22 मई 2024

माटर साहब के लिए बनडमरु बाबा का मंत्र और उपर उपर पीने वाले

 माटर साहब के लिए बनडमरु बाबा का मंत्र और उपर उपर पीने वाले


(अरुण साथी की व्यंग रचना )

डिस्कलेमर- इसका किसी नेता, अधिकारी, कर्मचारी से कोई संबंध नहीं है। दिल पर हल्का हल्का लें।

आज एक मित्र उस समाचार से दुखी थे जिसमें एक वरीय पत्रकार ने लिखा कि बिहार के सर्वोच्च पदधारी महोदय ने बाबा से अनुरोध किया। अनुरोध शब्द से वे आहत थे। मैंने उनको समझाया। बिहार में जो हो रहा है, उस स्थिति को देखते हुए पत्रकार मित्र ने सही शब्द का प्रयोग किया है।

अब देखिए। गांव देहात में जब कोई सनक जाता है तो उसके लिए, एक ढकनी निकलल है हो, कहा जाता है।अब चूंकी बाबा भी एक ढकनी निकलल है, तो उनके लिए सर्वोच्च बेचारे क्या निर्देश देंगें। जिसको मुंह उपर करके थूकने की आदत हो उसके दूर से ही निकल जाना श्रेस्कर होता है।

अब सोंचिए, बाबा बिहार में सर्वोच्च है की नहीं। पिछला राज दरबार बाबा के नाम कुर्बान रहा। हंंगामा हुआ। जुत्तम, जुत्ती हुआ।

हमारे राजा ने भरी सभा में कहा, "मैं हूं न।"

बाबा बोले, "नहीं। मैं हूं।"

अच्छा, यह बात बिल्कुल झूठ है कि बाबा का हृदय टाटा स्टील से बना है।
कहिए कैसे।
अभी गुरुजी ने समय परिवर्तन की मांग की। सत्ता पक्ष के नेता भी चोंगाधारी को बुला कर खूब गरजे।
यह सब नहीं चलेगा।
बाबा ने सहृदयता दिखाई। समय परिवर्तन किया। पन्द्रह मिनट पहले कर दिया।

बाबा से पूछ ही लिया।

"बाबा, आप एतना बनडमरु काहे है।"

बाबा ने समझाया।

"मैंने बहुत पहले ही सीख लिया है। काम करने वाले मजदूर को शू शू करने का भी मौका नहीं दो। खैनी कैसे खा लेगा। एक दम पाई-पाई बसूल करना है। इ मास्टर सब से भी वही कर रहे। पैसा देते हैं, तो बसूल करेगें ही। पाई-पाई।और यह सब मास्टर के हित में ही है। चार बजे सुबह उठने की आदत इसी बहाने लग जाएगी। सुबह में मार्निंग वाक भी निशुल्क। खाना-बाना क्यों खाना है। एक माह दिन में खाना नहीं खाएगें तो सभी का रोजा हो जाएगा। सेहत सुधर जाएगा। मास्टरों के सेहत का ख्याल करके ही यह सब किया गया। सबको डायबटिज है। सब ठीक होगा। "

पूछा,
"बाबा, पता हैं न जिस संस्था को आपने जांच करने का जिम्मा दिया है। वह संस्था बेरोजगार युवक को बहाल करने में तीन-तीन लाख बसूल रहा। अब वह बेचारा मास्टर सब से बसूल कर रहा। और बेंच से लेकर पोशाक तक, सब उपर से ही दिया जाएगा।"

बाबा बोले,
"इसमें कौन सी नई बात है। नहीं सुना है। उपर उपर पी जाते है, जो पीने वाले होते है। जय बिहार.."

14 मई 2024

क्या नीतीश कुमार उपहास के पत्र है...?

 क्या नीतीश कुमार उपहास के पत्र है...? 


पीएम नरेंद्र मोदी के रोड शो में सीएम नीतीश कुमार की उपस्थिति थी। इसमें सीएम के भाव भंगिमा को लेकर सोशल मीडिया पर उपहास उड़ाया जा रहा। सीएम निश्चित रूप से असहज थे। वे बीमार है, उसी दिन लगा। पिछले कई महीनों से वे बीमार चल रहे है। बीमार कोई, कभी भी हो सकता है। इस पर किसी का वश नहीं। अब सीएम नीतीश कुमार के बीमारी के बहाने कुछ लोग उनका उपहास उड़ा रहे। 


उपहास तो उनके विधान मंडल में स्त्री को लेकर दिए बयान पर भी हुआ। फिर चार हजार पार। फिर कुछ अलग अलग घटनाएं।

जो भी हो। सीएम नीतीश कुमार गंभीर रूप से बीमार है। बीमारी का असर मस्तिष्क पर है। 

अब इस वजह से बिहार को जंगल राज से निकाल कर गढ़ने में उनका, सिर्फ उनका योगदान खारिज तो नहीं हो जा सकता।

लालू के लाल तेजस्वी यादव इस समय बिहार की राजनीति में विपक्ष की एक मात्र धूरी है। ऐसा इसलिए नहीं कि और कोई है ही नहीं। बल्कि, ऐसा इसलिए की कन्हैया कुमार, पप्पू यादव जैसे कितने की राजनीतिक हत्या इसी धूरी को बनाने के लिए की गई।

आज फिर जातिवादी और अपराध के मोहरे बिहार के राजनीतिक शतरंज की बिसात पर चल दिए गए है। हर बार चला जाता रहा। इसमें पिता से एक कदम आगे पुत्र तेजस्वी है। इस बार गठबंधन में तेजस्वी यादव ने केवल और केवल अपने भविष्य को लेकर प्लान के अनुसार काम किया। धन जोड़े। अधिकारी बैठाओ। जातिवादी और धर्म का कार्ड खेलाे। राम चरित्र मानस विवाद, मनुस्मृति जलाना इत्यादि याद होगा। पिता से दस कदम आगे।

