नवरात्री की रात को बिहार के गांवों में गेरूआ प्रवेश कर जाता है। गेरूआ को गांव के लोग अशुभ मानते है और इसमें कोई शुभ काम नहीं किया जाता। यहां तक की नया वस्त्र अथवा किसी नये सामान का उपयोग नहीं किया जाता है। इसमें बाल और दाढ़ी बनाने को भी अशुभ माना जाता है।
यह एक ऐसी परम्परा है जिसे अंधविश्वास कहा जा सकता है। गेरूआ को लेकर मान्यता है कि इसमें डायन और ओझा सब दुर्गा और काली का अनुष्ठान करते है। इसी से बचने के लिए हर घर में महिलाऐं नजर लगने से बचाने का उपाय करती है। इसके तहत घर के बाहरी दिवाल को गोबर से लकीर बना कर बांध दिया जाता है और दरवाजे पर काले मिट्टी का बर्तन फोड़ कर रख दिया जाता है और टोटो-माला बांध दिया जाता है।
टोटो-माला काले कपड़े से महिलाऐं बनाती है जिसमें बालू, मिर्च, लहसून, काला और पीला सरसे तथा रैगनी का कांटा डाल कर एक थैली नुमा बना दिया जाता है। इस टोटो माला को बच्चे के गले में लटका दिया जाता है। इतना ही नहीं लोग मवेशियो के गले में भी इसे लटका देते है ताकि इनको नजर लगने से बचाया जा सके। किसान आपने खेतों में भी यह टोटका करते है..
रात्री में बच्चों के आंखों में काजल लगा दिया जाता है और बड़ों को नाभी में काजल लगा कर नजर लगने से बचाने का उपक्रम किया जाता है।
आज हम आधुनिक युग में जी रहे है। एक तरफ हम मंगलयान को मंगल ग्रह पर पहूंचा रहे है तो दूसरी तरफ इस तरह के अनुष्ठान अंधविश्वास के अतिरिक्त कुछ नहीं।


मैं आज भी दोस्त की उस मां का प्रणाम करता हूं तो वह अन्र्तमन से आर्शीवाद देती है और जब जब गेरूआ आता है मुझे बचपन की बातें याद आ जाती है। सोंचता हूं कि यह अंधविश्वास जाने कब पूरी तरह से खत्म होगा..
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-09-2014) को "अहसास--शब्दों की लडी में" (चर्चा मंच 1749) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
शारदेय नवरात्रों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आभार आपका
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रेरक संस्मरण। इससे थोडा तो कम होगा अंधविश्वास।
जवाब देंहटाएंSaarthak...prabhaaavi aalekh...!! Badhaayi !!
जवाब देंहटाएंSaarthak...prabhaaavi aalekh...!! Badhaayi !!
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