24 अक्टूबर 2026

गांव का देसी ओल और हाइब्रिड

#ओल 
यह देसी ओल है। इसे तैयार होने में तीन चार साल लगे। देसी ओल की सब्जी खाना बड़ी चुनौती है। बहुत कुलकुलता है। कुलकुलाना बंद हो इसके लिए बहुत प्रयोग होता है। नींबू का प्रयोग, तेल में छानना इत्यादि। पर तब भी खत्म नहीं होता। कहा जाता है कि इसका औषधीय गुण बहुत है।
अब, हाइब्रीड ओल बाजार में है। कुलकुलाना बंद। यही खूब बिकता है। पर देसी स्वाद नहीं है। गुणवत्ता वह नहीं है। अधिकतर सब्जियों ने यही हुआ है। फूलगोभी में खुशबू गायब। खीरा का तीखापन खत्म आदि..

बस..

23 अक्टूबर 2026

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर यह प्रश्न कई लोगों ने उठाया। उत्तर कहां है..? 
तो उत्तर प्रश्न में ही निहित है। दरअसल, बिहार में भूमिहार (बहुसंख्यक) जमींदारों के विरुद्ध जमींदारी उन्मूलन कानून लाने वाले, दलित को देवघर मंदिर में प्रवेश कराने वाले, और अंग्रेजों के लोहा लेने वाले बिहार केसरी को जब हम भूमिहार जाति के सीमा में बांध दिए, उसी दिन इसकी संभावना मर गई। जो भी महापुरुष हुए, वे जातियों की विसंगतियों का खंडन किया। लड़ाई लड़ी। अपमनित हुए। बिहार केसरी के साथ भी यह हुआ।

अपने राजनीतिक लाभ के लिए कुछ नेताओं ने बिहार केसरी को भी इसी सीमा में बांध दिया। उनका स्वार्थ तो सध गया। बिहार केसरी पिछड़ गए।

यह क्षरण आंबेडकर, पटेल से लेकर सभी महापुरुषों के साथ हुआ है। और इसी में भारत रत्न का मामला छिपा है। श्री बाबू भूमिहार जाति से थे। सवर्ण सहित इस जाति को कल तक बीजेपी का कोर वोट माना जाता था। बीजेपी ने यूजीसी के बहाने, इस जाति सहित सवर्णों को आहिस्ते से किनारे लगा दिया। बिहार में बीजेपी शुरू से ही खुलकर जातिवाद राजनीति करती रही है। इसी में अति पिछड़ा वोट बैंक के हिसाब के कर्पूरी जी को भारत रत्न मिला। श्री बाबू का फाइल किनारे रख दिया। जब कभी जरूरत लगेगी, यह कार्ड भी खेला जाएगा। पर अभी कोई संभावना नहीं दिखती...

19 अक्टूबर 2026

कसाई !

कसाई तो कसाई होता है..

आज मार काट है। बलि प्रथा। जीव हत्या। और आज कसाई की खूब कमाई हुई। पर कसाई कितना क्रूर है, देखिए।

बरबीघा के फैजाबाद मोहल्ले से पिछले कुछ दिनों में कई बकरे और बकरी की चोरी हो चुकी है। आज दोपहर, बीच सड़क से एक बकरी को चोर उठा ले गए। यह मो अंजर का था। उसका पूरा परिवार उसे खोज रहा है। एक बच्ची शिवकुमार जी के घर खोजने आई। वह सीसीटीवी कैमरा में देखने का जिद कर रही थी। वह बहुत उदास थी। कह रही थी, 
"देखिये न सर, अभी पिछले सप्ताह ही बच्चा दी है। उसके पांच बच्चे है। सभी भूख से बिलख रहे है।"

मैं सोच रहा था, उस नन्हे बच्चे की आह कोई ईश्वर सुनता होगा क्या...?

खानदानी

खानदानी
(कहानी-अरुण साथी)
खदेरन बाबू गाँव के बड़का जमींदार थे। अंग्रेजों के सबसे प्रिय। अब सरकार ने जमींदारी छीन ली थी, पर ठसक नहीं छीन सकी थी। उनका भरा-पूरा परिवार था। अब जमींदारी के नाम पर बस हवेली बची थी। वह भी ढह-ढनमना रही थी।
इतनी उम्र में पहली बार खदेरन बाबू अंदर से व्यथित थे। आज उनकी इस हवेली में पंचायत बैठी थी। आज गोबर राम मुखिया है। अब वही न्याय भी करेगा।

मुखिया के बगल में एक युवक बैठा था। गुस्से से लाल, तमतमाया हुआ।

“हमरो कोर्ट-कचहरी देखल हइय। सहूलियत से हमर हिस्सा दे दहो। हमरो देह में तोहरे खून दौड़ रहलइ हें।”

बगल में हाथ जोड़े, सिर झुकाए एक महिला खड़ी थी। मंगली।

पुरानी बात है। वह पंद्रह साल की रही होगी। माय के साथ चौका-बर्तन में हाथ बँटाने हवेली आती थी। एक दिन खदेरन बाबू ने उसे एक कमरे में खींच लिया।
वह चीखती-चिल्लाती, विलाप करती रही।
घर आकर माय को बताई। माय ने चुप करा दिया।
तब से वह ऐसी चुप हुई कि लोग उसे गूँगी समझने लगे।
तब से वही कमरा, वही खदेरन बाबू, वही हवेली।
बस, अब चीखना-चिल्लाना सिसकियों में बदल गया था।

