26 दिसंबर 2025

दुर्गा पाठ: यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है

दुर्गा पाठ

(कहानी – अरुण साथी)

(घोषणा: यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।)

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शारदीय नवरात्र का समय था। बाजार के बस स्टैंड की अलसाई हुई सुबह में चार बजते ही ‘जय अंबे’ का भजन बजने लगा।

पटना जाने वाली पहली बस के खलासी बटोरन ने बस के बोनट पर लगी माता दुर्गा की छोटी-सी पीतल की मूर्ति पर ताज़ा फूल चढ़ाए। अगरबत्ती जलाई और प्रतिमा को प्रणाम किया।

तभी उसे किसी महिला के कराहने की आवाज़ सुनाई दी। वह चौंका नहीं। यह आवाज़ बस स्टैंड के खंडहरनुमा यात्री शेड से अक्सर आती रहती थी।

बटोरन जानता था—यात्री शेड में एक पगली रहती है।

पगली—उम्र लगभग पचास–पचपन वर्ष। रंग काला। शरीर पर कपड़े के नाम पर एक फटी हुई नाइटी। बाल ऐसे उलझे हुए, मानो किसी चिड़िया का घोंसला हो।

बटोरन को याद आया—करीब पाँच साल पहले दुर्गा पूजा के समय ही वह शाम में कहीं से भटकती हुई बस स्टैंड आ गई थी। आ क्या गई थी, चाय दुकान के सामने आकर खड़ी हो गई थी और चाय दुकानदार बंटू का मुँह टुकुर-टुकुर ताकने लगी थी।

चाय दुकान चलाते-चलाते बंटू आँखों की भाषा समझने लगा था। उसने पगली के हाथ में कागज़ की प्याली में एक कप चाय थमा दी।

पगली के चेहरे पर खुशी की बहुत ही महीन-सी रेखा उभरी, पर उसे पढ़ पाना मुश्किल था।

चाय पीने के बाद वह यात्री शेड में जाकर बैठ गई।

अगली सुबह बटोरन चाय दुकान पर पहुँचा। चाय पीने के बाद उसने बीड़ी सुलगा ली।

तभी यात्री शेड की ओर उसकी नज़र गई। वहाँ एक पूर्णतः नग्न स्त्री दिखाई दी। वह डर गया। उसे लगा जैसे कोई भूत-प्रेत हो। फिर उसने साहस बटोरा। बीड़ी फेंक दी और उस ओर कदम बढ़ा दिए।

कुछ दूरी से ही साफ़ हो गया—यह तो वही पगली थी। वह उल्टे पाँव लौट आया। उसके हाथ-पैर थरथराने लगे।

चाय दुकानदार बंटू ने उसे देखकर सब समझ लिया। उसने हल्का-सा मुँह बिचकाया। उसमें गहरी पीड़ा और बेबसी थी।

बोला,

“उहे नरबा… आऊ के…! रातो भर एजे हलो…।”

नारो दादा बस स्टैंड में एजेंटी करता है।

बटोरन के मुँह से एक शब्द नहीं निकला। वह अपने काम में लग गया—बस धोया, पूजा-पाठ की तैयारी करने लगा। आज उसे देवी दुर्गा की प्रतिमा पर गुड़हल का फूल चढ़ाने का साहस नहीं हुआ।

उसके बाद से नारो अपने साथियों के साथ यात्री शेड के पास अक्सर मंडराता रहता था।

*****

आज फिर पगली के कराहने की आवाज़ आई। बटोरन जानता था—इस साल भी पगली पेट से है। पाँच साल में उसने तीन बार बच्चों को जन्म दिया था। कुछ दिनों बाद बच्चों का क्या होता, यह किसी को नहीं पता।

आज फिर उसने झाँककर देखा। यात्री शेड के पास स्थानीय मोहल्ले की कई महिलाएँ जुट गई थीं। तभी उसके कानों में नवजात के रोने की आवाज़ पड़ी।

उसी समय उसने देखा—नारो गुड़हल का फूल तोड़कर घर की ओर जा रहा था।

तभी बटोरन ने टोक दिया—

“की हो नारो दा, तोहूं दुर्गा पाठ करो हो…!”

नारो तेज़ी से कदम बढ़ाता हुआ चुपचाप चला गया…।

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे तो रोंगटे खड़े हो गये। क्या कहे सर....।

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  2. आपने बस स्टैंड की रोज़मर्रा की चुप्पी में छिपी क्रूर सच्चाई को सीधे सामने रख दिया। बटोरन का डर, बंटू की बेबसी और पगली का लगातार शोषण दिल को चुभता है। कहानी पूजा, भजन और गुड़हल के फूल के बीच पाखंड को उजागर करती है। नवरात्र के जयकारों के साथ चलती यह चुप्पी समाज की असली तस्वीर दिखाती है।

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