नीतीश कुमार ने इसे हमेशा बुद्धिमानी से तोड़कर, बिहार गढ़ा।

बनते और चमकते बिहार में कुछ कृतघ्न लोग इसे खारिज करते है। नीतीश कुमार ने अपराध, रोड, बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य इत्यादि से अलग भी बहुत कुछ किया है। शराबंदी, एक नेक फैसला था। अब नहीं है। 

नीतीश कुमार ने जो किया उसका कुछ उदाहरण दूंगा। 

बिहार के हर जिला में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, पोलिटेकनिक कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, आईटीआई कॉलेज बिहार में खुले। यह अकल्पनीय लगता है। शायद देश का कोई ऐसा राज्य हो। 

बिहार का वह दौर चरवाहा विद्यालय का था। यह दौर नया है। 

अब सत्रह महीने साथ रहकर नौकरी और विकास का दावा करने वाले तेजस्वी यादव केवल झूठ फैला रहे। 

सच यह है कि के के पाठक और अतुल कुमार जैसे अधिकारी को नीतीश कुमार नहीं बैठाते तो क्या होता, सबको पता है। एक नहीं चली। कलबला के रह गए।

अब देखिए। बिहार में पुलिसिंग बदल गई। कल्पना नहीं किए थे कभी।

112, डायल सेवा पुलिसिंग में क्रांति है। सड़क पर मरते आदमी की जान बचाने, आग बुझाने, घरेलू झगड़ा। सब में आपके पास आधा घंटा में पुलिस पहुंच रही। एक दम आधुनिक व्यवस्था।

आज बिहार के थाना भवन, थाना पुलिस की गाड़ी, सब सिनेमा जैसा लगता है। 

आज सरकारी अस्पताल में भले समय पर डॉक्टर नहीं आते। मन से इलाज नहीं करते। पर अस्पताल बदल गया, एक दम से। 

जैसे देखिए। सभी प्रखंड अस्पताल में सभी जांच, प्रसव, एक्सरे और सभी दवाई। सब कुछ है। जिला अस्पताल में डायलिसिस, अल्ट्रासाउंड की सुविधा।


बहुत नजदीक से इस बदलाव को महसूस कीजिए। आज बिहार में कोई सड़क हादसा या अपराध में घायल हो। संपन्न आदमी भी सरकारी एंबुलेंस से सबसे पहले सरकारी अस्पताल जा रहा। पहले निजी क्लीनिक जाते थे। रेफर होकर भी सरकारी एंबुलेंस से मेडिकल कॉलेज जा रहे। वहां भी आधुनिक सुविधाएं है। थोड़ी लचर ही सही।


जल जीवन हरियाली। पर्यावरण के लिए वरदान। तालाब की खुदाई का क्रांतिकारी कदम। खेत सिंचाई के लिए नहर खुदाई। हर खेत पानी।

बहुत कुछ है। कितना लिखे। जो पहले देखा। वही जानता। जो अभी देख रहे उनको भी देखना चाहिए। सड़क, बिजली ही नहीं कॉलेज, पुलिसिंग, खेत, अस्पताल भी नीतीश कुमार ने दिए है। पहले पच्चास हजार घूस देने के लिए चंदा होता था तभी जला हुआ ट्रांसफार्मर पन्द्रह  दिन बाद लगता था । आज चौबीस घंटे में बदलना तय है।

हां, कई राजनीतिक निर्णय, गलत, सही हो सकते है। यह सब राजनीति का हिस्सा है। राजद को पुनर्जीवन देकर पुनः बिहार को पीछे ढकेलने  का   रास्ता बनाने का श्रेय नतीश कुमार को ही है। तब भी, नीतीश कुमार के कामों को खारिज नहीं किया जा सकता। उपहास तो बिल्कुल ही उड़ाया नहीं जा सकता । इतना ही..

05 मई 2024

अथ श्री कौआ कथा

अथ  श्री कौआ कथा

अरुण साथी, व्यंग रचना

आजकल हर किसी का कान कौआ काट कर भाग रहा है । हर कोई कान लेकर भागने वाले कौवे के पीछे भाग रहा है। बचपन में दादा जी के साथ बैठने, सोने का यही फायदा था। वह अक्सर डांटते थे,  

कोय कह देलकौ कि कौआ कान ले के भाग गेलौ त पहले अपन कान देख, कौआ के पाछू मत भाग।

आज तो दादा जी गांव में है। पोता महानगरी। कौन बताएगा। कुछ दादाजी महानगरी हैं। वह भी कौआ के पीछे ही भाग भाग कर सबको बता रहे, कान लेकर भाग गया। 

गांव घर में भले कौआ विलुप्त हो गए। वर्चुअल दुनिया में कौवे ही कौवे हैं। 

कौवे भी कई प्रकार के कान लेकर भाग रहे हैं । कोई मंगलसूत्र तो, कोई लोकतंत्र। कोई संविधान बदल देगा। कोई कौआ धर्म का कान लेकर भाग रहा, कुछ जाति का। कुछ कौवे पाकिस्तानी हैं। 

अच्छा, धर्म का कान लेकर भागने वाले कौवे सर्वाधिक  हैं। कुछ कौवे एक धर्म का कान लेकर भाग रहे, तो उनके पीछे भागने वाले मूढ़ मतान्ध, धर्म खतरे में है, बात सबको भगा रहे। कुछ कौवे दूसरे धर्म का कान लेकर भाग रहे। उसके पीछे भागने वाले मूढ़ मतान्ध बता रहे, इस धर्म वालों से धर्म को खतरा है। 

अब धर्म का कान लेकर भागने वाले कौवे भी भांति भांति के हैं। इनमें कुछ छटे हुए बदमाश । कुछ लंपट। कुछ छौंडीबाज। नाकारा रहने वाले भी धर्म ध्वजा लेकर कौआ बन गए हैं। अब उनका जयकार है। हद तो यह की धर्म का कान लेकर भागने वाले कुछ कौवे बेहद सभ्रांत और अंग्रेजी दां है।

इन कौओं को व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से बाकायदा जाति, धर्म का कान लेकर भागने का प्रशिक्षण दिया जाता है। एक से एक कौआ पढ़ाओ ज्ञानी, ध्यानी प्रोफेसर हैं। 