फिर वही कमरा मंगली का घर हो गया। अब मंगली का नाम रखेलनी हो गया।
आज इस मंगली का बेटा अपना हिस्सा माँग रहा था।
मुखिया ने समझाया,
“घर के बात घर में रह जइतो, खदेरन बाबू। भले बियाह नइ कइलहो, बेटवा तो तोरे हो। समझो कि तीन बेटा हो। नइ तो खानदान के नाक कट जइतो। आजकल कानून बड़ी कड़ा हो गेलइ हइ। जेल भी जाय पड़तो, उ अलगे।”

खदेरन बाबू ने सहमति में सिर हिला दिया।
कागज बना। तीसरा हिस्सा मंगली के नाम हो गया।

15 अक्टूबर 2026

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया 

अभी डांडिया का चलन है। अचानक यह बढ़ा है। गुजरात से महानगर। और अब बिहार के कस्वा से लेकर गांव तक। सभी जगह। इसे बाजारवाद का प्रभाव माना जाता है। और यह है भी । तब भी, खराबी क्या है? आज पूंजीवादी व्यवस्था में हम सभी तो बाजारवाद के प्रभाव में हैं ही। हमारा राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक, सभी आयोजन बाजारवादी है। यह एक सच्चाई ही है। 
अभी अचानक एक दिन सोच रहा था। एक दशक पहले तक दिल्ली जाने में रेलवे स्टेशन पर बोतल में पानी भरकर रेलगाड़ी पकड़ने दौड़ते थे। पानी भरने के लिए आपाधापी। एक कान रेल की सीटी पर रहता था। और आज? बाजारवाद ने ऐसा प्रभाव डाला कि हजार, पांच सौ का पानी ही पी जाते। उसने में भी नकली भी। कहा गया कि बीमारी का खतरा कम होगा, पर आंकड़े कहते है, बीमारी बढ़ गई। खैर, बाजारवादी डांडिया में भी खुशी की तस्वीर मिलती है।

खुशी, एक तो वह खुशी; जो हमारे जीवन में नहीं है। उसे हम अब इसी तरह के आयोजनों के माध्यम से सबको अपने खुश होने को प्रचारित करते है। सेल्फी में मुस्कुराते है। रील में डांस करते है। हंसते है। बाकी  तनाव, अवसाद, कुंठा, प्रतिस्पर्धा तो जीवन में है ही  

दूसरा वह, जो अंदर से खुश है। जो अंदर से खुश है। बस खुश है। चैतन्य। पर बहुत कम। एक चित्र में एक बच्चा अपने माँ के साथ डांडिया खेल रहा है। पिता वीडियो बना रहा। बस, इतनी सी खुशी। और सच्चिदानंद।
 बाकी अभी डांडिया में एक महिला के देह का चित्र हम पुरुष नैतिक ज्ञान बांटते हुए अपने वॉल पर चिपका रहे। मैं सोचता हूं, कि अश्लील रिल्स बनाने वाली महिलाओं का वीडियो करोड़ों लोग देखते है। वह देखने वाला कौन है..? महिला तो देखती नहीं...? फिर यह ज्ञान देने वाले कौन है..? दोहरा चरित्र..! बस, इतना ही। बाकी सब ठीक है.. हां, अपने यहां रोटरी क्लब के द्वारा आयोजित संयमित  डांडिया में मित्रों के आग्रह पर आधे मन से मैं भी गया। फोटो सेशन भी है..बाकी जगह तो हुड़दंग भी होता है...

13 अक्टूबर 2026

युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए

युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए अब युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए । भला बोलिए तो, इतना भीड़, जैसे पूरा देश सड़क पर उतर गया हो। और कितना जनबल दिखाएगा कोई..? अब तो वोट चोरी करके कुर्सी को हथिया लिए लोगों को कुर्सी का त्याग कर ही देना चाहिए।
आखिर त्याग को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। और त्याग करवाने के कितने बड़े-बड़े झेन झी सड़क पर पसीना बहा रहे हैं। सेल्फी, फोटो, रील, वीडियो सभी लाहा लोट है। इसमें कोई आगे आए तो केहुनी भी मार देते है। उधर, कुर्सी के त्याग के इस महा अभियान में कॉकरोच भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं। इससे पहले की कुर्सी के प्रबल दावेदार कॉकरोच बन जाएं, युवराज को कुर्सी सौंप देना ही चाहिए। एक अदद कुर्सी के लिए कोई और कितना सैक्रिफाइस करेगा। 56 साल में झेन झी। कई बार पार्टी चुनाव हारी। खुद भी हर गये, पर हौसला नहीं हरा। हौसला कैसे हार जाते । हारने के बाद ठीकरा फोड़ने के लिए कभी ईवीएम मशीन होता है, तो कभी वोट चोरी हो गया। अब सुप्रीम वाले माननीय महोदय से भी इस्तीफा मांग लिया गया है। ठीक ही किया है। भला बोलिए तो, कैसा न्याया..? एक युवराज की बात नहीं मानते हैं! एक युवराज से मिलने से मना कर देते हैं! हटाओ इसको...? खेलावन काका ने पूछा, "बच्चा एक साथ कितने कुर्सी पर बैठोगे..?" युवराज बोले, "आधा दर्जन तो जरूरी है काका! पीपीएम (परमानेंट प्राइम मिनिस्टर) के साथ-साथ पीसीजेआई इत्यादि रहेगा। पूरे कुनबे को सेट करना हैं। "तानाशाही नहीं चलेगी, हाय हाय, हाय हाय!" खेलावन काका टोक दिए "अयां हो मरदे, जब देश में तानाशाही हइ त फेर ई सब नारा कैसे लगा रहलीं हें... तानाशाही नहीं चलेगी, हाय हाय, हाय हाय...?" चुप रहिए काका, पोलटिक्स सबके समझ से बाहर है। अरुण साथी, #कटाक्ष

