31 जनवरी 2010

पदाधिकारियों की मिलीभगत से जारी है उर्वरकों की कालाबाजारी, किसी पार्टी के नेता नहीं उठते इनकी आवाज

कृषि प्रधान देश में किसानों की हालत कितनी दयनीय है उसे इस बात से समझा
जा सकता है कि 500 रू0 में बिकने वाला डी. ए. पी. सहित अन्य उर्वरक 800
रू0 में किसान कालाबाजर से खरीद रहे हैं और इनकी समस्या पर आवाज उठाने
वाला न तो कोई नेता है और न ही प्रशासन इस दिशा में संवेदनशील। अपनी
बदहाली पर मजबूर हो किसान उर्वरक खरीदने के लिए दुकानदारों की चिरौड़ी कर
रहें हैं और पहले तो दुकानदार उर्वरक नहीं होने की बात कहतें है और बाद
में उंची कीमत पर तैयार होतें है। उर्वरक की कालाबाजारी की समस्या कितनी
गम्भीर और संवेदनशील है कि इससे जुड़े थोक व्यापारी अरविन्द कुमार
प्रशासन के द्वारा छापामारी किए जाने पर किसानों से और अधिक किमत बसूलने
की बात निर्लज्जता के करते हैं। उनका मानना है कि जब भी प्रशासन सक्रिय
होता है तो उन्हें नज़राने की रकम बढ़ानी पड़ती है और कालाबाजरी जारी
रहेंगा। ऐसी बात नहीं है कि यहां उर्वरक की किल्लत है, थोक व्यापारी इसकी
कृत्रिम किल्लत पैदा कर अधिकारियों की मिली-भगत से किसानों को दोनों
हाथों से लूट रहें हैं। इस सम्बंध में सूत्र बतातें है कि पूर्व में
आनन्द एन आनन्द नामक फर्म के मालिक के जीवित रहने पर उर्वरक की
कालाबाजारी पर अंकुश रहती थी पर उनके अचानक निधन के बाद यहां एक मात्र
थोक व्यावसाई रह जाने की वजह से उनके द्वारा मनमना मूल्य बसूला जा रहा
है। बताया जाता है कि बुल्लाचक स्थित दुगाZ फर्टिलाइजर नामक स्थित फर्म
के द्वारा खुदरा व्यावसाई से सादे वाउचर पर हस्ताक्षर करा लिया जाता है
और उनसे 425 रू में मिलने वाली एन. के. पी. नामक उर्वरक को 525 रू0 में
दिया जाता है और खुदरा व्यापारी उसे किसानों को 550 रू0 में बेचते हैं।
बताया जाता है उक्त व्यावसाई का गोदाम सामाचक स्थित कचहरी तथा मिशन चौक
से वारसलीगंज जाने वाली मार्ग के किनारे स्थित है पर उस पर कभी प्रशासन
की नज़र नहीं जाती। सूत्रों की अगर माने तो उर्वरक की कालाबाजारी में
स्थानीय और जिला स्तर के पदाधिकारियों की स्पष्ट संलिप्तता रहती है
क्योंकि जितनी उर्वरक जिले को आवंटित होती है वह जिले के गोदामों में आया
कि नहीं इसकी सत्यापन करना, इसकी विक्री पर नज़र रखना पदाधिकारियों का
काम है पर नज़राने के दम पर सारा कार्य कागजों पर हो जाता है। बताया जाता
है उक्त गोदामों में चोरी छिपे उर्वरकों को रखा गया है और चोरी छिपे उसकी
विक्री की जाती है।

ऐतिहासिक गौशाला हुआ विरान

कभी ऐतिहासीक रहा यह गौशाला आज विरान हो गया। इस गौशाले के सभी जानवार या
तो मर गए या फिर इन्हें भुखमरी से बचाने के लिए शेखपुरा स्थित गौशाला भेज
दिया गया। इस संस्था से जुड़े लोग कहते है कि अब पहले जमाने वाले आदमी ही
नहीं बचे। पहले लोग अपनी मर्जी से दान देकर गौशाला चलाते थे आज तो इसकी
संपत्ती को भी लोग हड़पे हुए हैं।
इस गौशाला के पास अपनी एक एकड़ के आस-पास जमीन है तथा जानवरों के पानी
पीने तथा स्नान इत्यादि के लिए एक तलाब भी बाजार के लोगों ने करवाया था
जिसमें आज भी मछली पालन का काम किया जाता है। जनवरों के हरे चारे के लिए
भी लोेेगों ने खेत दान में दिया जो आज बंजर रहता है। लोग बताते है कि कुछ
वर्ष पूर्व कार्तिक महीने में तीन दिनों का भव्य मेला का आयोजन किया जाता
था। मेले में जनवरों को सजा कर बाजार का भ्रमण कराया जाता था।
आज भी गौशाला के पास अपना भवन है जिसमें जानवर रह सकते है पर पूरी तरह
से बाजार से मिलने वाले वृति तथा जनसहयोेग पर टिका हुआ गौशाला घीरे-घीरे
कब खत्म हो गया लोगों को पता भी नहीं चला। लोग बताते है कि व्यावसायियों
के द्वारा गौशाला के नाम पर वृति तो कटी जाती थी पर वह गौशाला न पहुंच कर
उनकी जेब में ही रह जाता था। और गांव से पूर्व में जनवरों का चारा
इत्यादि का इन्तजाम दान से हो जाती थी पर आज कोई भी इसमें दान देना नहीं
चाहता।
लोेग बताते हैं की गौशाला के खत्म होने का एक प्रमुख कारण यह भी रहा कि
सामाजिक कार्य में भी पैर खींचने की मानवी प्रवृति से उब समाजिक
कार्यकर्ता रामु छापड़िया ने इस कमिटि से इस्तीफा दे दिया। तात्कालिन
अनुमण्डलाधिकारी प्रभाकर झा ने बैठक बुला कर नई कमिटि का गठन कर दिया तथा
व्यावसाईयो को वृति देने का काड़ा निर्देश दिया। बाद के दिनों में उनका
स्थानांनतरण हो गया और नई कमिटि शिथिल हो गई। लोग बताते है कि गौशाला के
नाम पर वृति तो काटी जाती थी पर वह गौशाला के जानवरों तक नहीं पहुंच पाता
था। कमिटि के लोग एक भी बार गौशाला की ओर रूख नहीं किया और उधर भुख से
जानवर मरते रहे और सेठजी की तिजोरी भरती रही। बताया जाता है इस कमिटि में
सभी व्यापारी वर्ग के लोगों को रखा गया ताकि वे वृति के रूप जानवरों के
खर्चों का जुगाड़ कर सकेगें। पर ऐसा नहीं हुआ और व्यापारी वर्ग के लोेग
अपनी दुकानों में व्यस्त रहे।
आज भी गौशाला के नाम पर वृति व्यापारियों के द्वारा काटी जा रही है पर
वह व्यापारियों के जेब में ही रह जाती है। गौशाला से जानवर के चले जाने
के बाद भी कमिटि ने अपना इस्तीफा नहीं दिया है और न ही वे किसी प्रकार का
देख भाल कर रहें है। संस्था के लोगों ने बताया कि गौशाला से अब उन्हें
कोई लेना-देना नहीं है न ही कोई गौशाला के नाम पर वृति काट सकता है। अगर
ऐसा हो रहा है तो पुलिस उसपर कारवाई करे।
गौशाला बन्द होने पर किसानों को वृति नहीं देना है इस बात कि ना तो
विधिवत धोसण कि गई नहीं किसी प्रकार का प्रचार कराया गया इस वजह से भोले
भाले ग्रामीणों से वृति काट लिया जाता है।
गौशाला के इस तरह बदहाल होता देख दबंग लोग अब इसपर अपना कब्जा जमाना
चाहते है और इसके लिए अभी से प्रयास किया जाने लगा।
बताया जाता है कि समाचक में गौशाला के नाम से मेन रोड पर एक दुकान के
लायक जमीन है जिसे लोगों ने कब्जा कर लिया। इस तरफ कोई भी ध्यान नहीं दे
रहा। कमिटि भी इसके लिए हमेशा उदासीन रही।
बिहार के उपमुख्य मन्त्री प्रति दिन गौशाले की उत्थान की बात कह रहे है
पर उनकी कथनी और करनी में कितनी समानता है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा
सकता है कि कई साल तक लगातार संपर्क किए जाने पर भी उनकी ओर से कोई
ध्यान नहीं दिया गया और अन्तत: अजीज आकर लोगों ने गौशाल के जानवरों को
शेखपुरा पहुंचा दिया था।
आज धिरे धिरे लोग गौशाला कि जमीन पर अपना कब्जा बनाने का काम शुरू कर
दिया है और इस ओर कोई भी दिया जाता है।

