07 मार्च 2010

बहस जारी अभी जारी है...... हुसैन की पेंटिग-हंगामा है क्यों है बरपा थोड़ी सी जो पी ली है।



जी, थोड़ी सी पीने पर हंगामा बरपा कर रहें हैं। यह मुद्दा विवादास्पद है सो इससे बचना चाहिए। क्यों, विवाद से बचने की अपनी आदत जो है, पर विवाद खड़ा करने की आदत भी अपनी ही है। कुछ बात जो मैं कहना चाहूंगा वह यह कि हुसैन की पेंटिग मे हिन्दू देवी देवता की नंगी तस्वीर होना इतना बड़ा जुर्म है कि इसके लिए हम सर कलम तक करने का फरमान दें। कुछ लोगों का तर्क है कि मोहम्मद साहब की पेंटिग बनाकर देखते तो एम एफ को समझ में आता और वे लोग ऐसा करते है तो मैं क्यों नहीं। भाई मोहम्मद के अनुयायी इसीलिए आज आतंकवादी कहला रहे है। वे नहीं चाहते कि महिलाऐं बुर्क छोड़े, वे नहीं चाहते कि महिलाऐं शिक्षित हो, वे नहीं चाहते की कोई नमाज अदा न करे और वे यह भी चाहते है कि सारी दुनिया मेरा ही कथित धर्म को माने। बात खजुराहो की कोई क्यों नहीं करता। खजुराहों की मन्दीर में, जीं हां मन्दीर में देवी देवता कामरत है।

आइऐ थोड़ी और बहस करें, आचार्य रजनीश ओशों को कौन नहीं जानता, वहीं रजनीश जिनके यह कहने पर संभोग समाधी का मार्ग है हंगामा हो गया। उनके कुछ शब्द यहां प्रस्तुत कर रहा हूं यह भी सही है कि सभी इससे इत्तेफाक नहीं रखेगें पर फिर भी........

यदि तुम किसी को सताना चाहते हो तो नैतिकता सबसे अच्छा और सरल उपाय है। उसके जरिए तुम दूसरे में अपराध भाव पैदा कर देते हो। यह सबसे सुक्ष्म यातना है।

...तुम कामवासना का जीवन जीते हो, लेकिन कभी इसकी चर्चा नहीं करते, चर्चा ब्रहम्चर्य की करते हो। भीतर पशु रहता है और बाहर परमात्मा होने का ढोंग करते हो।
..धर्म जगत की बड़ी से बड़ी क्रंाति है। समाज ने जो किया धर्म उसको वापस तुम्हें मौलिक, मूल, निर्दोष स्थिति में लाना चाहता है, जैसे तुम पैदा हुए हो। झेन फकीर कहते है कि तम्हारे मौलिक चेहरे को खोज लेना धर्म है। जिस दिन तुम जन्मे थे उस दिन तुम जो थे न तुम्हें बुरे-भले का कोई ज्ञान था, न तुम्हें जीवन-मरण को बोध था, न तुम्हें कोई भय था न कोई घृणा थी, न कोई आसक्ति थी, न तुम संसारी थे, न तुम संन्यासी थे। इस निर्मलता को पा लेने का नाम सन्तत्व है और धर्म उसकी प्रक्रिया है।
और अन्त में 
ये उनके मिस्जद 
ये उनका मन्दीर
यह जरामवाजों के खुदा का घर है
तो मेरे खुदा यहां नहीं रहते.................शेष फिर।

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...