10 अक्टूबर 2026

तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय।

तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय। यह तो तानाशाही है। घोषित आपातकाल है। जुल्म हो रहा है, जुल्म। भला बोलिए तो, सबको पकड़ लिया। जहाज से भी उतरने नहीं दिया। जर्मनी से आने वाले को भी उठा ले गया। हद तो यह की दिल्ली के अभूतपुर्व बादशाह को भी घसीट लिया। और तो और, दीदी को भी पकड़ कर ले गए । इससे बड़ी तानाशाही क्या होगी। खेलावन काका बोलते जा रहे थे। रुक ही नहीं रहे थे । बहुत ही गुस्से में थे । उन्होंने कहा , सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए था । रेल, मेट्रो, बस, सड़क सब बंद कर दिए। और तो और, प्राण वायु, इंटरनेट को भी बंद कर दिया गया । जुल्म हो रहा है देश में, जुल्म। पहले जब आपातकाल लगा था तो कितनी उदारता थी। कितनी संवेदनशीलता थी। कितना न्यायप्रिय शासन था। और जब पहली बार कॉकरोच जंतर मंतर पर आंदोलन करने के लिए आए थे, वह आंदोलन कितना अच्छा था । संसद पर चढ़ने की तैयारी हो गई थी। लठ पर लठ चले थे। कितनों का माथा-कपार लाल-लाल हो गया था और मोबाइल के मायावी का कितना रील वायरल हुआ था। देश भर से मोबाइल के मायावी भी पहुंचे थे और तरह-तरह के डांस, तरह-तरह के गाने वायरल हुए थे। झेन झेन झी- ने कैसे-कैसे मधुर गीत गए थे । उनके कोकिल कंठ से देश के प्रधान के लिए कितने अच्छे-अच्छे बोल निकले थे। सभी का अंत:करण तृप्त हो गया था। और तो और देश भर में हुआ केस भी रद्द हो गया था। तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय। खिलावन काका बोलते ही जा रहे थे, रुक ही नहीं रहे थे।

09 अक्टूबर 2026

सबका हिसाब होगा..!

सबका हिसाब होगा...!

"गंभीर चिंता का विषय है। भला ऐसी कोई सरकार होती है। छप्पन इंच का सीना तो मुहावरा निकला। उससे पहले दशमलव लगा हुआ है।"
"बोलिए तो पुलिस को लतियाया, महिला पुलिस को उकसाया, नेता को गरियाया, तब भी चुप्पी है। ऐसे, कैसे लोकतंत्र चलेगा।"

 युवा नेता खेलावन काका से अपना दर्द साझा कर रहे थे।

काका ने भी चमचागीरी की। बोले, 

"सही कहे बेटा। इतना में तो लाठी पीठ पर चित्रकला का प्रदर्शन होना चाहिए। हाथ, पैर के हड्डी का विभाजन तो स्वाभाविक होता। और आंसू गैस तो छोड़िए, बंदूकें गरजती। पर सब चुप है। यह बड़ी साजिश लगती है। 

युवा नेता बोले, 
"हां काका। चिंता का विषय है। खैर, मेरी सरकार आने दीजिए, सब याद रखा जाएगा, सबका हिसाब होगा...!"

अरुण साथी (व्यंग्य)

08 अक्टूबर 2026

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

भागवत कथा में गोपियों और उद्धव का जो संवाद है वह प्रेम और विरह का ऐसा संवाद है जिसने डूबकर कर सुनने वालों की आँखें भर आती है। 
बिहार सरकार के माननीय मंत्री अशोक चौधरी जी के आवास पर भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य मिला। 

कथावाचक ने श्री कृष्ण, उद्धव और गोपियों के प्रसंग को सारगर्भित तरीके से रखा। वही समापन में रुक्मणी के विवाह का भी प्रेम पूर्ण वर्णन किया। 
भागवत में उद्धव और गोपियों का संवाद प्रेम की पराकाष्ठा का ही संवाद है। 

कहते हैं कि उद्धव को जब अपने योग और ब्रह्म ज्ञान का मान हुआ तो कृष्ण ने उनको गोपियों के पास समझाने के लिए भेज दिया।
उद्धव कहते हैं,

"तजो रे स्याम, भजो रे निर्गुन... 

तुम कृष्ण को भूल जाओ और अपने हृदय में उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करो, जो कभी नष्ट नहीं होता। योग साधना करो।

गोपियाँ कहती हैं,

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!" 

हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन (हृदय) नहीं हैं। एक ही मन था, जो श्याम सुंदर (श्रीकृष्ण) के साथ मथुरा चला गया। अब हम तुम्हारे इस निराकार ब्रह्म की आराधना किस मन से करें?

फिर इस भ्रमर गीत का मनोहारी गायन होता है,

उधो मत आइयो समझाने, 
जाके कांटो लगे वही जाने,

मतलब जिसने प्रेम ही नहीं किया, वह प्रेम को क्या समझेगा...?