30 जनवरी 2010

मां-बाप ही बिगाड़ रहे बच्चे का भविष्य।

नहीं सर हम पढ़ना नहीं चाहते, ऐसे ही कमा लेते है। अब्बा काम नहीं करते
है दारू पीकर पड़़े रहते है हम और अम्मी कमाते है यह कहना है 12 साल के
आरीफ का। आरीफ बरबीघा नगर क्षेत्र के फैजाबाद की झोपड़ियों में रहता है।
आरीफ सिर पर पुराना कपडा़ लेकर उसे मोटरसाईकिल एवं जीप के गेराजों में
बेचता है। एक पुराना कपड़ा आरीफ 15 रू0 में बेचता है तथा वह प्रति दिन
चार से पांच कपड़ा बेच लेता है। आरीफ बताता है उसकी अम्मी गांव में जा कर
बर्तन बेचती है तथा पुराने कपड़ों से बर्तन बदल भी देती है और उससे जो
कपड़ा मिलता है उसे वह बाजार में लाकर बेचता है। आरीफ पढ़ने के बारे में
पूछे जाने पर सहम जाता है उसे लगता है जैसे कोई सरकारी कर्मचारी स्कूल
में डालने की कोशिश कर रहा है और वह वहां से जाना चाहता है। बहुत पूछे
जाने पर आरीफ पढ़ने से साफ इंकार करते हुए कहता है की सुबह चार बजे से वह
कमाने के लिए निकल जाता है और उसके साथ उसकी बहन भी होती है। आरीफ ने
बताया कि वह सुबह में कचरा चुनता है तथा उसे दोपहर तक कचरे की दुकान में
जाकर बेच देता है और घर आने के बाद जब मां गांव चली जाती है तो वह भी
कपड़ा लेकर बाजार में उसे बेचने के लिए निकल जाता है। आरीफ ने बताया कि
उसके अब्बा कभी काम नहीं करते तथा कुछ काम भी करते है वह दारू पी जाते
है। आरीफ डरते डरते बताता है उसके अब्बा उसके द्वारा कमाया गया पैसा भी
उससे छीन लेते है तथा दारू पी जाते है एवं उसकी अम्मी की पीटाई भी करते
है।
एक अकेले आरीफ की नहीं जिले में रहने वाले कई ऐसे परिवार है जिनकी
जिन्दगी यही है। बरबीघा के फैजाबाद में कई परिवार महज प्लास्टिक की
झोपड़ी में अपने एक दर्जन परिवार के साथ रहते है। इनलोगों के लिए सरकार
की कोई भी सुविधा नहीं होती है। न तो बीपीएल में इन लोगों का नाम होता है
और नहीं किसी अन्य तरह की सुविधा इन्हें मिलती है।

ये युवराज कौन है?

बहुत दिनों से मन चिढ़ रहा है। युवराज का नाम सुन सुन कर कान पक गए। सारी
कहानी राजतन्त्र की तरह चल रही है। मिडिया से लेकर प्रशासनीक महकमा तक,
सभी नतमस्तक। युवराज. युवराज चिल्लते लोगों को देख अब लगता है जैसे हम
200 साल पीछे किसी राजतन्त्र के गुलाम निवासी है। हद तो तब हो जाती है जब
युवराज के चरणस्पशZ के लिए बड़े बड़े आपाधापी करते हुए गिर पड़ते है और
युवराज चरणस्पशZ करा कर एक कुटील मुस्कान छोड़ते हुए सोचता है कि इस देश
को सचमुच गुलामी की आदत हो गई है। इतना ही नहीं युवराज दलित के घर जातें
है, उनका हाल चाल लेते है, उनसे बातें करते है और इस सब के पीछे कितना
कुछ खर्च होता है कौन पूछता है। और यह सब नौटंकी नही न्तो क्या. यही
युवराज अब बिहार आ रहे है। मिडिया में खबर ऐसे छाया हुआ है जैसे सच का
युवराज आ रहे है। गया जाएगें, तो जाओं भौया तुम्से कोई थोड़े पूछ रहा की
युवराज हो तो गरीबों की चीनी, गरीबों की रोटी-दाल और गरीबों की रौशनी छीन
रहे हो। युवराज हो तो तुमसे कोइ थोडे़ पूछ रहा कि तुम भारत के
प्रधानमन्त्री के सम्बंध में कहते हो कि मैं प्रधानमन्त्री से मंहगाई कम
करने के लिए कहूंगा। कहो भौया, आखिर युवराज हो। सभी कह रहे है कि युवराज
का क्रेज युवाओं मे काफी है, चलो मैं तो बुढ़ा हो गया। मुझमें क्रेज
नहीं। और क्यों क्रेज रखे, जो भारत के लोगों को समझ नहीं सकता, जो आम
आदमी से मिलने पर आम नहीं रह सकता, जो खुद ईश्वरिया समझ के साथ काम करता
हो, जो सचमुच मे युवराज हो मैं उसका क्रेज नहीं रख
सकता।.................
और मैं उस युवराज को नहीं जानता. आप जानते हो तो मुझे मत बताइऐ। यदि कोई
युवराज है तो मैं पूछता हूं-अफजल गुरू को फंसी क्यों नहीं? कसाब हमारा
मेहमान क्यों? पवार चीनी मिल का मालिक, कृषि मन्त्री क्यों? दलितों को दो
जून की रोटी क्यों नहीं? नरेगा की राशि दलालों की जेब में क्यों? इन्दिरा
आवास में दलाली क्यों?
युवराज जी आपने क्या किया है इस सब के लिए, आखिर आप युवराज है जिसका
नैतिक धर्म देशप्रेम होता है।

29 जनवरी 2010

जीप ने बच्चे को कुचला, उग्र ग्रामीणों ने जीप को जलाया

जयरामपुर थाना क्षेत्र के उखदी गांव में एक जीप की टक्कर से जहां 10 साल
के बच्चे सुधीर कुमार की मौत घटनास्थल पर ही हो गई वहीं इस धटना से
गुस्साए लोगों ने जीप (बीआर 21 ए 7592) को पकड़ कर उसे आग के हवाले कर
दिया। घटना उस समय की है जब बरबीघा से सवारी लेकर नालन्दा जिले के पोझ जा
रही जीप की चपेट में उखदी गांव के पास एक बच्चा आ गया तथा इसके साथ ही
उसकी वहीं मौत हो गई। इस घटना कें बाद गुस्साए ग्रामीणों के द्वारा जीप
को पकड़ लिया गया तथा उसे आग के हवाले कर दिया गया। घटना में जीप पर सवार
करीब आधा दर्जन सवारी को भी ग्रामीणों ने पिटाई कर दी। घटना कें बाद
पुलिस काफी देर के बाद घटनास्थल पर पहूंची तथा शव को जब्त कर पोस्टमार्टम
कें लिए भेजने की तैयारी की जा रही है। इस घटना के सम्बंध में ग्रामीणों
ने बताया कि संजय कुमार अपने पिता गेनाढी मण्डल के साथ खेत से आ रहा था
कि तभी सड़क किनारे चल रहे उसके पुत्र को जीप ने जोर से टक्कर मार दी।
घटना के बाद सुधीर कुमार की वहीं मौत हो गई। इसके बाद ग्रामीणों ने जीप
को खदेरना प्रारंभ किया जिसके बाद चालक जीप को छोड़ कर भाग खड़ा हुआ और
उग्र ग्रामीणों ने जीप को आग के हवाले कर दिया। उग्र ग्रामीणों के द्वारा
सड़क पर लकड़ी की सिल्ली रख कर जाम कर दिया गया है। धटना स्थल पर पुलिस
निरीक्षक अरूण ंशुक्ला के द्वारा ग्रामीणों को समझाया बुझाया जा रहा है
तथा मुआवजे के लिए प्रशासनीक पहल की जा रही थी।

सानीया की टूटी सगाई- आपको भी हो बधाई।

जैसे ही मेरे एक मित्र ने सानीया की सगाई टूटने की खबर सुनी उनकी बांछे
खिल गई और तुरन्त महोदय ने मुझे फोन लगाया, बोले बधाई हो सानीया की सगाई
टूट गई। पहले तो मैं अकचकाया पर फिर बात समझा, तो महोदय से बोला कि भला
सानीया की सगाई टूटने से आप इतने खुश क्यों है। मित्र महोदय ने अपने दिल
के अरमान उड़ेल दिया वैसे ही जैसे किसी ने पानी भरे मटको को पत्थर मार कर
फोड़ दिया हो। कई तरह की उपमांऐं दी जिसे मैं यहां नहीं दे सकता। अब
मैंने भी कुछ सवाल महोदय से पूछ ही डाला। मैने पूछा भला बताओं तो सानीया
किस लिए प्रसिद्ध है तो महोदय ने छूटते ही जबाब
दिया-फुटबाल......................।
मैने अपने मित्र महोदय को बताया सानीया की सगाई तो टूटनी ही थी भला बताओं
तो जब सानीया टेनिस कोर्ट में पहले ही राउण्ड में बाहर हो रही है तो
सोहराव को यह खुशफहमी थी कि वह फाइनल राउण्ड खेलेगा तो दोषी वह खुद ही
है। सानीया को वैसे ही सनसनी कही जाती है, किस लिए यह तो कहने वाले ही
बताएगें पर जो लोग टेनिस का ट भी नहीं समझते उनके मोबाइल के बालपेपर में
सानीया सनसनाती रहती है। सानीया की सगाई क्या टूटी अपना मसूदन भाई चाय की
दूकान पर दलीलें देते नहीं थक रहे थे। कह रहे थे कि भला बताइए तो, यह
सगाई नहीं टूटती तो कैन टूटती। कितनों की बददुआऐं सोहराब ने ली थी। जब से
फुटबाल प्रेमियों ने सानीया की सगाई की खबर सुनी तभी से सभी इसके टूटने
की दुआ मांग रहे थे और उपरवाले ने इसे सुन ली। सानीया ने कितनों का दिल
टूटने से बचा लिया।
धन्य हो मिडिया गुरूघंटाल आप भी एक दम रपेट दिया। सगाई टूटने की खबर को,
ऐसे रपेटा जैसे एक भी आशीक छूट गया सानीया का दिल टूट गया। कितने
परोपकारी है , एक दम भांप लेते है कि युवाओं के दिलों में क्या धड़कता है
और सानीया की सनसनी का तो बात ही निराला है।
जय हो मिडिया गुरूघंटाल.............