कुछ कौवे को तो बाकायदा धर्म का कान लेकर भागने के लिए बचपन से ही प्रशिक्षित किया जाता है। धर्म का कान लेकर भागने के लिए ये कौवे अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं।


तुम धर्म का कान लेकर भागो, सब तुम्हारे पीछे भागेंगे। सबसे आगे रहने का यही अचूक मंत्र है। 

अब, कौवे के पीछे भागने वाले गधे हैं कि आदमी, यह एक यक्ष प्रश्न है। 

 अब आज कोई युधिष्ठिर तो आने से रहे। बस।

सभी कौओं से क्षमा याचना सहित, अपना अपना कौआ साथी। 

04 मई 2024

हंस, राजेन्द्र यादव और नरेन्द्र मोदी

हंस, राजेन्द्र यादव और नरेन्द्र मोदी 

उनके लिए (वामपंथी) यह वर्ग भेद मनुस्मृति के वर्ण भेद से ज्यादा सख्त है । मैं सोचता हूं कि कोई नक्सली नेता अगर  हवाई जहाज में सफर कर रहा हो और उसी में अगर आडवाणी और नरेंद्र मोदी बैठे हो तो क्या वह नेता हवाई जहाज से कूद पड़ेंगे



हिंदूवादी गोविंदाचार्य के बहाने सारे कम्युनिज्म विरोधी शाखा मृग उछल कूद करने लगे।

ब्लॉक और फेसबुक की दुनिया इतनी निरंकुश और बेलगाम हो गई है कि वहां कोई भी कुछ भी लिख सकता है। हंस के वार्षिक आयोजन के बाद इसके बारे में ऐसी दूर की कौड़ियां लाई गई कि मैं चकित भी हूं और प्रसन्न भी । इन्हें नियंत्रित करने का क्या कोई उपाय हो सकता है?


उक्त बातें सितंबर 2013 के हंस के संपादकीय में साहित्य जगत के मूर्धन्य हस्ताक्षर और हंस के संपादक राजेंद्र यादव जी ने लिखी थी। संयोग से पुराने अंक पढ़ने की इच्छा हुई तो यही समाने था।


प्रसंग प्रेमचंद जयंती में हंस के पुनर्प्रकाशन के 28वें वर्ष के सालाना संगोष्ठी अभिव्यक्ति और प्रतिबंध विषय पर आयोजित समारोह का है।

उन्होंने अपना दर्द लिखा है ।  प्रखर वामपंथी वरवर राव और अरुंधति राय का समझ में गोविंदाचार्य की वजह से मुख्य समय में नहीं आना रहा।

पप्पू यादव के मंचासीन होने पर उनकी आलोचना का दर्द भी इसमें छलका और प्रसंग में आडवाणी को हिटलर बताने का प्रसंग भी उठा है। देश के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय पटल पर आज भी कुछ इसी तरह का मुद्दा है। लोकतंत्र और संविधान को खतरा। एक दशक बाद भी मोदी  और भाजपा विरोध का अंतत: यही मुद्दा रहता है। मूल मुद्दे गौण कर दिए जाते है। 

29 अप्रैल 2024

जब मैं मर जाऊंगा

 आज समाचार के साथ साथ अपनी भावनाओं को भी लिख दिया। मरना तो यथार्थ है। तब यह भी होगा क्या?



*****
जब मैं मर जाऊंगा
***
सोंच रहा हूं
जब मैं मर जाऊंगा
तो क्या होगा
कुछ लोग आएंगे
दुख जता कर
चले जाएगें
कुछ अपनों की आंखों में
सच के आंसू होंगे
कुछ यह देखने आएगें
कि सच में
मैं मरा, की नहीं
सोंच तो यह भी रहा
कि मेरी लाश के
सिरहाने बैठ कर
पीठ पीछे गाली देने वाले भी
झूठ बोलते हुए
मुझे भला आदमी कहते हुए
कैसे दिखेगें
सोंच तो यह भी रहा
कि मरने के बाद ही
सब के सब भला क्यों
बना दिए जाते
सोंच रहा हूं कि
मरने के बाद
यह सब मैं
देख पाऊंगा या नहीं

20 अप्रैल 2024

#बिहार में कम #मतदान, तथ्य और सत्य

#बिहार में कम #मतदान, तथ्य और सत्य 

बिहार में कम मतदान को लेकर सभी चिंतित है। यह स्वाभाविक भी है। बिहार  के  नवादा  लोकसभा  में  सर्वाधिक  कम  मतदान  हुआ। इसके कई कारण है। इसके तथ्य और सत्य अलग अलग है। एक  बात यह भी है कि  42 डिग्री का प्रचंड गर्मी  में चुनाव था। इस साल कम लगन था। लगन  के  दिन  ही  चुनाव  की  तारीख रख दिया गया। कई घरों में शादी थी तो वे दिन में सोये रहे। कई लोग शादी में शामिल होने बाहर चले गए।
पहले चरण में  प्रचार का कम समय मिला। अंतिम दिन तक टिकट के लिए माेलभाव, तोड़जोड़।  इससे कार्यकर्ता उत्साहहीन हो गए। अब पार्टी प्राइवेट लिमटेड कंपनी की तरह काम करती है। कार्यकर्ता का महत्व कम गया। जीताने वाले को टीकट देती है। वह चाहे अपराधी हो।  दागी हो। वंशवादी हो।  कल तक भ्रष्टाचारी  हो ।  सब  धो पोंछ कर पी जाना है। तब कार्यकर्ता भी उदासीन हो गए। पहले पार्टी कार्यकर्ता वोटर को घर से निकालने में लगे रहते थे, इस बार यह सब कम देखने को मिला। 
एक  कारण पार्टी का गठबंधन रहा। कल तक गाली देने वाले आज गले मिल रहे। तो  उदासीन  होना  स्वाभाविक  है। 