अंत में उद्धव भी यह समझ जाते हैं कि योग और ज्ञान मार्ग से भी बड़ा प्रेम है...




नाना पाटेकर का जाना

नाना पाटेकर का जाना...

भारतीय सिनेमा जगत में नाना पाटेकर एक ध्रुव तारा के समान थे जो धुप्प रात के अंधेरे में भी रास्ता दिखाते थे। नाना पाटेकर के सिनेमा को जिसने देखा, वह सिनेमा के नाना पाटेकर के किरदार के साथ जीने लगा। 
नाना पाटेकर ने प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर इत्यादि सिनेमा के माध्यम से हमें राष्ट्रभक्त होना, सत्य निष्ठ होना सिखाया। 

नाना पाटेकर के सिनेमा ने ही हमें सत्य के लिए अड़ना भी सिखाया। 

नायक के किरदार के साथ-साथ खलनायक के किरदार में भी जब नाना पाटेकर उतरे तो उसमें भी एक जीवंतता देखी गई। एक दम से डरा देते। 

हालांकि वेलकम जैसे सिनेमा में नाना पाटेकर का हास्य किरदार बहुत प्रभावशाली नहीं रहा परंतु उन्होंने यह भी किया। 

सादर नमन 


06 अक्टूबर 2026

भले लोग बहुत हैं (यात्रा वृतांत)

भले लोग बहुत हैं 

यह ट्रक की सवारी का चित्र है। पिछले दिनों मोकामा से घर आना था। इस मार्ग में आज भी यात्री वाहन कम ही चलते हैं। संध्या का समय था। मेरे मित्र अभय जी हमेशा यहां से अपने घर ट्रक अथवा किसी से भी सहयोग लेकर ही पहुंचते हैं। उनका प्रयोग मैंने भी आजमाया। एक दो को हाथ दिया । गाड़ी नहीं रुकी। 

फिर एक को हाथ दिया। ट्रक सामने नहीं रुका। थोड़ी दूर जाकर रुका। दौड़ कर चढ़ गया। अंदर दो लोग थे। आत्मीयता से स्वागत किया। 
"कहां जाना है?"
"बरबीघा"
"मैं सरमेरा जाऊंगा..।"
"ठीक है, वहीं उतार दीजिएगा..।"

बैठ गया। फिर बातचीत शुरू किया। क्या नाम। कहां घर। आदि इत्यादि। औपचारिकता। चालक के बगल में बैठे व्यक्ति ने अपना नाम शायद संजय बताया। घर नालंदा जिला के परवलपुर के सोनचरी।


 हम बिहारी साधारणतः नाम, अथवा पिता का नाम पूछ कर उपनाम से जाति का पता करते है। और यदि यह जुगत काम न आए तो गांव का नाम से भी जाति का पता लग जाता है। 

सो, मेरे गांव का नाम शेरपर जान कर उन्होंने अपनी रिश्तेदारी बताई। मैंने उनके गांव का नाम जानकर, अपने रिश्तेदार का परिचय दिया। और इस तरह, बिना पूछे दोनों एक दूसरे के स्वजातीय का आत्मसात कर लिए। किसी ने किसी से स्पष्ट रूप से जाति नहीं पूछी! 

खैर यात्रा आगे बढ़ी, तो नया बिहार, पुराना बिहार, जंगलराज, संघर्ष और विकास के साथ साथ उद्योग और रोजगार, सबकुछ विमर्श का केंद्र बिंदु रहा। 

चर्चा कि शुरुआत मैंने ही किया। अपनी मातृ भाषा, मगही में। 
पूछा, "कहाँ से आ रहलो..?"
"नेपाल के वीरपुर से।"
"कौची लादले हो.."
"रिफाइन तेल हो.."

इस वार्ता में उन्होंने बताया कि अजीब अर्थव्यवस्था है। बताया कि कुछ केमिकल है जो बिहार से नेपाल जाता है और नेपाल में तेल बनता है फिर उसे बिहार और झारखंड इत्यादि में बेचा जाता है। वह समझाने की भी कोशिश कर रहे थे कि यह सब चीज बिहार में भी बन सकता है, परंतु नहीं बन रहा है।

यह भी बताया कि वह 1995 से ही गाड़ी चला रहे हैं। कमाने खाने में लाज कैसा..? 

 बताया कि पहले कहीं भी कोई रोक कर लूट लेता था, मारपीट करता था। आज यह सब नहीं होता है। सड़क की भी बहुत बिहार में अच्छी हो गई है। हालांकि पुलिस की वसूली पहले जितनी तो नहीं होती, परंतु अभी भी यह जारी है।


एक प्रसंग में बताया कि वह लखीसराय जिला के बड़हिया से सन 2000 में गाड़ी चला कर आ रहे थे तो उनकी गाड़ी को दबंगों ने पकड़ लिया और फिर खेत में ले जाकर उससे एक सप्ताह तक फसल की ढुलाई करवाता रहा और फिर जाने दिया।

खैर, मैं सरमेरा में उतर गया। हालांकि अनुभव नहीं होने की वजह से उतरने के क्रम में धड़ाम से सड़क पर गिर गया, बगल में खड़ी कुछ महिलाएं हंसने लगी।


05 अक्टूबर 2026

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने क्या लिख दिया!
इसे शब्दों में लिख पाना कठिन है। हाँ, जो महसूस हुआ, वह बेहद विचलित करने वाला है। इस महीने में पढ़ा गया यह एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम-प्रसंग के माध्यम से उपनिषद के ज्ञान को जिस सहजता से रख देता है, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।