28 जनवरी 2010

आज बिहार पूर्णत: बन्द रहा. क्या यह मंहगाई के खिलाफ जनता की हुंकार है?

राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी आज बिहार की
सड़कों पर दिखी। इससे पूर्व लालू यादव भोंपू के सहारे लोगों से मंहगाई और
नीतीश सरकार के कार्यकलापों के खिलाफ बिहार बन्द को सफल बनाने की अपील
करते दिखे और उनकी अपील सफल रही । बिहार बन्द सफल रहा। कई जगहों पर
छिटपूट घटनाओं की भी सूचना रही पर बिहार बन्द सफल रहा। लालू जी गदगद है
और इसे जेपी अन्दोलन की तरह बता रहे है। बात जो भी हो पर मंहगाई के खिलाफ
आहूत यह बन्द सफल रहा है और उधर हमारे मुख्यमन्त्री प्रवासी बन विभिन्न
जगहों पर प्रवास कर रहे है ऐसे जैसे रोम जल रहा हो और नीरो वंशी बजा रहा
हो। विकास का राग फिलगुड की तरह ही हवा हो जाएगी ऐसा संकेत आज जनता ने दे
दी पर इसे कोई समझे तब तो। कांग्रेस की तो बिहार में आने का सपना अभी
कोसों तो दूर है और रही सही कसर मंहगाई पूरी कर रही है। इस बिहार बन्द के
सफल होने का सबसे बड़ा उदाहरण है बरबीघा की बन्दी। यह नगर कभी भी बन्द
नहीं होता और राजद का यहां न तो जनाधार है और न ही कोई नेता पर यह नगर भी
स्वत:स्फूर्त बन्द रहा।

25 जनवरी 2010

लगातार जारी है कन्या भ्रुण हत्या।

राष्ट्रीय कन्या दिवस को लेकर भले ही सरकार के द्वारा बड़े बड़े दावे
किये जातें हो पर जमीनी सच्चाई सरकारी दाबों से बिल्कुल इतर है। कन्याअों
के विकास को लेकर न तो सरकार गम्भीर है और न ही समाज। इसी की वानगी है कि
जिले के कई गांवों में बिच्चयां जानवरों के लिए चारा लाने का काम करती है
या फिर गोबर चुनने का काम करती है। अकेले शेखपुरा जिले में प्रति दिन आधा
दर्जन से अधिक कन्या भ्रुण हत्या किए जाने का अनुमान लगाया जाता है। इतना
ही नहीं अल्ट्रासाउण्ड के द्वारा विभिन्न तरह के बिमारियों का ईलाज करने
का दाबा तो किया जाता है पर अल्ट्रासाउण्ड िक्लनिकों का मुख्य कारोबार
कन्या भ्रुण की जांच ही है पर यह कारोबार महज जुबानी ही होती है और इसके
लिए कोई लिखीत पर्ची नहीं होती है। होता यह है कि अल्ट्रासाउण्ड केन्द्र
पर कन्या भ्रुण की जांच के लिए जाने वाली महिलाओं को चुपचाप रहने की सलाह
दी जाती है तथा जांचोपरान्त महिला के कान में चुपके से जांच पदाधिकारी के
द्वारा बता दिया जाता है कि उनके गर्भ में कन्या भ्रुण है या पुरूष
भ्रुण। लाखों की मशीन लगा कर चलाए जा रहे यह कारोबार को पकड़ने की कोई
कार्यवाई किसी के द्वारा नहीं की जाती है तथा यह कारोबार बेरोकटोक जारी
रहता है। पिछले पांच सालों से जिले में अल्ट्रासाउण्ड का केन्द्र के
द्वारा यह कारोबार किया जा रहा है पर आज तक न तो कभी इसकी जांच हुई और न
ही किसी के उपर कोई कार्यवाई की गई। कुछ केन्द्र तो बिना निबंधन के ही
संचालित किया जा रहा है। बताया जाता है कि एक भ्रुण परिक्षण के लिए 700
से 1200 रू0 लिए जाते है तथा महज कुछ मिनट में ही बता दिया जाता है कि
भ्रुण की हत्या होनी है या जीवन मिलना है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू यह है कि कन्या भ्रुण हत्या के लिए
कई नीम हकीमों की दुकान गलियों को खोल दिया गया है जहां महज कन्या भ्रुण
हत्या ही किया जाता है और वह भी महज 200 से लेकर 400 रू0 में। इन
केन्द्रों को निरीक्षण किसी के द्वारा नहीं किया जाता है और बेरोक टोक यह
संचालित रहता है। कन्या भ्रुण हत्या में पुरूषों के साथ साथ महिलाओं का
भी बड़ा योगदान रहता है और महिलाऐं स्वयं पहल कर भ्रुण की जांच कराती है
तथा भ्रुण हत्या भी।

शाकाहारी गिद्ध

आज कल घरती पर उड़ने वाले गिद्ध
हर जगह रहते है।

आज ही तो
आइसक्रीम बेच रहे नन्हें चुहवा पर
चलाया था ``चंगुरा´´
गाल पर पंजे का निशान उग आये
कांंग्रेस पार्टी की सेम्बुल की तरह
बक्क!
आंखों में भर आया
``लाल लहू´´,
पर,
निरर्थक,
वाम आन्दोलनों की तरह।

कल ही रेलगाड़ी में भुंजा बेच रहे मल्हूआ पर
खाकी गिद्ध ने मारा झपट्टा,
बचने के प्रयास में आ गया वह पहिये के नीचे,
सैकड़ों हिस्सों में बंट गया मल्हूआ,
शाकाहारी गिद्धों के हिस्से आया एक एक टुकड़ा।
अब तो हर जगह दिखाई देते है गिद्ध,
कहीं भगवा,
तो
कहीं जेहादी बन कर
टांग देते है अपनी कथित धर्म की धोती खोलकर
अपने ही बहन-बेटी के माथे पर
और फिर नोच लेते है उसकी देह
भूखे गिद्धों की तरह।

गांव से लेकर शहर तक पाये जाते है
शाकाहारी गिद्ध...।

24 जनवरी 2010

मैं रावण हूं।

मैं रावण हूं।
मेरे पास है अहं की पराकाष्ठा,
अविवेक है मेरा सहचर,
मैं नहीं देख सकता अपने से श्रेष्ठ।

मैंने ठानी है लड़ाई फिर राम के साथ,
रक्तपिपासा मेरे मन को चाहिए ``आदमखून´´।

स्वर्णमहल में रहकर भी
नहीं होती है मेरी तुष्टी।

मैं अपने आराध्य के दिये ताकत से करता हूं शासन,
जिसके लिए मैंने की है वषोZ तपस्या।

और अब ,
मै अमर हो गया हूं,
क्योंकि आज कोई राम नहीं।

मुझे डर लगता है बन्दरों से
जिसकी तन्द्रा अगर टुटी
तब मैं कहां जाउंगा.....

गांव से विलुप्त हो रहें प्रेमचन्द्र का हीरा-मोती

हीरा-मोती नामक दो बैलों के साथ प्रेमचन्द ने पूरी कहानी ही गांवों में
किसानों के पशु प्रेम और पशुओं की महत्ता को दशाZता है पर आज पशुओं के
साथ लोेंगों के द्वारा किस प्रकार का व्यवहार किया जाता है इसे इस बात से
समझा जा सकता है किसानों के खेतों में हल चलाने वाले बैल बिलुप्तावस्था
में पहूंच गये है। गांव में आज से दो दशक पूर्व प्रत्येक घर के पीछे एक
जोड़े बैल रहतें थे वहीं आज कई कई गांव में भी एक जोड़ बैल खोजने से नहीं
मिलता है। कुछ गांव में अगर बैल है भी तो समूचे गांव में मात्र एक जोड़ा।
बैल को बिलुप्त होने के पीछे कई कारण है जिसमें से प्रमुख किसानों को
खेती में किए जाने वाले लागत के वनिस्पत लागत मुल्य भी किसानों में नहीं
मिल पाना है। किसानों के लिए बैल को एक साल में महज कुछ माह तक खेती के
लिए रख पाना घाटे का सौदा लगने लगा है जिसकी बजह से किसान बैल को बेच कर
ट्रेक्टर से खेती करना ज्यादा फायदे का सौदा समक्षते है। आधुनिक खेती का
हवाला देकर सरकार के द्वारा भले किसानों के कृषि यन्त्र पर सब्सीडी बगैरह
की व्यवस्था कर दी है पर प्रमुख और बड़े किसानों तक ही यह लाभ सिमट कर रह
गया है। छोटे किसान भाड़े पर ट्रेक्टर लेकर अपने ख्ेातों की जुताई
कराबतें है पर किसानों के लिए वह भी घाटे का सौदा ही साबीत होता है।
किसान भले ही बैलों को बेच कर ट्रेक्टर के सहारे अपनी खेती करना प्रारंभ
कर दिये हैं पर ट्रेक्टर के सहारे किये जाने वाली खेती भी डीजल की महंगाई
की वजह से काफी महंगीं हो गई पर किसानों के सामने अब महज ट्रेक्टर ही एक
मात्र विकल्प बच गया है। ट्रेक्टर से खेती करने में किसान 600 से 800
प्रति बीघे की दर से कीमत देतें हैं जिसके बाद खेती के अन्य खर्चे भी
किसानों को करना पड़ता है और अन्त जो अन्न उपजता है उससे किसानों का लागत
भी नहीं मिल पाती है। बैलों के सहारे खेती करने वाले साधारण किसानों को
कई तरह की जैव विविधता का लाभ भी मिलता था जिसके सहारे परिस्थितिकी का
सन्तुलन भी बना रहता था पर किसानों को ट्रेक्टर से खेती करने में परेशानी
भी उठाना पड़ रहा है। ट्रेक्टर से खेती करने में जहां एक साथ सभी खेतों
की जुताई तुरन्त हो जाती है वहीं खेतों में काम करने वाले मजदूर को लेकर
मारामारी मच जाती है। पूर्व में बैल से खेती करने पर धीरे धीरे खेती का
काम होता था तथा मजदूरी की समस्या नहीं रहती थी।
पर्यावरण की समस्या के साथ ही खेती के हीरा-मोती बैल को बचाने के लिए भी
सरकार और समाज को कुछ प्रयास करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

22 जनवरी 2010

कि अब पत्रकार सेल्स मैन बन कर काम करेगें। जय हो चौथाखंभा की।.....