एक कारण चुनाव आयोग के वातानुकूलित अधिकारियों की रही। उनके  द्वारा  आम  जन  की  समस्याओं  का  ध्यान  नहीं  रखा  गया। लगन और गर्मी दो कारक है। चुनाव आयोग ने प्रचार पर कड़ा अंकुश लगाया है। असर  रहा  कि  गांव  और  गलियों में चुनाव का शोर थम गया। इससे हमे सकुन तो मिला, उत्साह कम गया। 
ठोस कारक देखिए। बिहार में पलायन एक सत्य है। वोटर गांव में नहीं है। मांझी जी का वोटर का पूरा गांव और टोला खाली है। दूसरी सभी  जातियों में भी पलायान है। प्रदेश जाकर बिहार में खुशहाली ला रहे। अपने  देह  पर  सितम  उठा  घर,  परिवार  खुशहाल  कर  रहे। गांव में रहने वाले ज्यादातर वोटर वोट देने के लिए गए है। कुछ कथित वीआईपी लोग सोए रहे।

तब जो वोटर हैं ही नहीं वो वोट कैसे करेंगें ।एक  कारण  सरकार  बदलने  का  विकल्प का अभाव भी रहा। तो वोट करने कुछ नहीं  निकले। कुछ को बीएलओ ने मतदाता पर्ची नहीं दिया तो प्रभावित हुआ। पहले पार्टी कार्यकर्ता भी पर्ची देते थे, अब कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर चेहरा चमकाते है। 

इस समीकरण से बिहार में 70 प्रतिशत मतदान हुआ है। 5 प्रतिशत चुनाव आयोग की अदूरदर्शिता से कम हुआ। 5 प्रतिशत प्रचंड गर्मी ने रोका। 5 प्रतिशत उत्साह की कमी। हां, 15 प्रतिशत पलायन से वोट नहीं हुआ।  जो लोग प्रचंड गर्मी की बात करते हैं उनके लिए 85 वर्षीय बुढ़ी माता राबड़ी देवी बानगी है। घाटकुसुंभा टाल में बीच दोपहर। घर से एक किलोमीटर दूर। वोट देकर जा रही है। 

नवादा में राजद का बूथ मैनेजमेंट तगड़ा था। कई बूथ पर सिपाही से लेकर पुलिस पदाधिकारी और पीठासीन तक, कोई न कोई राजद समर्थक मिले। वे अपनी ताकत लगाकर वोट को रोक रहे थे। मुझे बूथ पर नहीं जान देने वाले भी राजद समर्थक पुलिस पदाधिकारी थे और वरीय अधिकारी द्वारा सूचना पर संज्ञान नहीं लिया जाना, चिंता का विषय है।

बाकी सब ठीक है।

(डिस्क्लेमर: राजद को ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए। मतदान प्रतिशत उनके सार्थक गांवों में भी कम ही हुआ है। )

14 अप्रैल 2024

सतुआनी या बिसुआ भारतीय संस्कृति का एक अनोखा पर्व

#बिसुआ #सतुआनी

आज सत्तुआ खाने का पर्व है। हमारा देश भी अदभुत है। सनातन परंपरा और भी अदभुत। वैज्ञानिक समझ। वैज्ञानिक परंपरा।  वैज्ञानिकता को धर्म से जोड़ने वाला देश। धर्म।

सत्तू। एक समय में गांव से गरीबों को गाली दिया जाता था या औकात बताई जाती थी तो कहा जाता था,

 "सतुआ खइते दिन जाहौ आऊ फूटनी करे हे।"

पर देखिए, इसी सत्तू को पर्व से जोड़ गया है। अमीर। गरीब। सबका पर्व।

कहा जाता है की सतुआनी के बाद अन्य पर्व खत्म हो जातें है। ऐसी मान्यता है। 
कहावत है। नागपंचमी पसार, बिसुआ उसार। मतलब नागपंचमी से पर्व शुरू, बिसुआ के बाद खत्म। हालांकि इस साल अभी चैती दुर्गा पूजा और छठ बाकी है।

बिसुआ का एक अपना महत्व भी है। कई जगह सत्तू से पूजा भी होती है। कई जगह सत्तू से साथ जौ भी चढ़ाया जाता है। जौ आज विश्व भर में प्रसिद्ध है। मिलेट में शामिल।

आज जबकि फास्ट फूड या इंस्टेंट फूड का जमाना है, इसके नुकसान सभी बता रहे।

कई तरह के हानिकारक रसायन इनमें दिया जाता है। घटिया तेल। और खतरनाक रसायन अजीनोमोटो। कहते है यह बेहद खतरनाक है। 

खैर। आज गांव गांव चाउमिन, एग रोल, मोमो बिक रहे। भीड़ भी है।

वहीं सत्तू। एक पौष्टिक आहार। शुद्ध। प्रोटीन  युक्त। स्वास्थ्य वर्धक। सुपाच्य। 

हालांकि आज कई लोगों का यूरिक एसिड बढ़ा होता है। वैसे लोगों के लिए प्रोटीन वर्जित है। फिर भी पुरानी परंपरा में सत्तू सिर्फ चने का नहीं होता था। 

मिलौना सत्तू सबसे अधिक उपयोगी माना जाता। कहा जाता था की यह पेट ठंडा रखता है।

और उपयोगकर्ता जानते है कि सत्तू के सेवन से प्यास अधिक लगती है। तो गर्मी में पानी अधिक पीना पड़ता है, जो फायदेमंद है।

सत्तू। सबसे इंस्टेंट फूड है। झटपट तैयार। कई तरह से उपयोग। घोर कर पीना। सान कर खाना। नमक। चीनी। मीठ्ठा। सब से साथ। 

बुजुर्ग लोग खेत में गमछी पर ही सत्तू सान कर खा लेते थे। 

आज सत्तू का चलन बढ़ा है। कई नवाचार कंपनी भी है। मतलब यह की भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का जुड़ाव यहां भी प्राकृतिक से है। प्रकृति की पूजा से है। 

खैर, आज शुद्ध चने का सत्तू। शुद्ध देशी गाय का घर का घी। भूरा। सान के खा लिए। एक अलग स्वाद। किसी भी मिठाई से स्वादिष्ट।

