24 जनवरी 2010

गांव से विलुप्त हो रहें प्रेमचन्द्र का हीरा-मोती

हीरा-मोती नामक दो बैलों के साथ प्रेमचन्द ने पूरी कहानी ही गांवों में
किसानों के पशु प्रेम और पशुओं की महत्ता को दशाZता है पर आज पशुओं के
साथ लोेंगों के द्वारा किस प्रकार का व्यवहार किया जाता है इसे इस बात से
समझा जा सकता है किसानों के खेतों में हल चलाने वाले बैल बिलुप्तावस्था
में पहूंच गये है। गांव में आज से दो दशक पूर्व प्रत्येक घर के पीछे एक
जोड़े बैल रहतें थे वहीं आज कई कई गांव में भी एक जोड़ बैल खोजने से नहीं
मिलता है। कुछ गांव में अगर बैल है भी तो समूचे गांव में मात्र एक जोड़ा।
बैल को बिलुप्त होने के पीछे कई कारण है जिसमें से प्रमुख किसानों को
खेती में किए जाने वाले लागत के वनिस्पत लागत मुल्य भी किसानों में नहीं
मिल पाना है। किसानों के लिए बैल को एक साल में महज कुछ माह तक खेती के
लिए रख पाना घाटे का सौदा लगने लगा है जिसकी बजह से किसान बैल को बेच कर
ट्रेक्टर से खेती करना ज्यादा फायदे का सौदा समक्षते है। आधुनिक खेती का
हवाला देकर सरकार के द्वारा भले किसानों के कृषि यन्त्र पर सब्सीडी बगैरह
की व्यवस्था कर दी है पर प्रमुख और बड़े किसानों तक ही यह लाभ सिमट कर रह
गया है। छोटे किसान भाड़े पर ट्रेक्टर लेकर अपने ख्ेातों की जुताई
कराबतें है पर किसानों के लिए वह भी घाटे का सौदा ही साबीत होता है।
किसान भले ही बैलों को बेच कर ट्रेक्टर के सहारे अपनी खेती करना प्रारंभ
कर दिये हैं पर ट्रेक्टर के सहारे किये जाने वाली खेती भी डीजल की महंगाई
की वजह से काफी महंगीं हो गई पर किसानों के सामने अब महज ट्रेक्टर ही एक
मात्र विकल्प बच गया है। ट्रेक्टर से खेती करने में किसान 600 से 800
प्रति बीघे की दर से कीमत देतें हैं जिसके बाद खेती के अन्य खर्चे भी
किसानों को करना पड़ता है और अन्त जो अन्न उपजता है उससे किसानों का लागत
भी नहीं मिल पाती है। बैलों के सहारे खेती करने वाले साधारण किसानों को
कई तरह की जैव विविधता का लाभ भी मिलता था जिसके सहारे परिस्थितिकी का
सन्तुलन भी बना रहता था पर किसानों को ट्रेक्टर से खेती करने में परेशानी
भी उठाना पड़ रहा है। ट्रेक्टर से खेती करने में जहां एक साथ सभी खेतों
की जुताई तुरन्त हो जाती है वहीं खेतों में काम करने वाले मजदूर को लेकर
मारामारी मच जाती है। पूर्व में बैल से खेती करने पर धीरे धीरे खेती का
काम होता था तथा मजदूरी की समस्या नहीं रहती थी।
पर्यावरण की समस्या के साथ ही खेती के हीरा-मोती बैल को बचाने के लिए भी
सरकार और समाज को कुछ प्रयास करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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