कि अब पत्रकार सेल्स मैन बन कर काम करेगें।
जय हो चौथाखंभा की।.....
दैनिक अखबार से जुडे़ होने के बाद एक और कड़वा अनुभव जो सामने आया उसे रख
रहा हूं। राष्ट्रीय सहारा अखबार से जुड़े होने की वजह से मुझे भी

तीन जिलों की होने वाली बैठक के लिए आमन्त्रित किया गया। कड़ाके की
ठंढ में हम लोग यहां से नालान्दा जिले के बिहारशरीफ पहूंचे जहां परिसदन
में बैठक का आयोजन किया गया था। करीब पांच घंटे बिलम्ब से अखबार के
संपादक हरीश पाठक जी तथा सहारा इण्डीया के युनिट मैनेजर एम. बाली पहूंचे।
उनका जोरदार स्वागत हुआ। यह सब तो रूटीन बातें थी जिन्हे बताया जाना
जरूरी नहीं था, पर चालिए आगे दिखिए। बैठक प्रारंभ होती है और संपादक जी
कहते है की अखबार के लिए समाचार संकलन हेतू सकारात्मक खबर को महत्व दिया
जाना चाहिए तथा शिक्षा, युवा, खेल, संस्कृति, कला और महिला सहित विविध
विषयों के समाचारों का संकलन होना चाहिए। उनके छोटे से संबोधन में बस
इतना ही रहा। हमारे जिले के एक संवाददाता अर्जुन यादव के आकस्मीक निधन की
बात जब ब्युरो प्रभारी के द्वारा बताया गया तो संपादक के मुंह से निकला-
`` कौन संवाददाता, क्या नाम था, अच्छा अच्छा। अर्जुन यादव अरियरी प्रखण्ड
से संवादप्रेषण का कार्य करते थे तथा समाचार संकलन के लिए घर से निकलने
के क्र्रम में उनका आकस्मीक निधन हो गया था। बहुत दुख हुआ कि संपादक जी
संवाददाताओं को नहीं जानते। संवाददाताओं की ढेर सारी दुर्गतियों में यह
उसका चरम था। इसके बाद बात प्रारंभ हुई व्यापार की और एम. बाली जी ने
सीघा कहा कि अब जो संवाददाता विज्ञापन नहीं देगें उन्हें निकाल बाहर किया
जाएगा। विज्ञापन किसी भी शर्त पर चाहिए। इसके लिए खाका भी दिया कि एक
प्रखण्ड में यदि 10 मुखीया, 10 सरपंच, 10 पंचायत सदस्य और जिला परिषद
सदस्य है तो सभी यदि विज्ञापन नहीं भी देते है तो 50 प्रतिशत देगें और उस
हिसाब से एक जिला से प्रति माह लाखों का विज्ञापन आ सकता है। उन्होंने यह
भी जानकारी दी कि उनके द्वारा यह फण्डा लखनउ में अपनाया गया है और परिणाम
अच्छे आए है। साथ ही संवाददाताओं के लिए एक विज्ञापन का टारगेट भी दिया
गया और जो जिस स्लॉट में रहेेगें उन्हें उस हिसाब से खर्चा दिया जाएगा (
वेतन नहीं सिर्फ खर्चा) यानि कि विज्ञापन दो, तो खर्चा मिलेेगा नही तो
मुफ्त में काम करो। कुल मिलाकर लब्बोलुबाब यह कि अब पत्रकार सेल्स मैन बन
कर काम करेगें। बैठक के बाहर निकले तो नजारा यह था। बैठक में पहूंचे दो
दर्जन से अधिक संवाददाता अपने लिए पहचान पत्र की मांग कर रहे थे और भी
अनेक तरह की समस्याऐं भी थी मसलन अखबार का सकुZलेशन कैसे बढे, समाचारों
का संपादन ठीक से नहीं होना, अखबार के पन्ने की गुणवत्ता बढ़ाना,
संवाददाताओं को मानदेय देना, सकुZलेशन के लिए इस विभाग से जुड़े लोगों का
एक भी दिन क्षेत्र में नहीं आना, और तो और विज्ञापन का कमीशन नहीं मिलना,
जिसे किसी ने नहीं सुनना चाहा। बात बस विज्ञापन देने की और वह भी प्रति
माह। यही मापदण्ड बना पत्रकार का। बाहर निकले के बाद कतरीसराय के एक
महोदय अपने साहसिक कार्य का बखान कर रहे थे कि एक डाकघर में उनकें द्वारा
धोटाला पकड़ा गया जिसके लिए उनहे डाकपाल को हड़काने में काफी मेहनत करनी
पड़ी और तब जाकर डाकपाल में मजह 500 रू0 ही नज़राना दिया। जय हो चौथाखंभा
की।.....
चलिए बात अब विज्ञापन की आती है तो पत्रकारों को विज्ञापन कौन देतें हैं
मुखीया, नेता, पुलिस पदाधिकारी या अन्य, पर क्यों देतें हैं ताकि उनके
द्वारा की जाने वाली गड़बड़ी उजागर नहीं हो सके।
तो आइए जश्न मनाऐं उच्चकों को मनमानी करने देने के लिए हमारे अखबार के
प्रबंधक हमारे साथियों को सह दे रहे है और यह अतिरेक होता जा रहा है पर
चरम कहां होगा पता नहीं...................

21 जनवरी 2010

-गुमनामी की जिन्दगी जी रहे है वनारसी पान के उत्पादक किसान -शेखपुरा जिले के खखरा गांव में होती है पान की खेती

-गुमनामी की जिन्दगी जी रहे है वनारसी पान के उत्पादक किसान
-शेखपुरा जिले के खखरा गांव में होती है पान की खेती
वनारस का पान जितना मशहुर है उतने ही गुमनाम है इसकी खेती करने वाले
किसान। शेखपुरा जिले के खखरा गांव में 10 एकड़ की जमीन में चौरसीया
समुदाय के लोग पान की खेती करते है और पान के पत्ते की परवरिस अपने
बच्चों से अधिक कर इसे वनारस की पान मण्डी तक पहूंचा कर लौट आते है
गुमनामी जिन्दगी जीने के लिए। जिला मुख्यालय से 30 किलोमिटर दूर खखरा
गांव बुनीयादी सुविधाओं से वंचित है पर यहां के किसान पान की खेती कर इसे
वनारस की मण्डी तक पहूचातें है। पान की खेती करने वाले चौरसीय समुदाय के
लोगों के लिए पान की खेती उनकी पुश्तैनी धरोहर है और आज के वर्तमान युग
मे जहां महंंगाई की मार झेलना लोगों की विवशता है वहीं चौरसीया जाति के
किसान महज 12रू0 प्रति सैकड़ा पान का पत्ता बेच देते है। पान की खेती
करने के लिए पहले इस समुदाय के लोगों को ग्रामीणों से खेती के लिए जमीन
को पटटे पर लेना पड़ता है जिसमी किमत दिल्ली के जमीन के बराबर होती है ये
किसान खेती वालों को प्रति क्यारी 50 रू0 देते है। कई किसान मिल कर पान
की खेती के लिए एक बाड बना लेते है तथा उसे चारों ओर से फुस के द्वारा
धेर दिया जाता है। पान की फसल को धूप, बारिस और ठंढ से बचाना पड़ता
है।पानी की फसल बाड से बाहर नहीं निकल जाए इसके लिए भी किसानों को भारी
मेहनत करनी पड़ती है। प्रांरभ से इसकी देखभाल के लिए लगातार परिश्रम करना
पड़ता है। पान की खेती के लिए इन किसानों को बैंकों के द्वारा किसी
प्रकार का ऋण नहीं दिया जाता है जिसकी वजह से ये लोग साहुकारों के यहां
से पान की खेती के लिए कर्ज लेते है और जब फसल अच्छी नहीं होती तो कर्ज
चुकाने के लिए धर तक बेचना पड़ता है। अपनी दुर्दशा बताते हुए नवीन
चौरसीया ने कहा ि कवे अपने बच्चे की परवरिश भी ठीक से नहीं कर पाते है पर
पान के पत्ते की परवरिश पर हाड़तोड़ परिश्रम करना पड़ता है। नवीन चौरसीया
ने बताया कि इतनी मेहनत के बाद भी उन्हें पान की अच्छी किमत नहीं मिलती
है और इसके लिए किसानों को पान के पत्तों को सजा कर नवादा बेचने के लिए
ले जाना पड़ता है जहां लोग इसे मगही पान के रूप में जानते है और यदि पान
की फसल अच्छी हुई तो किसान इसे वनारस पहूंचते है जहां इसे वनारसी पान के
नाम से जाना जाता है। बहरहाल पान के पत्ते की लाली लोगों के जीवन में रंग
तो धोलता ही है पर इसके उत्पादकों की गुमनाम जिन्दगी अब भी बदरंग है।

