20 जनवरी 2010

गोपाल कुमार झा की ब्लॉग आइये करें गपशप पढ़ने के बाद माओवाद पर टिप्पणी उर्फ आइये आप भी नक्सलियों को गली दें...........

गोपाल कुमार झा की ब्लॉग आइये करें गपशप पढ़ने के बाद माओवाद पर टिप्पणी
उर्फ
आइये आप भी नक्सलियों को गली दें...........
आदरणीय गोपाल जी
चलिए अच्छा हुआ आप माओ को नहीं जानते,`या फिर जानन नहीं चाहते´ जानते
होते तो आज माओवादियों को भी जानते। माओवाद इतिहास नहीं यह आपका वर्तमान
है। पर आंख की रौशनी कम हो और उसपर पूंजीवाद का चश्मा हो तो दिखेगा भी
वही, इसलिए इसमें आपका कोई दोष नहीं। आपको राजधानी को बंगाल में रोका
जाना दिखता है और मैं देखता हूं कि राजधानी को हथियारबन्द नक्सलियों के
द्वारा रोके जाने के बाद भी किसी यात्री के साथ बदतमीजी तक नहीं करना, वह
भी उस राजधानी रेलगाड़ी में जिसमें समाज का वह वर्ग यात्रा करता है जिसकी
एक यात्रा खर्च कथित नक्सलबादियों का पूरा परिवार एक माह पलता है। आपको
पुलिस वालों को मारा जाना दिखता है पर मैं जो देखता हूं वह है पुलिस का
अत्याचार। रोज रोज पुलिस थाने में आम गरीब आदमी को थाने में उठा कर लाया
जाता है और कानून को ताक पर रख डण्डे की जोर से हजारों नज़राना वसुला
जाता है। मुझे याद कि कुछ साल पूर्व मैं रेल यात्रा के क्रम में पटना से
लौट रहा था तभी कुछ लोग रेलगाड़ी पर अखबार में नक्सलियों के द्वारा
पुलिस कि की गई हत्या की खबर पढ़ रहे थे और उनके मुंह से निकल रहा था
ठीक ही हुआ कोई तो है जो उनको भी सजा दे सकता है। आपको नक्सलवादियों के
द्वारा लोगों को मारा जाना दिखता है और मैं जो देखता हूं वह है गरीबों पर
दबंगों को अत्याचार का। मैंने अभी हाल ही समाचार संकलन के क्रम में
पहाड़ों में काम करने वाले मजदूर का रिर्पोट अपने चैनल के लिए बना रहा था
और उसी क्रम में एक मजदूर चन्द्रश्वर मांझी ने एक गीत गाया जो यहां रख
रहा हूं भले ही महानगरों बैठे लोग मेरे इस विचार से सहमत नहीं होगों और
आदमी की हत्या को जायज नही ठहरायेगे और मैं भी इसे जायज नहीं ठहराता पर
जब किसी की पेट की रोटी कोई छीन ले, जब कोई कंकीट के उंचे महल मेें रहे,
जब किसी के बहन-बेटी की आबरू लूट ले, और जब कोई किसी के मुंह में मजदूरी
मांगने पर मूत दे तो कोई क्या करेगा। हां यह बात भी सच है कि आज माओवाद
के नाम पर देश को तोड़ने वाली शिक्यां भी काम कर रही है पर परमाणु के
अविष्कार का भी नाकारात्कम पहलू है। ओर फिर आज लोग नक्सलवाद को बीमारी
मान रहें है। उन सज्जनों को मैं बता दूं कि नक्सलवाद बिमारी नहीं है
बल्कि बीमार समाज का धोतक है और हम सभी बिमारी के ईलाज के बजाया बीमार को
ही मारने की बात करते है।
यह रही मांझी की कविता........................
साबुन सेंट बहार सिनेमा, खुश्बू इतर गुलाब की, बिछल फरस पर होवे मुजरा,
देखे मालीक टहल टहल, महल करे है चहल पहल, झोपरिया है सुनशान पड़ल,
झोपरिया में धरल डीबरिया तेल के बन्दोवस्त नहीं, महल झरोखे बरे बिजरूया,
झोपरिया है अंधार परल।

और भी कुछ था जो मुझे याद नहीं पर अन्त में था

न मरव हम बिना रोटी और न मरव हम भूख से
मरना है तो मरजायेगें सरकारी बन्दूक से........................
उस देश की बारे में सोचे जहां देश की पूंजी का 25 प्रतिशत 100 लोगों के
हाथ में है। उस देश के बारे में सोचे जहां देश की 45 प्रतिशत आबादी की
मासीक आय 450 रू0 है।............
लाल सलाम

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