01 अप्रैल 2024

बदलते गांव की कहानी

#गांव #खेत #खलिहान

खेती किसानी में एक बड़ा बदलाव देख रहा। अब दलहन, तेलहन की खेती नगण्य है। सिर्फ गेहूं की खेती। एक बदलाव यह भी की अब उपज तीन गुणा बढ़ा है। पहले एक मन प्रति कट्ठा बेहतर उपज माना जाता था। आज धान, गेहूं तीन मन प्रति कट्ठा तक उपज है। 
पहले रबि की खेती में सरसो, तीसी सामान्य तौर पर किया जाता। आज सब खत्म। तीसी तो विलुप्त। जबकि आज तीसी की उपयोगिता औषधीय है। मधुमेह में रामबाण माना जाता।

इसी तरह खेसारी की खेती बंद। चना, मसूर, अरहर बहुत कम। 
इधर, टीवी पर एक कीटनाशक का विज्ञापन देखा। कहा गया, मोथा को जड़ से खत्म कर देता। फिर याद आया, मोथा अब मेरे यहां विलुप्त है। पहले खूब होता था। गेहूं के खेत में। दादी का नुस्खा था। मोथा का जड़ (कंद) को खाने से खांसी ठीक हो जाती है। खूब उपयोग किया था। अब विलुप्त। कितना कुछ बदल गया। अब गेहूं के खेत में अमेरिका से आया जहरीला अमेरिकन घास प्रचुर है। इसके संपर्क से ही दमा होता है। खेत को बंजर बनाता है।

खेत में बिजली का पहुंचना सुखद है। मेरे इलाके में बिजली न हो तो धान की खेती अब असंभव है। इसका एक दुखद पहलू यह की बिजली का सस्ता तार (एल्यूमिनियम पर प्लास्टिक कवर) किसान बोरिंग में ले जाते है। लगभग नंगा होता है। उससे हर साल किसानों की जान चली जाती है। खेत में टहलना अब जानलेवा है। दोष बिजली विभाग पर आता है। धीरे धीरे बहुत कुछ बदलता देख रहा...जाने और क्या बदले...

24 मार्च 2024

भोगा हुआ दर्द और टॉपर बेटी की छलकी आंखें

यह तस्वीर बेटी की है। वह अपने माता पिता को माला पहनाई। क्यों, पढ़िए..! पढ़िए बेटी के चेहरे की खुशी। पढ़िए माता पिता के आंखों में झलकते आंसू...!
 बेटी..! तथाकथित प्रगतिशील समाज के  आंतरिक आवरण पितृ सत्ता में आज भी बेटी अस्वीकार। तृष्कृत। दोयम दर्जा पर। भेदभाव की शिकार है। फिर भी बेटी का साहस पहाड़ जैसा होता है। धैर्य हिमालय के समतुल्य। ऐसी ही एक बेटी है प्रिया। बिहार इंटर परीक्षा में कॉमर्स राज्य टॉपर बनी। महत्वपूर्ण यह उतना नहीं। जितना बेटी का बेटी होने जैसा रहा। 

बरबीघा के गोलापार किराना दुकान चलाने वाले महेश छापड़िया और अर्चना को दो बेटियों ही है। समाज बेटा नहीं होने पर आज भी ऐसे लोगों को निर्वंश का ताना देता है। खैर, इनकी छोटी बेटी ने माता पिता का सीना गर्व से चौड़ा कर दी।

टॉपर बेटी की माता पिता के हाथ में पुष्प की माला देकर हम लोग समाचार की  तस्वीर और विजुअल के लिए बेटी को पहनाने के लिए दी तो प्रिया ने इसे अस्वीकार किया। कहा,  

"नहीं! माता पिता मुझे क्यों माला पहनाएंगे ? इनका संघर्ष और समर्पण इतना बड़ा है कि माला तो मुझे इनको पहनानी चाहिए...!" और भावुक होकर उसने लगभग माला छीन कर माता पिता के गले में डाल दी। बेटी की आंखें डबडबा गई। माता पिता की आंखों में समंदर उमड़ घुमड़ उठा। 

शायद बेटी से मिली इस खुशी के साथ बेटा नहीं होने के सामाजिक पाप के दंश को वे उसी समंदर में डुबोए रखना चाहते हो ! सतह पर दर्द को उतराना समाज को पसंद नहीं। समाज का खोखलापन समंदर की गहराई में ही पसंद किया जाता है। किनारे पर नहीं। समाज गंदगी को ढक कर रखना स्वीकार करता है। गले लगाता है। सतह पर नहीं। भोगा हुआ दर्द जब साक्षात होता है तो टीस होती है। और हां , वह समाज आपसे से ही है। हमसे ही है। बस

19 मार्च 2024

साष्टांग दंडवत उच्चतम न्यायालय के निरहंकारी माननीय न्यायाधीश संजय करोल

 भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में साष्टांग दंडवत ये उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश संजय करोल हैं । बीते दिनों इनका बरबीघा के विष्णु धाम मंदिर आना हुआ । पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए भी ये इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बनने के बाद जब यह यहां आए तो उनकी सहजता, समानता और निरहंकारी होना सभी को प्रभावित कर गया। बेहद शालीन, सौम्या और ऊर्जान्वित व्यक्तित्व के धनी संजय करोल के चेहरे पर एक अप्रतिम मुस्कान थी।



आज के समय में जब हम किसी भी मामूली पद , प्रतिष्ठा पर भी पहुंचते हैं तो एक अहंकार का रौब चेहरे पर दिखता है। जितना बड़ा पद होता है उतना बड़ा रौब दिखाते हैं। मामूली से सिपाही, पत्रकार, युट्युबर, क्लर्क, कर्मचारी से लेकर आईएएस, आईपीएस, अधिकारी तक, सभी में यही कुछ देखा जाता है ।