वरदे वीणा वादणि वरदे के साथ सरस्वती पूजा संपन्न

वरदे वीणा वादणि वरदे के साथ सरस्वती पूजा संपन्न
विद्या की देवी सरस्वती की आराधना का पर्व वसन्त पंचमी हषोZल्लास के साथ
संपन्न हो गया। वरदे वीणा वादणि वरदे के स्वर संगीत से गुंजायमान वसन्त
पर्व पर बच्चों में खासा उत्साह देखा गया तथा इस अवसर पर विभिन्न
विद्यालयों एवं संस्थानों के द्वारा मां शारदे की प्रतिमा स्थापित कर
पूजा-अर्चना की गई। सुबह में जहां कड़ाके की ठंढ और शीतलहर से लोग अपने
घरों से नहीं निकल रहे थे वहीं बच्चों का उत्साह रात भर पूजा पण्डालों को
सजाने में देखा गया। सरस्वती उपासना के इस महापर्व को लेकर विकास
विद्यालय, डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल, आर्दश विद्या भारती, कन्या मध्य
विद्यालय, दिनकर नगर पूजा समिति, सरस्वती विद्या मन्दिर सहित अन्य
शैक्षणिक संस्थानों के द्वारा पूजा-आराधन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न
घरों में भी सरस्वती मां की प्रतिमा स्थापित कर पूजा आराधना की गई।

समय एक सांप है

मैं समय हुं
लोगों ने मेरी तुलना
सांप से कर दी
वस्तुत:
ठीक ही किया
क्योकि
मेरे पास भी है कई विर्षले दान्त
मेरी विषग्रन्थी में भी भरा रहता है
`सांघातिक विष´
मैं भी डंस सकता हूं
पलटकर
मैं भी उतारता हूं अपनी केचुली
परन्तु
कोई मेरे फण को कुचल नहीं सकता
और
मैं डंस सकता हूं
सांप को भी।

क्या हम आत्महत्या कर लें।......

गोपाल जी से झमा के साथ—
क्या हम आत्महत्या कर लें।
मेरी मंशा किसी को ठेंस पहूंचाने की नहीं थी और न ही मैं हिंसा का समर्थक
हूं पर गोपाल जी के ब्लॉग  http://gap-shapkakona.blogspot.com/ 
  को पढ़ने के बाद अनायास ही जो लिखना प्रारंभ
किया वह रूका ही नहीं और इसलिए ही लिखता चला गया। मैं गोपाल जी से क्षमा
प्रार्थी हूं। मैं वह नहीं कि अपनी को आदशवादी कहलाने लिए माक्र्स को
जानने का दबा करू और वामपन्थी कहलाने का दंभ रखूं पर जो मेरी समझ है वही
मेरा ब्लॉग है, मैं तो बस यह कहना चाहता हूं कि किसी भी समस्या को समझकर
कर ही उसका समाधान किया जा सकता है और बिना समाधान के कोई समाज आगे जा भी
नहीं सकता। नक्सलवाद एक समस्या है जिसके लिए दोषी कोई तो होगा। मूल में
अपना समाज है और सरकार भी पर सबसे मूल समाज जो नक्सलवाद को समझना ही नहीं
चाहता। नक्सलवाद जिस समस्या का नाम है हां वह हिंसा फैलाता है, रेल पूल
उड़ने सहित नृसंस हत्या भी करता है और इसका कोई सभ्य समाज समर्थन नहीं कर
सकता तब इससे क्या होगा अगर हमारा शरीर बीमार होगा तो कहीं न कहीं तो वह
प्रकट होगा ही जो की किसी को अच्छा नहीं लगता तब क्या हम बीमारी को ठीक
करने के लिए आत्महत्या कर लें।.........

20 जनवरी 2010

और सो गया तिरंगा झण्डा को बांधने वाला.........

और सो गया तिरंगा झण्डा को बांधने वाला.........

और गणतन्त्रता दिवस तथा स्वतन्त्रता दिवस पर फहराये जाने वाले तिरंगा
झण्डा की रस्सी बांधने वाले इन्दो राम का निधन हो गया, वह भी ठंढ से।
इन्दो राम को वे सभी लोग जानते है जो इन दिवसों पर होने वाले समारोह में
भाग लेने के लिए प्रखण्ड कार्यालय अथवा थाना परिसर में आते होगे। इन्दो
राम एक आम कांग्रेसी कार्यकत्र्ता थे तथा सरकारी परिसरों में झण्डोतोलन
को लेकर उनका उत्साह देखते बनता था। सिर पर गांधी टापी, धोती-कुर्ता और
गमछी रखे इन्दो राम समय से पूर्व ही सभी जगहों पर पहूंच कर तिरंगे को
सजाने में जुट जाते। तिरंगा झण्डा की रस्सी बांधना तथा उसे फहराने में
पदाधिकारियों की मदद करना इन्दो राम का शगल था और आज वे चले गए ठीक 26
जनवरी से पहले। पर एक भी अधिकारी को उनकी याद नहीं होगी। इन्दो राम अपने
पेट पालने के लिए पान की दुकान चलाते थे पर देश को लेकर जज्बा जो उनमें
था उसकी वानगी देखने को नहीं मिलती। आज उनके निधन पर शोक प्रकट करने के
लिए कांग्रेस के प्रखण्ड अध्यक्ष सुरेश सिंह नहीं आ सके उनके पास समय
नहीं होगा क्योंकि वे एक आम कार्यकत्र्ता थे। वहीं पर एक कांग्रेसी
कार्यकत्र्ता कह रहे थे कि सदस्यता अभिययान के क्रम में एक दिन पहले ही
प्रखण्ड अध्यक्ष के द्वारा कहा जा रहा था कि अहो ऐकरो सदसबा बना दहीं
झण्डवा इहे ने बनहो हौ।
इन्दो राम को जानने वाले जानते है कि जब झण्डोतोलन होता था तो परंपरा के
अनुसार गांधी जी की जय और जवाहरलाल नेहरू की जय करके जब लोग खामोश होते
थे तो इन्दो राम भीम राव अंबेदकर की जय, लोहीया की जय और अन्त में
स्वतन्त्रता सेनानी तथा शिक्षाविद लाला बाबू की जय का नारा लगाते थे
जिसपर कई लोग नाक मुंह शिकोर लेते थे। आज वही इन्दो राम ठंढ से मर गये।
वहीं उनके परिजनों को कबीर अन्तेष्ठी योजना का लाभ लेने के लिए लगातार
वार्ड पार्षद को फोन किया जा रहा था। आज वहीं इन्दो राम 26 जनवारी से महज
छ: दिन पहले ही सो गए और ये अल्फाज उनके नाम `` यूं सो गए तुम गुमनाम
जिन्दगी की तरह, अब लोग तेरे जज्बे को भी भूल जाएगे। कहां तो लोग तिनके
को फरीस्ता बना देते है, तुम तो आदमी थे, आदमी की तरह चल दिये।

गोपाल कुमार झा की ब्लॉग आइये करें गपशप पढ़ने के बाद माओवाद पर टिप्पणी उर्फ आइये आप भी नक्सलियों को गली दें...........

