलना होगा। देश के लिए जाति प्रथा को सबसे खतरनाक बताया। देश की अर्थव्यवस्था पर प्रहार करते हुए श्री प्रसाद ने कहा कि 16 प्रतिशत  बजट खर्च से देश का 65 प्रतिशत किसान जीता है। उन्होंने गरीबी का मापदण्ड सिर्फ भोजन को नहीं मानने पर जोर देते हुए जीवन यापन की सभी मूलभूत चीजों को इसमें शामिल करने पर बल दिया। तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट की चर्चा करते हुए उन्होंने 37 प्रतिशत गरीब को 35 किलो अनाज 2 से 3 रूपया पर देने की योजना को सही नहींे बताया।
औधोगिकीकरण पर प्रहार करते हुए ईश्वरी प्रसाद ने साफ कहा कि दुनिया के किसी देश के पास इतनी क्षमता नहीं की बेरोजगारों को रोजगार दे सके यह क्षमता कृषि क्षेत्र को ही है। सरकार के ग्रोथ रेट को ढकोसला बताते हुए कहा इससे देश का विकास नहीं होगा। देश में आज जिस अनुपात में खरबपति बढ़ रहे है उसी अनुपात में गरीबी भी बढ़ रही है। स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए प्रो0 ईश्वरी ने कहा कि इसके अनुसार 37 प्रतिशत किसान खेती नहीं करना चाहते है जबकि मेरा मानना है कि 100 प्रतिशत किसान खेती नहीं करना चाहते। खेती में उत्पादन लागत अधिक होना और बिक्री के लिए बाजार नहीं होना इसका मुख्य कारक है।
बिहार विकास की खींचाई करते हुए ईश्वरी प्रसाद ने कहा की रोड का बनना विकास नहीं है बल्कि उर्वरक बिजली और खेती में सुधार को बिहार का असली विकास माना जाएगा। व्याख्यान माला में खेती को मजबूत कर देश के विकास की परिकल्पना का खाका खिंचते हुए उन्होंने किसानों को सबसे अधिक जोखिम लेने वाला  व्यापारी करार दिया। 

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