कुछ प्रसंग यहाँ रख रहा हूँ। इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि शायद कोई इसे पढ़कर इस पुस्तक को खरीदने और पढ़ने के लिए प्रेरित हो जाए।

पुस्तक में संन्यास आश्रम से बड़ा गृहस्थ आश्रम बताया गया है।
पढ़ते-पढ़ते समझ आया कि गृहस्थ जीवन निकृष्ट जीवन नहीं है।

आत्मा के प्रसंग में लिखते हैं—
“आँख क्या है? देखने का साधन है। जो देख रहा है, वही आत्मा है।”

“एकांत का ताप बड़ा तप नहीं है।”

"विवाह के माध्यम से पुरुष और स्त्री पूर्णता प्राप्त करते हैं और संसार के सबसे बड़े लक्ष्य—प्रेम—को प्राप्त करते हैं।"

“किसान की स्त्री हूँ, भीख नहीं माँग सकती...?”

“पति की कामना के लिए पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना के लिए पति प्रिय होता है!”

“पत्नी की कामना के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती, अपने आत्मा की कामना के लिए पत्नी प्रिय होती है!”

एक जगह संवाद है—

“आप बिना परीक्षा किए ही कोई बात मान लेते हैं? विचित्र है। यह तो नेयता हुई। यही शूद्र धर्म है।”

यहाँ एक और बात मन को छूती है—

“कोई चिंता नहीं। रास्ता ही रास्ता बता देता है। कुछ करते-करते ही सही ढंग सीखा जा सकता है।”

वर्तमान राजनीति के लिए भी संवाद है,

"तपस्या और स्वाध्याय के क्षेत्र में राजा का किसी प्रकार का दबाव धर्मसंगत नहीं है।"

विवाह के एक प्रसंग में (दहेज) के संदर्भ में संवाद आता है—
“धन-संपत्ति तो छोटे लोगों में देखी जाती है, ब्राह्मण लोगों में तो विद्या और ज्ञान देखा जाता है।”

और प्रेम...
एक ऋषि कुमार अपनी प्रेयसी जबाला का ध्यान करके ही ध्यानस्थ हो जाता है। बस...

जानश्रुति शूद्र राजा थे—यह भी आभास हुआ कि शूद्र भी राजा होते थे।

यह भी समझ आया कि उपनयन संस्कार गुरु अपने शिष्यों का करते थे और इसका जाति से कोई संबंध नहीं था। 

17 सितंबर 2026

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल युपीआई को पहले अंगेजों की चाय की तरह ही लत लगा दी गई। अब आनलाइन चुंगी बसूला जा रहा। इसमें कुतर्कों का जंजाल भी है। आम आदमी उलझा हुआ है। सरकार यही करती है। उलझा दिया तो काम बन गया। साधारण बुद्धि में जो बात समझ में आई है, वह यह है कि आनलाइन चुंगी का भार आम अदमी पर ही पड़ेगा। तर्क, कुतर्क जो हो। कौन क्या कहता है, इसमें नहीं पड़ना चाहिए। आपके साथ क्या होता है, इसे देखिए। जैसे कि रसोई गैस, चीनी इत्यादि का दाम पांच-दस रुपये बढ़ते ही समोसा और मिठाई का दाम व्यापारी डेढ़ गुणा बढ़ा दिया। उनका साधारण सा तर्क होता है, सबकुछ मंहगा हो गया। तो यह तर्क तो कुतर्क ही है कि आनलाइन चुंगी का भार आम आदमी पर नहीं पड़ेगा। व्यापारी हर भार ग्राहक पर ही देतें हैं। यह व्यापार का प्राथमिक नियम है। जिस बड़े दुकान में चाय या ठंढ़ा पिलाया जाता है, उस दुकान का साधारण बुद्धि का ग्राहक भी यह समझता है कि इसका भार भी उसी के उपर जुटेगा।
अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। खैर, मुझे तो याद नहीं कि कब पैसे की निकासी बैंक से की है। मोबाइल होना चाहिए। कई बार खाली जेब लेकर पटना आना-जाना हुआ। अभी पिछले महिना परेशानी भी हो गई। महावीर मंदिर के पास एक साधारण से होटल में भोजन किया। निश्चिंत था की आनलाइन देंगे। देने गया तो कहा गया कि नहीं लेगें। मालिक नहीं है। तब काेई उपाय नहीं सूझा। दुकानदार समझ गया। भला मानस था। बोला कभी दे दिजिएगा। खैर, संयोग से एटीएम पास में था। पर पिन याद नहीं था। बड़ी मुश्किल से पैसे निकाल कर उसे शाम में दे गया। उधर, आनलाइन पैसे की वजह से श्रीमति की अपनी परेशानी है। कहती है कि अब तो जेब खाली रहो हो, कि निकालिओ, ई मोदिया जे करै चित्र- टाल का मछली बाजार

12 सितंबर 2026

अथ श्री नाराज फूफा कथा ..