गोपाल कुमार झा की ब्लॉग आइये करें गपशप पढ़ने के बाद माओवाद पर टिप्पणी
उर्फ
आइये आप भी नक्सलियों को गली दें...........
आदरणीय गोपाल जी
चलिए अच्छा हुआ आप माओ को नहीं जानते,`या फिर जानन नहीं चाहते´ जानते
होते तो आज माओवादियों को भी जानते। माओवाद इतिहास नहीं यह आपका वर्तमान
है। पर आंख की रौशनी कम हो और उसपर पूंजीवाद का चश्मा हो तो दिखेगा भी
वही, इसलिए इसमें आपका कोई दोष नहीं। आपको राजधानी को बंगाल में रोका
जाना दिखता है और मैं देखता हूं कि राजधानी को हथियारबन्द नक्सलियों के
द्वारा रोके जाने के बाद भी किसी यात्री के साथ बदतमीजी तक नहीं करना, वह
भी उस राजधानी रेलगाड़ी में जिसमें समाज का वह वर्ग यात्रा करता है जिसकी
एक यात्रा खर्च कथित नक्सलबादियों का पूरा परिवार एक माह पलता है। आपको
पुलिस वालों को मारा जाना दिखता है पर मैं जो देखता हूं वह है पुलिस का
अत्याचार। रोज रोज पुलिस थाने में आम गरीब आदमी को थाने में उठा कर लाया
जाता है और कानून को ताक पर रख डण्डे की जोर से हजारों नज़राना वसुला
जाता है। मुझे याद कि कुछ साल पूर्व मैं रेल यात्रा के क्रम में पटना से
लौट रहा था तभी कुछ लोग रेलगाड़ी पर अखबार में नक्सलियों के द्वारा
पुलिस कि की गई हत्या की खबर पढ़ रहे थे और उनके मुंह से निकल रहा था
ठीक ही हुआ कोई तो है जो उनको भी सजा दे सकता है। आपको नक्सलवादियों के
द्वारा लोगों को मारा जाना दिखता है और मैं जो देखता हूं वह है गरीबों पर
दबंगों को अत्याचार का। मैंने अभी हाल ही समाचार संकलन के क्रम में
पहाड़ों में काम करने वाले मजदूर का रिर्पोट अपने चैनल के लिए बना रहा था
और उसी क्रम में एक मजदूर चन्द्रश्वर मांझी ने एक गीत गाया जो यहां रख
रहा हूं भले ही महानगरों बैठे लोग मेरे इस विचार से सहमत नहीं होगों और
आदमी की हत्या को जायज नही ठहरायेगे और मैं भी इसे जायज नहीं ठहराता पर
जब किसी की पेट की रोटी कोई छीन ले, जब कोई कंकीट के उंचे महल मेें रहे,
जब किसी के बहन-बेटी की आबरू लूट ले, और जब कोई किसी के मुंह में मजदूरी
मांगने पर मूत दे तो कोई क्या करेगा। हां यह बात भी सच है कि आज माओवाद
के नाम पर देश को तोड़ने वाली शिक्यां भी काम कर रही है पर परमाणु के
अविष्कार का भी नाकारात्कम पहलू है। ओर फिर आज लोग नक्सलवाद को बीमारी
मान रहें है। उन सज्जनों को मैं बता दूं कि नक्सलवाद बिमारी नहीं है
बल्कि बीमार समाज का धोतक है और हम सभी बिमारी के ईलाज के बजाया बीमार को
ही मारने की बात करते है।
यह रही मांझी की कविता........................
साबुन सेंट बहार सिनेमा, खुश्बू इतर गुलाब की, बिछल फरस पर होवे मुजरा,
देखे मालीक टहल टहल, महल करे है चहल पहल, झोपरिया है सुनशान पड़ल,
झोपरिया में धरल डीबरिया तेल के बन्दोवस्त नहीं, महल झरोखे बरे बिजरूया,
झोपरिया है अंधार परल।

और भी कुछ था जो मुझे याद नहीं पर अन्त में था

न मरव हम बिना रोटी और न मरव हम भूख से
मरना है तो मरजायेगें सरकारी बन्दूक से........................
उस देश की बारे में सोचे जहां देश की पूंजी का 25 प्रतिशत 100 लोगों के
हाथ में है। उस देश के बारे में सोचे जहां देश की 45 प्रतिशत आबादी की
मासीक आय 450 रू0 है।............
लाल सलाम

19 जनवरी 2010

सरस्वती पूजा का चन्दा बसुलने में ट्रक चालक की आंख फोड़ी

सरस्वती पूजा का चन्दा बसुलने में ट्रक चालक की आंख फोड़ी।

बरबीघा थाना क्षेत्र के अहियापुर गांव में एक ट्रक चालक की आंख फुट गई।
घटना उस समय घटी जब मनोज कुमार चालक कोयला उतार कर लौट रहा था। चालक मनोज
कुमार नालन्दा जिले का रहने वाला है। घटना सरस्वती पूजा के नाम पर चन्दा
वसूल करने वाले लड़कों कें द्वारा अंजाम दिया गया। घटना के बाद चालक वहीं
घटना स्थल पर बेहोश हो गया जिसे बाद ग्रामीणों के सहयोग से बरबीघा भेजा
गया जहां उसका ईलाज एक निजी चिकित्सालय में किया गया। घटना के सम्बंध में
होश में आने पर चालक मनोज कुमार ने बताया कि कुछ लड़को ने हाथ से ईशारा
कर गाड़ी रोकने के लिए कहा जब गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ गई तो कुछ दूरी पर
दुसरी जगह खड़ा लड़कों ने पत्थर चला दिया जो कि शिशा तोड़ते हुए सिधा
उनके आंख में आ कर लगी। इस घटना की प्राथमिकी दर्ज करा दी गई जिसमें
अज्ञात लोगों को नामजद किया गया है। ट्रक नावादा जिले कें कतरीसराय थाना
क्षेत्र के सैदी निवासी भुषण सिंह का बताया जाता है।

शिखर

शिखर..........................काव्य धारा
शिखर पर पहुंचना बहुत मुिश्कल है।
साहस
धैर्य
निरन्तर प्रयास
और जुनून हो
तो हर कोई पहुंच सकता है..

मुिश्कल है शिखर पर टिक पाना!
अहं
घृणा
विवेक शून्यता की पराकष्ठा से
गिर पड़ता है
शिखर पर पहुंचा हुआ
``आदमी´´

और  टूट का बिखर जाता है। टू   

18 जनवरी 2010

मिडिया बिकाउ है सवाल यह है कि जबाब क्या है उर्फ ``रगों में बहते हुए के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´

मिडिया बिकाउ है.
सवाल यह है कि जबाब क्या है?
उर्फ
``रगों में बहते हुए के हम नहीं कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´
इस बिके हुए मिडिया को मैने करीब से देखा है और यह कह सकता हूं कि आज
मिडिया सरकार और पूजिंपतियों की चारणी कर रही है तथा उनका ही मुख्य पत्र
और भोंपू बन कर समाचार प्रकाशित हो रहे है। सवाल यह और छुपा हुआ नहीं है,
पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका जबाब क्या है। श्रमजीवी कहलाने वालों को
तो जानता हूं एक कप चाय और दो समोसे उनकी कीमत है। सुबह की शुरूआत थाने
की चाय-नास्ते से होती है और दोपहर समाहरणालय में किसी बाबू की दाबत उड़ा
रहे होते हैं और रात नेताजी की मस्त पार्टी का मजा भी उनका अपना ही होता
है और अन्तत: उनका भोंपू बन कर अखबारों का पन्ना गन्दा कर देते है या
टीवी पर समाचारों का बलात्कार करते है। इतना ही नहीं अब तो अपने मित्रोें
को देख रहूं पदाधिकारियों से पार्टी मांगते है और वहां जम कर शराब की
वैतरणी मे डुबकी लगाते हुए पापों का प्रािश्चत करते है। हमारे इलेक्टोनिक
मिडिया के बंधू को तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता वे तो बन्दर बन कर नाच
जमूरे नाच पर करतब दिखा रहे है। समाचार संकलन करने वाले हमारे बंधू सुबह
से ही समाचारों को बेचने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते है कि आज बोहनी
अच्छी हो। और उनके कैमरे में कैद विजुअल तभी चैनलोंे को जाता है जब उसका
सौदा नहीं पटता और चैनलों का प्रबंधकों की हालत तो सभी जानतें है। ये
मदारी है और वहां है कुछ अतिविशिष्ट बन्दर जो नाचना नहीं चाहते हों पर एक
से डेढ़ लाख की पगार उन्हें भी नाचने पर मजबूर कर देते है। सवाल यह भी है
कि क्या आज जो मिडिया में पूजीं लगा रहे है वह 200 करोड़ से 2000 करोड़
तक की होती है तब कोई समाज सेवा करना उनका मकसद नहीं होता है और जब मकसद
साफ है तो फिर हम या तो उस मकसद को पूरा करने का माध्यम बने या फिर अलग
हो जाए। यदि मकसद को पूरा करने का माध्यम बना तो कौरवों का सौनिक
कहलाऐगें और अलग हुए तो भगोड़ा। तब शेष कृष्ण की सेना में जो लोग शामील
होने की मंसा पाले हुए है उन्हें वह कहीं दिखता ही नहीं।
इसी विवशता पर राष्टकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है-समर शेष है नहीं
पाप का भागी केवल ब्याध, जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध।
सवाल यही है कि जबाब क्या है
अन्त में गालिब ने ठीक ही कहा है कि ``रगों में बहते हुए के हम नहीं
कायल, जब आंख से ही न टपका तो लहू क्या है।´´

वर्तमान समर के सदंर्भ में

समर भूमि में
सत्य की पराकाष्ठा
कर्ण की परिणति की पुर्नावृति होगी।

और
असत्य की पराकाष्ठा
बनाएगा `दुर्योधन´-
कालखण्डों का खलनायक।

शेष
कृष्ण की तरह
सत्य से प्रतिवद्ध
असत्य से स्पृह
अस्पृह
किसी के भगवान होने की अभिप्सा से
छल और छला कर भी जो सत्य-विजय का संधान किया।

कर्ण भले कहलाया महायोद्धा
दानवीर
पर समर में वह पराजित कहलाया।

अर्जुन का गाण्डीव जो रूकता
सत्य का पराभव नहीं होता?
कर्ण
प्रलम्भन से खेत न जाता
तो असत्य को कौन हराता?
अस्वथामां और गुरू द्रोण
दुर्याेधन और पितामह भीष्म
के साथ अगर प्रवंचन न होता
तो परिकल्पित होता
``पृथक महाभारत´´।

17 जनवरी 2010

आप भी बधाई दें ! एक चीनी कंपनी को 260 करोड़ का मुनाफा, बधाई हो मन्त्री जी !