हम अपनी विशिष्टता को दिखाने के लिए इस रौब का प्रदर्शन करते हैं। अपने अहंकार को छोड़कर सहज हो जाना बहुत बड़ी बात होती है । आज के समय में एक मुखिया से लेकर विधायक और मंत्री तक अपने अहंकार की वजह से इतने रौब में होते हैं कि किसी से भर मुंह बात तक करना उचित नहीं समझते, वैसे में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संजय करोल को देखकर हमें सीख लेनी चाहिए।


भगवान श्री हरि विष्णु के चरणों में साष्टांग दंडवत ये उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश संजय करोल हैं । बीते दिनों इनका बरबीघा के विष्णु धाम मंदिर आना हुआ । पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए भी ये इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बनने के बाद जब यह यहां आए तो उनकी सहजता, समानता और निरहंकारी होना सभी को प्रभावित कर गया। बेहद शालीन, सौम्या और ऊर्जान्वित व्यक्तित्व के धनी संजय करोल के चेहरे पर एक अप्रतिम मुस्कान थी।

आज के समय में जब हम किसी भी मामूली पद , प्रतिष्ठा पर भी पहुंचते हैं तो एक अहंकार का रौब चेहरे पर दिखता है। जितना बड़ा पद होता है उतना बड़ा रौब दिखाते हैं। मामूली से सिपाही, पत्रकार, युट्युबर, क्लर्क, कर्मचारी से लेकर आईएएस, आईपीएस, अधिकारी तक, सभी में यही कुछ देखा जाता है ।

हम अपनी विशिष्टता को दिखाने के लिए इस रौब का प्रदर्शन करते हैं। अपने अहंकार को छोड़कर सहज हो जाना बहुत बड़ी बात होती है । आज के समय में एक मुखिया से लेकर विधायक और मंत्री तक अपने अहंकार की वजह से इतने रौब में होते हैं कि किसी से भर मुंह बात तक करना उचित नहीं समझते, वैसे में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संजय करोल को देखकर हमें सीख लेनी चाहिए।

14 मार्च 2024

व्हाट्सएप युग में कम होता अपनापन और सम्मान

व्हाट्सएप युग में कम होता अपनापन और सम्मान

सोशल मीडिया के इस दौर में व्हाट्सएप जैसे कई सोशल मीडिया से अपनापन और सम्मान के कम होने के कई प्रमाण सामने आने लगे हैं। कई बार असहज महसूस करता हूं । शायद आप सब भी ऐसा ही करते होंगे।

 दरअसल, किसी भी प्रकार का निमंत्रण अब व्हाट्सएप पर चुपचाप भेज कर चुप्पी साध लेने का एक नया चलन सामने आया है।


 हद तो तब हो जाती है जब घर और गांव के बगल के लोग भी आमंत्रण पत्र छपवाने के बाद उसे अपने पड़ोस अथवा पास के अपनों के बीच पहुंचना उचित नहीं समझते हैं।

 
एक कॉल करके बातचीत करना भी उचित नहीं समझते। यह चलन अपनापन के कम होने का ही प्रमाण है। 




इसी तरह का चलन पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सामने आया है जो पत्रकारों के घटते सम्मान को भी दर्शाता है। पहले के दौर में समाचार को प्रकाशित करने के लिए कई कई बार निवेदन किया जाता था । आज के दौर में किसी भी कार्यक्रम का पूर्व में सूचना भी नहीं दिया जाता और सीधा-सीधा फोटो और समाचार लिखकर चुपचाप व्हाट्सएप पर भेज दिया जाता है। हमारे कई साथी इन समाचारों को जगह दे देते हैं। हालांकि सम्मान आज हमारी प्राथमिकता सूची में है ही नहीं है।

11 मार्च 2024

#पोसुआ_यूट्यूबर के युग में हम जॉम्बी लोग

#पोसुआ_यूट्यूबर के युग में हम जॉम्बी लोग

वर्तमान असमंजस का है। कई मुख्या मीडिया से हटाए गए पोसुआ क्रांतिकारी यूट्यूबर को देख कर लगता है कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है। फिर कई पोसुआ यूट्यूबर को देखने के बाद लगता है कि खतरा नहीं है। इन खतरों के बीच आम आदमी असमंजस में दो-चार हो रहा है। पोसुआ से याद आया। अब हर पैसे वाला धनाढ्य जो नेता बनाना चाहता है, एक पोसुआ यूट्यूबर पालने लगा है।

मुद्दा है, क्रांतिवीर यूट्यूब चलाने वाले वही काम कर रहे हैं जो व्यापार करने वाले करते हैं। पैसा कमाना । सभी लोगों को व्यू चाहिए। जो जिस प्रकार से हासिल करें, वही ठीक। हमारे कई क्रांतिवीर यूट्यूबर 10 मिलियन सब्सक्राइबर होने पर हुंकार भरते हैं। जैसे कि अब वे सरकार बना और बिगाड़ देंगे।

पर10 मिलियन पर घमंड करने वाले क्रांतिवीर यूट्यूबर को देखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर कई खूबसूरत महिलाएं अपने उरोज का अर्ध प्रदर्शन से सोशल मीडिया को अपना गुलाम बना ली। 10-20 मिलियन सब्सक्रिप्शन उसके लिए आम बात है। इसी में कुछ ग्रामीण या घरेलू महिलाएं रेस में आगे बढ़ रही है। वे अपने गुप्त अंग को दिखाने का ऐसा स्वांग करती है कि उसके जाल में फंसे मदहोश पुरुष उसे करोड़ व्यू देकर उसे मालामाल कर देते हैं । इस रेस में कई किन्नर भी क्रांतिवीर यूट्यूब चलाने वालों से बहुत आगे है। उनका सब्सक्रिप्शन करोड़ों में है। कमाई भी। ओशो के शब्दों में हमारे अंदर की छुपी हुई कुंठा है। मतलब आज सोशल मीडिया के मालिकों ने इसे पकड़ लिया है। सोशल मीडिया का एल्गोरिथम हमें वही दिखता है जो हम देखना चाहते हैं। तो अश्लीलता पड़ोसने वालों को अधिक भी व्यू हमारी कुंठा ही है।

