12 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर पुलिस की बसूली बंद हो।

गणतंत्र दिवस पर पुलिस की बसूली बंद हो।
अरूण साथी, शेखपुरा, बिहार

बहुत दुख होता है जब बीच सड़क पर बाहनों को रोक या फिर बड़े व्यापारियों
को थाने में बुला कर पुलिस उनसे बड़ी ढीठाई से गणतंत्र दिवस के नाम पर
तिरंगा फहराने के लिए रूपये मांगती है। बिल्कुल फिल्मी अंदाज में यह
बसुली होती है। पुलिस की गाड़ी सड़क पर खड़ी होती है और उसमें रहते है
पुलिस के अधिकारी तथा उनका मातहत, वाहन चालकों से गणतंत्र दिवस के अवसर
पर समारोह आयोजित करने के लिए रूपये वसूल करती है। यह बसूली करीब एक
सप्ताह तक चलती है और किसी के द्वारा इसके उपर चूं चपड़ नहीं किया जाता
है। होता क्या है, `जन गण मन अधिनायक जय है भारत भाग्य विधाता´ गा कर
तिरंगे को सलामी देते है और फिर समारोह में आमंत्रित दबंगों, बाहूबलियों,
उच्चकों को सासम्मान मिठाई बांटी जाती है। पुलिस यू ंतो बसुली के लिए ही
जानी जाती है और एफआईआर से लेकर जांच तक में पुलिस धमका कर रूपये बसुलती
है। यहां तक कि जो हमारे यहां चलन है उसके हिसाब से यदि आप पीड़ित है तोे
आपको एफआईआर दर्ज कराने के लिए नजराना देना पड़ता है पर साथ ही यहां
दूसरे पक्ष को भी खबर भेजवाई जाती है की वह भी आकर एक मुकदमा कर दे ताकि
बाद में समझौता कराया जा सके और उससे भी मोटी रकम बसूला जाता है। अवैध
गेसिंग के अडडे, चुलौआ जहरीले दारू की भठिठयों तथा अपराधियों से बसुली की
तो पुरी सूची ही थाने में रहती है और कौन कितना देगा यह भी पता रहता है,
और हो भी क्यों नहीं प्रमुख थाने में आने के लिए एक लाख से उपर तक की
बोली लगती है और जो यह देते है उनको पुलिस कप्तान के द्वारा थानाध्यक्ष
बनाया जाता है उस पर भी गाहे बेगाहे फरामाईसों को भी पूरा करना आवश्यक
है।
खैर! यह सब तो पुलिस और पब्लिक के बीच में एक अलिखित संविधान की
स्वीकार्याता का रूप ले चूका है पर गणतंत्र दिवस के नाम पर पुलिस की
बसूली बहूत ज्यादा तकलीफ देती है! तकलीफदायक तो पुलिस का हरएक काम ही
होता है और कभीकभी सोंचता हूं कि अंग्रेजों के खिलाफ लोग कैसे लड़े होगें
जबकि आज कथित लोकतंत्र में पुलिस का इतना खौफ है कि कोई कुछ नहीं कहता।
क्या उच्चाधिकारियों, सरकार के मुखीया अथवा अन्य आवाज उठाने वालों को यह
नहीं मालूूूूम!
जो भी हो, पर गांधी जी, भगत सिंह और बोस को याद करने वाले इस महापर्व को
तो कम से कम स्वच्छ रखें !
जय हिन्द।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...