आप भी बधाई दें !
एक चीनी कंपनी को 260 करोड़ का मुनाफा, बधाई हो मन्त्री जी !
चीनी कंपनी श्री रेणुका शूगर्स को 260 करोड़ का मुनाफा हुआ। यह समाचार सुबह सुबह नेट पर पढ़ने को मिला, पढ़ कर बहुत दुख हुआ। दुख इस बात का कि जब चीनी कंपनियों के मुनाफे के लिए खुद सरकार के मन्त्री शरद पवार ने इतनी जोर लगा दी है कि ढीठाई से कहते है कि चीनी की कीमत नहीं कमेगी, तब मुनाफा मजह 24 प्रतिशत ही क्यों रही। भाई सरकार जब अपनी हो तो बात ही क्या और फिर हम सरकार को बनाते ही इस लिए है कि वे मुझे कमाने का मौका दें। आखिर इस लिए तो करोड़ों चन्दा देते है। इसी बात से आज इस समाचार को पढ़ कर बहुत बहुत दुख हुआ। फिर सोंचा कि यह मुनाफ तो ऑफ द रिकार्ड है और इसमें सरकार को दिया गया कमिशन और मन्त्री जी का हिस्सा तो शामील नहीं होगा, तब शकून हुआ। आखिर आम आदमी के आंसू से कमाए गए इस 260 करोड़ के मुनाफे में मन्त्री जी का हिस्सा नहीं हो तो यह तो बड़ी नाइंसाफी होगी। आखिर इसके लिए मन्त्री जी को कितने जगह जबाब देना पड़ा है और जनता से वोट लेने के लिए तिकड़म भी उन्हीं को करना है। आखिर जनता ऐसे ही वोट तो नहीं दे देती। यह क्या कम आसान काम है कि मन्त्री जी राज्य सरकार को राज्य सरकार केन्द्र सरकार को चीनी कड़वी होनी का कारण बनाती रहती है और जय हो जनता जर्नादन, यह तो बेचारी गाय है, तुरन्त समझ जाती है। और फिर यह तो महज एक कंपनी का मुनाफा है बाकि कितनी कंपनियों ने कितना कमाया इसे कौन बताएगा। धन्य हो मन्त्री जी, गजब के करिश्माई। मीठी चीनी को भी कड़वी कर दी।
तो आइए मन्त्री जी को इस करिश्मा के लिए हम सभी उन्हे बधाई दें। बधाई हो मन्त्री जी...............................

16 जनवरी 2010

गुनहगार-गजल

गुनहगार-गजल

यह दुनिया क्या, इसके सितम क्या।
जितने दुनियादार होगे, उतने सितम का एहसास होगा।

पल भर में जहां बात बदल जाती है,
ऐसी दुनिया में, है कौन सितमगर किसे याद होगा।

वह जिसने कहा था जान देगें तेरे खातीर,
कब सोंचा था, वही मेरी जां का तलबगार होगा।

बात गुनाहों की कभी अब न करो,
आइने में अपना ही चेहरा शर्मशार होगा।

आसमां की बुलंदी पर जब देखा सबने,
किसने सोंचा था बिना पंख के परवाज होगा।

12 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर पुलिस की बसूली बंद हो।

गणतंत्र दिवस पर पुलिस की बसूली बंद हो।
अरूण साथी, शेखपुरा, बिहार

बहुत दुख होता है जब बीच सड़क पर बाहनों को रोक या फिर बड़े व्यापारियों
को थाने में बुला कर पुलिस उनसे बड़ी ढीठाई से गणतंत्र दिवस के नाम पर
तिरंगा फहराने के लिए रूपये मांगती है। बिल्कुल फिल्मी अंदाज में यह
बसुली होती है। पुलिस की गाड़ी सड़क पर खड़ी होती है और उसमें रहते है
पुलिस के अधिकारी तथा उनका मातहत, वाहन चालकों से गणतंत्र दिवस के अवसर
पर समारोह आयोजित करने के लिए रूपये वसूल करती है। यह बसूली करीब एक
सप्ताह तक चलती है और किसी के द्वारा इसके उपर चूं चपड़ नहीं किया जाता
है। होता क्या है, `जन गण मन अधिनायक जय है भारत भाग्य विधाता´ गा कर
तिरंगे को सलामी देते है और फिर समारोह में आमंत्रित दबंगों, बाहूबलियों,
उच्चकों को सासम्मान मिठाई बांटी जाती है। पुलिस यू ंतो बसुली के लिए ही
जानी जाती है और एफआईआर से लेकर जांच तक में पुलिस धमका कर रूपये बसुलती
है। यहां तक कि जो हमारे यहां चलन है उसके हिसाब से यदि आप पीड़ित है तोे
आपको एफआईआर दर्ज कराने के लिए नजराना देना पड़ता है पर साथ ही यहां
दूसरे पक्ष को भी खबर भेजवाई जाती है की वह भी आकर एक मुकदमा कर दे ताकि
बाद में समझौता कराया जा सके और उससे भी मोटी रकम बसूला जाता है। अवैध
गेसिंग के अडडे, चुलौआ जहरीले दारू की भठिठयों तथा अपराधियों से बसुली की
तो पुरी सूची ही थाने में रहती है और कौन कितना देगा यह भी पता रहता है,
और हो भी क्यों नहीं प्रमुख थाने में आने के लिए एक लाख से उपर तक की
बोली लगती है और जो यह देते है उनको पुलिस कप्तान के द्वारा थानाध्यक्ष
बनाया जाता है उस पर भी गाहे बेगाहे फरामाईसों को भी पूरा करना आवश्यक
है।
खैर! यह सब तो पुलिस और पब्लिक के बीच में एक अलिखित संविधान की
स्वीकार्याता का रूप ले चूका है पर गणतंत्र दिवस के नाम पर पुलिस की
बसूली बहूत ज्यादा तकलीफ देती है! तकलीफदायक तो पुलिस का हरएक काम ही
होता है और कभीकभी सोंचता हूं कि अंग्रेजों के खिलाफ लोग कैसे लड़े होगें
जबकि आज कथित लोकतंत्र में पुलिस का इतना खौफ है कि कोई कुछ नहीं कहता।
क्या उच्चाधिकारियों, सरकार के मुखीया अथवा अन्य आवाज उठाने वालों को यह
नहीं मालूूूूम!
जो भी हो, पर गांधी जी, भगत सिंह और बोस को याद करने वाले इस महापर्व को
तो कम से कम स्वच्छ रखें !
जय हिन्द।

11 जनवरी 2010

चलो तो सही

चलो तो सही

कहीं जाना है तुम्हें
रास्ते नहीं मिलते,
तो क्या
चलो तो सही चलना ही रास्ता है।
एक एक कदम
मंजील की ओर
सिर्फ तुम्हीं नहीं चलते
मंजील भी चलती है तुुम्हारी ओर।
चलो तो सही
चलना ही रास्ता है।

09 जनवरी 2010

सौ किलोमिटर लंबी सड़क पर पलती जिंदगी, हजारों मजदूरों का आसरा बना शेखपुरा का पहाड़

सौ किलोमिटर लंबी सड़क पर पलती जिंदगी
हजारों मजदूरों का आसरा बना शेखपुरा का पहाड़
शेखपुरा, बिहार
अरूण साथी
साबुन सेंट बहार सिनेमा, खुश्बू इतर गुलाब की, बिछल फरस पर होवे मुजरा,
देखे मालीक टहल टहल, महल करे है चहल पहल, झोपरिया है सुनशान पड़ल,
झोपरिया में धरल डीबरिया तेल के बंदोवस्त नहीं, महल झरोखे बरे बिजरूया,
झोपरिया है अंधार परल। सर्वा गांव निवासी चंदेश्वर मांझी अपनी बदहाली और
लाचारी अपनी इस कविता के माध्यम से जाहिर करते हुए कहते है कि हमनी सब तो
भोरे चारे बजे उठ कर आवो हियै और ट्रक के सहारे सड़के पर अपन बाल-बच्चा
के जिन्दगी पालो हियै। यह कहानी है शेखपुरा के पहाड़ पर पत्थर लादने का
काम करने वाले मजदूरों की। ये मजदूर अहले सुबह जब लोग अपनी रजाई से
निकलते भी नहीं भुंजा या बासी रोटी लेकर सड़क पर आ जातें हैं और ट्रक का
इंतजार सड़क पर करते रहतें हैं। ट्रकों के सहारे हजारों की जिंदगी यहां
पलती है पर इसके लिए मजदूरों का घर सड़क ही होता है। मजदूर यहां पर
नास्ता करते है तथा भोजन भी यहीं होती है। यहां तक की कभी कभी शाम का
नास्ता भी मजदूरों को यहीं करना पड़ता है। मजदूरों का जत्था काम की आश
में सड़क के किनारे पटना जिले के वख्तयारपुर से लेकर नालान्दा जिले की
सड़क से होते हुए शेखपुरा की सड़कोें पर बैठा रहता है। उधर मोकामा से
सरमेरा हो कर आने वाली सड़क पर भी मजदूरों का जत्था काम की आश में ट्रकों
को रूकवाते नजर आतें हैं। लखीसराय जिले से शेखपुरा आने वाली सड़क मार्ग
पर भी जगह जगह मजदूरों का जत्था बैठा नजर आ जाएगा। शेखपुरा के पहाड़ के
सहारे अपने परिवार की परवरिश करने वाले मजदूर नरेगा अथवा रोजगार गारंटी
योजना के बारे में महज इतना जानतें है कि उनका कभी जॉब कार्ड बना था और
डाकघर में खाता भी खुला पर न तो जॉब कार्ड और न ही पास बुक उन्हें दिया
गया है। अपनी व्यथा बताते हुए सर्वा गांव निवासी रामविलास यादव, युगेश्वर
मांझी, महेश ठाकुर, साधु यादव तथा फुटू यादव कहतें है कि उन लोगों की
प्रति दिन की आमदनी 150 रू0 हो जाती है पर इसके लिए अपनी जान को जोखिम
में डाल कर ट्रकों को रूकवाना पड़ता है उस पर भी प्रति दिन काम नहीं
मिलता है और कई दिन सुबह से शाम तक टकटकी लगाने के बाद रात में बैरंग
वापस घर लौटना पड़ता है। इन मजदूरों कें लिए ट्रक पर पत्थर और गिटटी
लादना भी जान को जोखिम में डालने के समान है और कितनी बार खदान धंसने की
वजह से कुछ मजदूरों की जान चली जाती है। इसी तरह की अपनी व्यथा बताते
हुए मालदह गांव निवासी अरूण रविदास कहते है कि नरेगा के रूपयों पर अभी
दबंगों का कब्जा है और मजदूरों को इससे कोई लाभ नहीं मिलता और मजदूरों को
नरेगा के वनिस्पत पहाड़ में गिटटी लाद कर अच्छी कमाई हो जाती है।
इन मजदूरों कें सहारे भी कई लोग अपना रोजगार भी खड़ा कर चुकें है। इन
मजदूरों को पत्थर लादने के लिए ढोका और पंजा (जिससे गिटटी लादी जाती है)
भाड़े पर दिया जाता है और इसके लिए प्रति जत्था जिसमें चार मजदूर शामिल
होते है 30 रू0 वसुला जाता है।
बहरहाल शेखपुरा पहाड़ के सहारे हजारों जिंदगी पल रही है पर इस काम में
मजदूरों का घर सड़क ही बन गया है।

