18 जनवरी 2010

मिडिया बिकाउ है सवाल यह है कि जबाब क्या है उर्फ ``रगों में बहते हुए के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´

मिडिया बिकाउ है.
सवाल यह है कि जबाब क्या है?
उर्फ
``रगों में बहते हुए के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´
इस बिके हुए मिडिया को मैने करीब से देखा है और यह कह सकता हूं कि आज
मिडिया सरकार और पूजिंपतियों की चारणी कर रही है तथा उनका ही मुख्य पत्र
और भोंपू बन कर समाचार प्रकाशित हो रहे है। सवाल यह और छुपा हुआ नहीं है,
पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका जबाब क्या है। श्रमजीवी कहलाने वालों को
तो जानता हूं एक कप चाय और दो समोसे उनकी कीमत है। सुबह की शुरूआत थाने
की चाय-नास्ते से होती है और दोपहर समाहरणालय में किसी बाबू की दाबत उड़ा
रहे होते हैं और रात नेताजी की मस्त पार्टी का मजा भी उनका अपना ही होता
है और अन्तत: उनका भोंपू बन कर अखबारों का पन्ना गन्दा कर देते है या
टीवी पर समाचारों का बलात्कार करते है। इतना ही नहीं अब तो अपने मित्रोें
को देख रहूं पदाधिकारियों से पार्टी मांगते है और वहां जम कर शराब की
वैतरणी मे डुबकी लगाते हुए पापों का प्रािश्चत करते है। हमारे इलेक्टोनिक
मिडिया के बंधू को तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता वे तो बन्दर बन कर नाच
जमूरे नाच पर करतब दिखा रहे है। समाचार संकलन करने वाले हमारे बंधू सुबह
से ही समाचारों को बेचने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते है कि आज बोहनी
अच्छी हो। और उनके कैमरे में कैद विजुअल तभी चैनलोंे को जाता है जब उसका
सौदा नहीं पटता और चैनलों का प्रबंधकों की हालत तो सभी जानतें है। ये
मदारी है और वहां है कुछ अतिविशिष्ट बन्दर जो नाचना नहीं चाहते हों पर एक
से डेढ़ लाख की पगार उन्हें भी नाचने पर मजबूर कर देते है। सवाल यह भी है
कि क्या आज जो मिडिया में पूजीं लगा रहे है वह 200 करोड़ से 2000 करोड़
तक की होती है तब कोई समाज सेवा करना उनका मकसद नहीं होता है और जब मकसद
साफ है तो फिर हम या तो उस मकसद को पूरा करने का माध्यम बने या फिर अलग
हो जाए। यदि मकसद को पूरा करने का माध्यम बना तो कौरवों का सौनिक
कहलाऐगें और अलग हुए तो भगोड़ा। तब शेष कृष्ण की सेना में जो लोग शामील
होने की मंसा पाले हुए है उन्हें वह कहीं दिखता ही नहीं।
इसी विवशता पर राष्टकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है-समर शेष है नहीं
पाप का भागी केवल ब्याध, जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध।
सवाल यही है कि जबाब क्या है
अन्त में गालिब ने ठीक ही कहा है कि ``रगों में बहते हुए के हम नहीं
कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´

सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...