खैर, बात इससे अलग। तो यह सब इसलिए की सोशल मीडिया पर हम सब जॉम्बी हैं। मदहोश और जॉम्बी को अपने जाल में फंसाने वाले कारोबारी। सभी लोग वही कर रहे हैं।

इस विज्ञापन वादी बाजारवाद की दुनिया में नेता अब कंपनी की तरह अपने प्रॉडक्ट्स को बेच रहे हैं । विज्ञापन एक भ्रम है । विज्ञापन हमेशा झूठ का किया जाता है । यह बात पूरी तरह से सच है। हम शांत होकर अच्छा बुरा सोचेंगे तो हमें कुछ दिखने लगेगा।

यह धारणाओं को रचने का दौर है । धारणा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) से भी रचा जा रहा। वहीं अभी नमाजी को बूट से मारने का धृणित कृत किया गया। धारणा बनाने वालों ने इसे अलग प्रस्तुति दी। उसने पकड़ लिया। वही लोग बंगाल पर चुप रहे। पुजारी की पिटाई पर चुप्पी साध ली। या अगर मगर लगाकर अपनी बात रखते हैं। यह चुप्पी आज से नहीं है । भारत-पाकिस्तान बंटवारे में लाशों से पटी रेलगाड़ी, नौवाखली से लेकर गोधरा, गुजरात से लेकर नूह तक, सभी जगह कोई चुप, तो कोई बोलता है।

बस, इसी से अब खतरा है । जो ज्यादा समर्थवान होगा, वह ज्यादा बोलने पर आपको मजबूर करेगा । आप अपने कब्जे में नहीं है। सोशल मीडिया और विज्ञापन से जो दिखता है आप उसे सच मान रहे हैं। आपके आसपास की सच्चाई भी आपको नहीं दिखती है। जैसे कि सरकार ने अभी दाबा किया कि गरीबी कम गई है आप अपने आसपास नजर उठाऐंग तो सच्चाई भी दिखने लगेगी।

अंत में कविवार दुष्यंत कुमार के शब्दों में,
---
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
घर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख।

बस

03 मार्च 2024

अथ श्री चोंगाधारी कथा

बात नगर पालिका के सफाई कर्मियों के संगठन झाड़ू बुहारू महा गठबंधन अध्यक्ष चुनाव का है। चाय नाश्ते से सदस्यों को मनाने से बात नहीं बनी तो मुर्गा के साथ-साथ बिहार में प्रतिबंधित और सर्वसुलभ पेय का उपयोग किया गया।

बिहार में  प्रतिबंधित पेय का उपयोग मच्छर भगाने वाला फाटक से फुर्र  वाले गुड नाईट की तरह तुरंत काम करता है।

(रामबाण की तरह काम करना लिखना आज खतरे से खाली नहीं है। पता नहीं कौन से भक्त की भावना आहत हो और वह कहीं भी अघात कर आहत कर दे।)

 खैर, खेलावन अध्यक्ष बन गए। वहीं नगर में संचालित सार्वजनिक इज्जत घर के अध्यक्ष अपने प्यारे चापलूसों को बनाया। फिर नगर भर में ढिंढोरा पिटवाया। नहीं, ढिंढोरा पुराने तरीके से ढोल बजाकर नहीं पिटवाया। खेलावन अंगूठा छाप होते हुए भी इस्मार्ट मोबाइल न सिर्फ रखते हैं, उसे चलाना भी जानते हैं। खादी का कुर्ता, पजामा और समय-समय पर रंग बदलने वाला गमछा रखना भी सीख गए हैं।

 उनके पास नगर के कई नामचीन चोंगा धारी का नंबर भी है जो एक सेकेंड में अमेरिका के राष्ट्रपति को गद्दी से उतारने और बैठाने जितना ताकत रखते है।


 मोबाइल में भौंक कर खेलावन ने सभी को नागरिक अभिनंदन का न्योता दिया। कहा, नगर के सुप्रसिद्ध सार्वजनिक इज्जत घर के प्रांगण में मेरा नागरिक अभिनंदन किया जाएगा। इस मौके पर आपको आना ही पड़ेगा क्योंकि वहां टंगड़ी कबाब के साथ-साथ एक-एक हरा पत्ता का उपहार सार्वजनिक तौर पर दिया जाएगा।

सार्वजनिक इज्जत घर के अध्यक्ष बनडमरू अपने नए नेता का यह उदारवादी चेहरा देखकर हैरान था! उसमे तो इसे मैला पर पड़े  सिक्का को चुराते देखा है!

 उसने पूछा, गुरुदेव यह सब अवगुण आप कहां से सीखे।  खेलावन खिलखिला उठा। कहा, आगे बढ़ाना है तो आगे बढ़ चुके लोगों से सीखो। मैं जहां-जहां सफाई का काम किया, वहां सीखने पर ही ध्यान दिया । कैसे सबकुछ मैनेज कर रातों-रात नेता छा जाता है। यह सब वही विद्या है। फिर खेलावन ने कुछ नोट बनडमरू के हाथ में रख, बोले इससे नागरिक अभिनंदन का खर्च करना। बड़ा माला मंगाना। कुछ लोगों को नारा लगाने के लिए अलग से फीस देना। बढ़िया खाना मिलेगा, लोगों को बुलाना।

सब कुछ बढ़िया रहा तो अगली बार तुमको नगर अध्यक्ष बना देंगे । पर गुरुदेव, फिर आपका क्या होगा..? मेरा जय-जय का नारा लगाते रहो । इस बार एमएलए का चुनाव लड़ लेंगे। जय मीम।

 अगले दिन सभी के मोबाइल पर खेलावन गरज रहा था। गरज कर बोलना भी उसने सीख लिया था। हालांकि दूध में गिरे मक्खी की तरह एक चोंगाधरी ने पूछ लिया, सुना है इज्जत घर घोटाले में आपका हाथ है। वहां मूत्र विसर्जन करने वालों से भी वसूली हुई है। इस तरह के प्रश्नों का जवाब देना भी खेलावन सीख गए थे। कहा कि छोटी जाति होने की वजह से उन्हें बदनाम किया जा रहा है। यह सब विरोधी का काम है । जनता का समर्थन उनको मिला हुआ है।