नाराज फूफा ..
(हास्य व्यंग्य: अरुण साथी)

मुखिया जी ने फिर फेंका है। वैसे तो फेंकने की कला में मास्टर डिग्री और शोध कार्य का प्रमाण पत्र देने वाले विश्वविद्यालय का मुखिया जी प्राचार्य हैं, तब भी इस बार का फेंकना प्रमाणिक हो गया है।
फेंकने की इस कला का प्रदर्शन तो मुखिया जी ने तभी कर दिया था, जब कहा था अच्छे दिन आएंगे..! डेढ़ दशक के बाद इसे लपकने वाले आज कारुणिक क्रंदन कर रहे हैं।

खैर, चाय की चौपाल में खेलावन काका से किसी ने पूछा तो उन्होंने विस्तार से व्याख्या की।

"बच्चा, अच्छे दिन आएंगे" में (मेरा) शब्द गुप्त था। "सबका साथ, सबका विकास" में वोट शब्द गुप्त था। अब कोई इसको नहीं समझता है, तो यह उसका अपना दोष है।


मुखिया जी ने फिर फेंका । दिमागी नक्सली। अब सभी जय जय करने लगे। अब वही दिमागी नक्सली जब नीला रंगदारी और तिलचट्टा अवतार में आए तो उनका अक्षत–चंदन से स्वागत किया।

खैर, अब नाराज फूफा ! 

खेलावन काका कहते हैं, 

"फूफा अर्थशास्त्र के उपयोगिता के ह्रास नियम का प्रमाण है। ठीक वैसे ही, जैसे मार्गदर्शक मंडल।

"पहले जिनके घर में आने पर उनका स्वागत 56 भोग से होता था, आज सूखी रोटी के लिए कोई नहीं पूछता..!"

काका ने संत भाव से कहा,

" बच्चा परिवर्तन ही संसार का नियम है!"

जब भी घर में नया मेहमान आता है, पुराने मेहमान फूफा बन जाते हैं।

काका, मन ही मन बुदबुदाने लगे,
"इस रंग बदलती दुनिया में .."
आज बस इतना ही, बाकी सब ठीक है...

29 अगस्त 2026

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग।

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग। 

यह एक सुखद संयोग रहा कि बिहार योग विद्यालय मुंगेर जाना हुआ । 

आश्रम में प्रवेश से पहले कड़े नियमों को कड़ाई से पालन के बारे में संयोजक चैतन्य मूर्ति और राहुल जी ने सब कुछ समझा दिया था।
हमें अन्नपूर्णा भवन में आश्रय मिला। एक कमरे में तीन यात्री। 

कड़े नियमों से पहले तो यही था कि नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करें। मोबाइल प्रयोग वर्जित है (किसी का मोबाइल जब्त नहीं हुआ)। अपने सारे कार्य स्वयं करने हैं। 


संध्या 7:00 बजे के बाद मौन व्रत का पालन करना अनिवार्य होगा। एक दूसरे के कमरे में नहीं जाना है।

सुबह 4:00 बजे से दिनचर्या शुरू होकर 7:00 बजे संध्या समाप्ति है। इसमें योग, कर्म योग, मंत्र उच्चारण, शवासन , सत्संग, वायु साधना में सहभागी होना है। भजन कीर्तन भी शामिल है। योग आश्रम में किसी भी देवी देवता का चित्र अथवा मूर्ति दिखाई नहीं पड़ा।

पूछताछ में यह जानकारी मिली कि यह आश्रम अंग नरेश राजा कर्ण के दान स्थल पर बना हुआ है। इसे कर्ण चौड़ा कहते हैं । यह पहाड़ी क्षेत्र है।

यही से गंगा स्नान और माता चंडी की आराधना के बाद कर्ण सोना इत्यादि दान किया करते थे। 

खैर, पहले दिन भोजन के बाद कुछ देर आराम के बाद मंत्र पाठ में भाग लेने के लिए बगल के आश्रम में जाना था। 

उसके लिए वहां गाड़ी की व्यवस्था थी। पौने तीन बजे सबको पहुंचना था, सभी पहुंच गए। आश्चर्य लगा कि कैसे हम लोग समय के पाबंद हो गए! 

इसके लिए गंगा के किनारे बने पादुका दर्शन सत्संग पीठ में जाना हुआ ।

यह एक खुला कक्ष था । सभी श्रद्धालु पालथी मारकर बैठ गए। सामने महादेव का एक शिवलिंग स्थापित था। जहां श्रृंगार का काम बच्चे कर रहे थे। पता चला कि इस आश्रम में बच्चों का बाल योगी के रूप में प्रशिक्षण और सेवा की भी व्यवस्था है। 

बच्चों को यहां सभ्यता, संस्कृति, गायन, वादन, चित्रकार इत्यादि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 


फिर देखा कि एक सामान्य से थोड़ा कम कद काठी के गेरुआ वस्त्र धारी संत व्यक्तित्व अलमस्ती में चले आ रहे हैं। उनके माथे पर एक विलायती टोपी थी, हाथ में पानी का थर्मस, चेहरे पर मुकुराहट और हल्की-हल्की सफ़ेद दाढ़ी। 

वे सहजता से कुर्सी पर बैठे। घड़ी देखी। 3:00 बज गए। हरि ॐ तत्सत का उच्चारण किया। सब ने साथ दिया। फिर महामृत्युंजय मंत्र के जाप का शुभारंभ हुआ। इससे पहले किसी भी सहज आसन में बैठने, ध्यान करने का निर्देश मिला।

ध्यान करने के लिए आंखों को बंद करने। आती–जाती सांसों को सजगता से देखने। महसूस करने के लिए कहा गया।