08 जनवरी 2010

आलू पर अल्लाह-ओम एक साथ, आलू पर अल्लाह-ओम एक साथ (Sheikhpura)

आलू पर अल्लाह-ओम एक साथ
सौहर्द का प्रतिका बना आलू
ईश्वर भी कहतें है हम एक है।
इसे आस्था कहे, अंधविश्वास कहें या कहे ईश्वर का चमत्कार पर यहां कुछ ऐसा
ही नजारा देखने को मिला है। शेखपुरा-जिले के बरबीघा थाना क्षेत्र के
फैजाबाद मोहल्ले में आज एक अदभुत नजारा सामने आया। हुआ यूं कि तैलिक
बालिका उच्च विद्यालय में शिक्षक अनवारूल हक के घर में जब उनकी पत्नी
खाना बनाने के लिए आलू काट रही थी तभी कटे हुए आलू में सड़ा होने का आभास
हुआ और जब वह उसे फेंकने के लिए जा रही थी कि उनकी नजर आलू पर उकरे
अक्षरों पर पड़ा और उसने उसे पढ़ने की कोशिश की तो वह आश्चर्यचकित रह गई।
आलू के कटे हुए भाग पर मोहम्मद और अल्लाह लिखा हुआ था। जब इसकी जानकारी
उसने अपने पति को दी तो उन्हें भी एकवारगी इस बात पर भरोसा नहीं हुआ और
उन्होंने कई अन्य लोगों से इसकी तस्दीक की तो सभी ने इसे पढ़ा तथा यह
अरबी भाषा में लिखे होने की तस्दीक हुई। इस बात की खबर मिलते ही लोेगों
का तांता उनके आवास पर जमा होने लगा और बाद मेें जब आलू के कटे हुए भाग
को फिर कई लोगों ने गैर से देखा तो उस पर उं (ओम) लिखा हुआ था जो थोड़ा
धुंधला था। इस बात की जानकारी के बाद लोगबाग इसे ईश्वर का करिश्मा मान
रहें है। मदरसा में तैनाता अरबी भाषा के तालीम देने वाले मौलबी ने भी
इसकी तस्दीक की तथा इसे अल्लाह का करम बताया। यह बात चाहे आस्था हो या
अंधविश्वास पर आलू पर अल्लाह और ओम एक साथ लिखे होने की बात को जानकर
लोग इसे ईश्वर का करिश्मा ही मान रहें है। इस पूरे मशले पर मेरा अपना कोई
मत नहीं है मैंने जो देखा वह यहां रख रहा हूं।

06 जनवरी 2010

याद किए गये शिक्षाविद लालाबाबू

याद किए गये शिक्षाविद लालाबाबू

बरबीघा, शेखपुरा, बिहार

महान शिक्षाविद्, सांसद एवं स्वतंत्रता सेनानी श्रीकृष्ण मोहन प्यारे
सिंह उर्फ लाला बाबू की 108 जयंती पर शिद्दत के साथ उन्हें याद किया गया।
इस अवसर पर उनके अथक प्रयास से स्थापित एस.के.आर. कॉलेज में समारोह का
आयोजन किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता पूर्व प्राचार्य डा. रामजी सिंह
ने की। इस अवसर पर उन्होने कहा कि लाला बाबू महान शिक्षा प्रेमी और
समाजसेवी थे तथा उनके आचरण को अपना कर देश और समाज में परिवर्तन लाया जा
सकता है। इस अवसर पर पूर्व प्राचार्य डा. नागेश्वर सिंह ने कहा कि लाला
बाबू शिक्षा और समाज सेवा से जुड़े लोगों के लिए प्रेरणाश्रोत है। इस
अवसर पर प्राचार्य डा. गजेन्द्र प्रसाद, प्रो. हरिनारयण गुप्ता, प्रो.
भवेशचन्द्र पाण्डेय सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। इस अवसर पर कॉलेज का
वाषिकोत्सव भी मनाया गया। शिक्षाविद् लाला बाबू को उनकी जयंती पर उनके
पैतृक गांव तेउस स्थित उच्च विद्यालय में भी समारोह पूर्वक याद किया गया।
इस अवसर पर सांसद भोला सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कहा कि
सांसद लाला बाबू ने शिक्षा और समाज सेवा का अलख जगा कर जो मिशाल कायम की
उसे संभाले रखने की महती जिम्मेवारी हम सबों के कंधे पर है। सांसद ने कहा
कि समाज सेवा की जो राह लाला बाबू ने बनाई उसे आज के लोगों ने भुला दिया।
इस अवसर पर सांसद प्रतिनिधि प्रो. रामविलास सिंह, उमेश सिंह, मुरारी सिंह
सहित अन्य लोग मौजूद थे। समारोह की अध्यक्षता विद्यालय प्रबंधकारिणी
सदस्य प्रो. सुधीरमोहन शर्मा ने की।

पत्रकार के घर लाखों का डाका

पत्रकार के घर लाखों का डाका
शेखपुरा, बिहार
नया साल के आगमन का आगज बरबीघा में नए अंदाज में हुआ और चोरों में पुलिस
को खुली चुनौती देते हुए दैनिक जागरण के संवाददाता रामजनम प्रसाद सिंह के
घर चोरी की घटना को अंजाम दिया। इस घटना में दस लाख की संप्पती चोरी होने
का अनुमान लगाया जा रहा है। घटना बीती रात को घटी जब पत्रकार रामजनम
प्रसाद सिंह अपने सभी परिवार के साथ देवघर बाबा भोला के दशन के लिए गए
हुए थे तथा घर में कोई नहीं था। चोरों ने मुख्य दरवाजे का ताला तोड़ घर
में प्रवेश किया तथा उसके बाद सभी कमरे का दरबाजा बारी बारी से तोड़ दिया
एवं गोदरेज का दरबाजा तोड़कर उसमें रखा जेवरात सहित नकदी लूट लिया। घटना
का पता पड़ोसियों को सुबह में तब लगी जब उन्होने घर का दरवाजा खुला पाया।
घटना की जानकारी पुलिस को दी गई उसके बाद पुलिस के द्वारा इसकी छानबीन की
जा रही है तथा चोर को पकड़ने के लिए डॉग स्काउड की मदद ली जाएगी। इसके
लिए पटना से प्रशिक्षित कुत्ता को मंगाया जा रहा है जिसके द्वारा चोरों
को पकड़ने में पुलिस की मदद की जाएगी। चोरी की घटना को अंजाम देनेवाले
चोर की एक गमछी भी घटनास्थल पर पाई गई है जिसके आधार पर चोर को पकड़ने का
काम किया जाएगा। उधर फैजाबाद मोहल्ले में भी एक किराना दुकान का ताला
तोड़ चोरों ने दुकान में रखा सारा सामान चुरा लिया तथा सामाचक मोहल्ले
में भी चोरों ने दुकान का ताला तोड़ चोरी की घटना को अंजाम दिया। हलांकि
इस मामले की छानबीन के लिए डॉग स्काउड मंगाया गया पर उसके द्वारा भी कोई
ठोस पहचान नहीं दी गई।

04 जनवरी 2010

पाती प्रेम की

पाती प्रेम की

तुम्हारे सौंदर्यबोध में मैंने बहुत से शब्द ढूंढे़

अपनी भावनाओं को कोरे कागज पर बारम्बार उकेरा

फिर उसके टुकडे़-टुकड़े किए

हर बार शब्द शर्मा जाते........

फिर इस तरह किया मैंने

अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त

गुलाब की अबोध-नि:शब्द पंखुड़ी को

लिफाफे में बंद कर तुम्हें भेज दिया..........

03 जनवरी 2010

आंखे

मुझे ऐसा क्यूं लगता है
कुछ कहती है तुम्हारी आंखे।

क्यों प्रफुिल्लत होता है अंतर मन
जब मिलती है हमारी आंखे

क्यों अंत: की वेदना
सिमट जाती है
जब सामने होती है तुम्हारी चंचल आंखे

पता नहीं कोई बोत है
शायद प्रेम
जो कर बैठी है हमारी आंखे।।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...