25 जनवरी 2024

दो राहे पर बिहार

पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती के बाद बिहार की राजनीति में अति पिछड़े मतदाताओं को रिझाने के सारे उपक्रम का प्रमाण बनकर सामने आया। मंच से वंशवाद की आलोचना करके नीतीश कुमार ने फिर बिहार को असमंजस में खड़ा किया।

 वहीं, कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के बाद इसकी चर्चा जोड़ पकड़ी। बिहार की राजनीति जातिवादी है। यही सच भी है। इसी बिहार की राजनीति को धर्मवादी बनाने का प्रयास बीजेपी की है। इस सब के बीच बिहार कुछ चीजों में देश से आगे बढ़कर काम भी कर रहा है। पहली बात राम मंदिर के चरमोत्कर्ष धार्मिक राजनीति के अतिवाद से अलग, बिहार ने माता जानकी की जन्मभूमि में राम मंदिर से एक दिन पहले राम जानकी मेडिकल कॉलेज का शुभारंभ करके संदेश दे दिया ।

इससे पहले भी बिहार में 3 लाख शिक्षकों की सरकारी नौकरी देकर केंद्र सरकार को लजा दिया। वहीं केंद्र ने एक लाख रेलवे चालक की नौकरी की जगह मात्र 5000 की नौकरी का आवेदन मांग कर युवाओं का उपहास भी किया।

 युवाओं का उपवास तो अग्नि वीर जैसे योजनाओं से भी किया गया। यह अलग बात है कि धार्मिक अतिवाद से युवाओं को मति भ्रम में डाल दिया गया। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव जातिवाद के अतिवाद को आगे बढ़ा समाज को बांटने और मत पाने का माध्यम बना लिया। आरक्षण की सीमा बढ़ाकर सवर्ण को राज्य, देश निकाला जैसा संदेश भी दे दिया ।

अब बिहार में नीतीश कुमार आज पलटेंगे कि कल पलटेंगे, यही संदेश हवा में तैर रहा है। मीडिया माफिया के द्वारा प्रायोजित तरीके से इस तरह का संदेश फैलाया जाता है। जन-जन इसे सच भी मान लेता है। राजनीति भी यही है। कब क्या है, कहां नहीं जा सकता। तेजस्वी यादव ने सत्ता में आने से पहले ए टू जेड का नारा बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के गांव से दिया । यह बेमानी हो गया । बात इतना, बिहार दोराहे पर है। के के पाठक जैसा अधिकारी अति प्रशंसा से प्रफुल्लित हो अतिवाद का शिकार हो, मनमानी कर रहा। कोई टोकने वाला नहीं । इससे, बिहार सरकार के द्वारा दिए गए नौकरी के लाभ को हानि में बदल दिया गया।

उसे यह समझ नहीं की 24 कैरेट सोने से आभूषण नहीं बनता। पी के जनता को उसके घर में जाकर वंशवाद, जातिवाद का नुकसान उनकी भाषा में समझ रहे। अपेक्षित परिणाम यदि निकला तो बिहार फिर से एक संदेश देश को देगा। पर इसकी उम्मीद कम है।

बस।

23 जनवरी 2024

जन-जन में रमे राम का जयघोष

जन-जन में रमे राम का जयघोष


घट घट के वासी राम लला भव्य और दिव्या मंदिर में विराज गए। प्रतिमा दिव्य, जीवंत, जैसे अब बोल देंगे, कि तब बोल दें। मुस्कान तो जैसे सबके जीवन में सुख के आलंबन का संदेश हो..! आंखें, जैसे जीवन को उद्दीप्त कर रही..!
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥1॥

भावार्थ,
अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है॥1॥

गोस्वामी तुलसीदास के इस चौपाई के भावों को जन जन के मन में उतरने की कामना के साथ ही आह्लादित  और प्रफुल्लित मन भारत की सभ्यता और संस्कृति के इस जय घोष का अभिनंदन करता है। 


निश्चित रूप से बर्बर बाबर ने भारत के इसी सभ्यता और संस्कृति को धूमिल करने का प्रयास किया था परंतु भारतीय जनमानस के सनातनी आधार ने 500 सालों की लंबी सहिष्णुता का परिचय देकर विश्व को सहिष्णुता का ही संदेश दिया है।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह भव्य और दिव्या रहा। इसमें देश के ख्यातिलब्ध हस्ताक्षरों की उपस्थिति हुई। आह्लादित मनीषियों की आंखें भी यहां छलक आई।


इस सबसे अलग, भगवान राम का जीवन ही शास्त्र के अनुकूल है। भगवान राम का जीवन ही उपदेश है। इस बात को भी हमें नहीं भूलना चाहिए।

सोमवार को सुबह से लेकर रात तक दीपोत्सव ने जन-जन में रमे राम का जयघोष किया। शहर, गांव, घर, गली, सभी तरफ राम का शंखनाद। घरों और गलियों में राम संकीर्तन का नाद गूंज रहा था।

यह सब के सब भाजपा और आरएसएस के द्वारा प्रायोजित नहीं था। यह सब जन-जन रमे राम थे। स्वतःस्फूर्त। आह्लाद प्रस्फुटित।

राजनीतिक दल निश्चित तौर पर वोटो के लाभ हानि के हिसाब से काम करते हैं भाजपा के एजेंडा में ही राम मंदिर प्रथम था, उसने पूरा किया।

कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने जन भावना का अनादर किया। उसने भी दूसरे पक्ष के वोट को साधने के लिए ही यह सब किया, जो आरोप वह भारतीय जनता पार्टी पर लगाते हैं।

मूलतः भारत के जन-जन के रोम रोम में राम हैं इसी का जय घोष सोमवार को देखने को मिला । मेरे जैसा अकिंचन, अधी तो यह भी नहीं कह सकता की राम के जीवन का लेस मात्रा भी अपने जीवन में कोई उतार ले तो जीवन सफल हो जाए, यह केवल उपदेश देने वाली बात होगी। बस...