पुनः आंखों के सामने एक ज्योति पुंज की कल्पना करने की बात कही गई। पुनः एक साथ तीन बार ॐ का उच्चारण कराया गया पुनः शांति पाठ। पुनः एक साथ तीव्रता से 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया गया। 

ॐ उच्चारण और महामृत्युंजय जाप के बाद कुछ अन्य मंत्रों का भी जाप कराया गया । ॐ नमः शिवाय का भी जाप हुआ।

इन सब के बाद वहां की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होने लगा। लगा जैसे सभी जगह महामृत्युंजय का नाद गूंज रहा हो। 

अंदर से कंपन होने जैसा ! जैसे यह नाद दूर किसी क्षितिज से जाकर लौट रही है।एक असीम ऊर्जा तरंग। 


फिर लगातार कई प्रकार की ध्यान मुद्राओं का अभ्यास एक साथ हुआ। 4:00 बजे समाप्ति हुई। समाप्ति से पहले शांति पाठ हुआ। 

उसके बाद हमें एक बड़े से कक्ष में ले जाया गया । या कक्ष नहीं कह सकते हैं, एक बड़ा सा टेंट नुमा हॉल । दो बड़े लोहे के पिलरों पर छतरी नुमा टेंट बना हुआ। 

सामने मंच और मंच पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद जी, वायु साधना यज्ञ की तैयारी। 

इससे पहले सत्संग। स्वामी जी का प्रवचन । पर यहां प्रचलित धार्मिक कथा का वाचन , विवरण या विवेचना नहीं। यहां विज्ञान की विवेचना होने लगी। उसी पर आख्यान होने लगा। 

उन्होंने बताया कि वायु एक ऊर्जा है। वायु का मतलब हवा नहीं, ऊर्जा का एक रूपांतरित रूप से है। यही है, तो हम हैं। और कहते हैं कि मेरा शरीर! यह मेरा कौन है? 

फिर समझाया की नासा ने एक ऊर्जा के रूपांतरण पर एक शोध किया जिसमें दुनिया भर के 500 वैज्ञानिकों को शामिल किया गया । उसमें से उनको भी शामिल किया गया, यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं है।

 बताया कि इसमें एक क्वांटम मशीन बनाई गई। यह ऊर्जा को मापता और रूपांतरित कर दूसरी जगह भेज सकता था ।

नासा ने पाया कि इसी मशीन से हम अंतरिक्ष में ऊर्जा भेज कर बीमार वैज्ञानिकों को ठीक कर सकते हैं। बाद में मेडिकल लॉबी ने दबाव में इस पूरे शोध को स्थगित कर दिया। जबकि इससे ऊर्जा के माध्यम से बीमारियों को ठीक किया जा सकता था। 

इस सत्संग की विशेषता यह थी कि इसमें भीड़ नहीं थी। शोर नहीं था। शांति और जिज्ञासा थी।

सभी लोग पालथी मारकर बैठे हुए थे। इसमें विदेशियों की भी बड़ी संख्या थी। 

वहां एक बड़ा टीवी डिस्प्ले भी लगा हुआ था। वही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी विदेशी महिलाओं की टीम के द्वारा ही संभाला जा रहा था। 


हां, सत्संग से पहले कीर्तन हुआ। सामने एक युवती गा रही थी। पीला वस्त्र पहने। आंखों पर चश्मा लगाए। चेहरा पर हल्की मुस्कान और आभा के साथ गंभीरता ओढ़े हुए। 

जब उन्होंने गायन शुरू किया तो उनके शब्द ऐसे गूंजे , जैसे दूर कहीं, किसी ने बांसुरी बजाई हो! कोकिल कंठ! 

उसके बाद स्वामी जी ॐ उच्चारण के साथ ध्यान और शांति पाठ करवाया। फिर महामृत्युंजय का जाप हुआ। 

हां, स्वामी जी ने यह भी बताया कि महामृत्युंजय जाप को वैज्ञानिकों ने क्वांटम मशीन से मापा और चौंक गए। इसकी ऊर्जा फैली और पूरे नगर को अपने प्रभाव में ले लिया। 

खैर, इतनी देर तक पालथी मार कर बैठने की आदत नहीं रहने से लगभग सभी को परेशानी हो रही थी। कुछ बुजुर्गों को कुर्सी पर सुविधा दी गई थी। घुटने और कमर, मेरे भी जवाब दे रहे थे। पर बैठा रहा। 

इसी बीच गौर किया स्वामी जी के बगल में एक पिंजरा था। उसमें एक मकाउ तोता और वहीं बगल में एक बालक भी बैठा रहा ।


आमतौर पर वायरल और बदनाम बाबाओ के मोबाइल , टीवी में बोल, सुनकर कभी किसी से आकर्षक नहीं रहा, पर निरंजनानंद को देखते ही ओजस्विता और दिव्यता का बोध हुआ। एक परमहंस, एक संत और एक संन्यासी से साक्षात्कार हुआ। 

बस पहले दिन की समाप्ति हो गई। 
फिर 6:30 तक भोजन कर लेना है। थाली, ग्लास, कटोरी लेकर पास ही रखना है। 7:00 बजे आवास बंद होना है। यह सब हो गया। फिर एक बैठक हुई। इसमें संयोजक ने अगले दिन की दिनचर्या की जानकारी दी। 

कर्म योग के बारे में बताया गया। कर्म योग। मतलब, सजगता से अपने दैनिक कार्य को करना। 

इसमें सभी को काम बांटे गए। मुझे मुख्य भवन की सफाई का कार्य मिला। शौचालय किसी को भी साफ करनी पड़ सकती है, यह सुनकर कुछ के चेहरे उतर गए। खैर, सब अपने-अपने कमरे में चले गए । किसी से मोबाइल छीनी नहीं गई। क्योंकि चार दिन का सत्र है। एक माह के सत्र में जब्त किया जाता है। मेरे कमरे में रहने वाले सभी ने मोबाइल ऑन किया। घर सूचना दी। और उसमें लग गए।

मैंने घर में कॉल कर सूचना दी। (मुख्य मोबाइल मैं घर पर ही छोड़ आया था। कॉल के लिए एक था) ।और थकान के कारण नींद आ गई। 




25 अगस्त 2026

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय का चार दिवसीय आश्रम प्रवास से लौट आया। जीवन का एक नया अनुभव मिला। जीवन में उन अनुभवों को हमारे जैसा सामान्य आदमी तब तक शत प्रतिशत उतार पाना मुश्किल है, जब तक आदमी हार या थक न जाए। जो इन अनुभवों को जीवन में पहले धारण कर ले, वही संत है। कई थके हारे लोग आश्रम में मिले। सेवानिवृत..के बाद ..!

खैर, आश्रम में डिजिटल डिटॉक्स, मेंटल डिटॉक्स और फिजिकल डिटॉक्स हुआ। चार दिनों तक बिना मोबाइल रहा। 

बिना मोबाइल भी जीवन जिया जा सकता। न कोई सेल्फी की होड़। न रील बनाने की प्रतिस्पर्धा। बस सबकुछ अपने लिए। 

आज के दौर में यह मुश्किल है, पर अब इसी की जरूरत है। 

आश्रम में बहुत कुछ सीखा। बहुत कुछ अनुभव हुआ। कुछ कुछ अनुभूति हुई। और सबसे विशेष, स्वामी निरंजनानंद जी से स्नेह मिला। यह अतुल्य और अकल्पनीय रहा। 

स्वामीजी कौन है? यह सवाल मन में उठेगा तक भी इसका जवाब इस इंटरनेट की दुनिया में कम ही मिलेगा। आज अधजल गगरी, छलकत जाए वाले वायरल बाबाओं का दौर है। 

इस दौर में स्वामी निरंजनानंद जी चुपचाप योग और मंत्र विज्ञान पर शोध और साधना कर रहे। दुनिया स्वामी जी के शोध और साधना का लोहा मान चुकी है। पर हम बिहार के लोग, अपने घर में इतनी बड़ी उपलब्धि होने के बाद भी उसका सम्मान नहीं कर रहे। 
खैर, आश्रम प्रवास में 4 बजे से 7 बजे, योग, ध्यान, मंत्र, साधना, कर्म योग (साफ सफाई) जैसे गुरुकुल जीवन का अनुभव मिला। दुनिया के कई देशों के लोग यहां प्रवास करते मिले। 

और इसी में जाना कि जो शारीरिक योग हम करते है, वह योग का दस प्रतिशत हिस्सा ही है।

बस, इतना ही। बाकी बातें फिर कभी



17 अगस्त 2026

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

लखीसराय के अशोक धाम में तीसरे सोमवारी भगदड़ मचाने से आधा दर्जन से अधिक की मौत हो गई। धर्म स्थलों में अब अपार भीड़ है।
नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार हो जाती है। कुंभ, नालंदा शीतला मंदिर, अशोक धाम, यह लंबी सूची है। आम तौर पर इसके लिए प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया जाता है। 

परंतु इसमें श्रद्धालुओं का अधीर होना, सबसे बड़ा कारण है। जल्दी से पूजा कर लें, इसके लिए हम, सब कुछ करेंगे। 

आज 3:30 बजे जग कर जल्दी जल्दी तैयार होकर, सपत्नीक  पंचबदन स्थान शिव मंदिर गया। पिछले सोमवार से अधिक भीड़। डेढ़ घंटा लाइन में लगे। जब नजदीक पहुंचने को थे तो कई लोग जबरन प्रवेश कर रहे थे। मेरे पीछे भी एक आकर लग गया। डांट कर कहा, " यह कैसा धर्म ? तो दांत निपोर दिया। पुलिस का एक जवान था, बोले तो उसने भी कहा, क्या करें सर, आप लोग ही कहते है, रहने दीजिए, तभी होता है...!

महिला पंक्ति में कई महिलाएं जबरन धक्का मुक्की कर के प्रवेश कर गई...! सभी जगह पुलिस संभव नहीं...!

हम, घंटों लाइन में लगे लोगों को धकिया के घुस जाएंगे। पहुंच, पैरवी, रसूख , का उपयोग करेंगे। 


और फिर जोर, जबरदस्ती भी। वहीं, जब भगदड़ होगी तो किसी की लाश से गुजर कर हम पूजा करने से गुरेज नहीं करते..! जब कोई शव यात्रा से आयें तो महिलाएं बिना स्नान धर प्रवेश करने नहीं देती, तो फिर यहाँ..? हम, और हमारी धार्मिकता...?

न धीरज, न संवेदना, न सेवा, न सहयोग...फिर धर्म कहां ? भगवान कहां...? और फिर, रील और सेल्फी कल्चर से भीड़ , भेड़िया धसान है...

12 अगस्त 2026

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

देहाती कहावत है। और यह अभी सावन में भी चरितार्थ है। तीखी गर्मी है। सबकी अपनी अपनी समस्या है। किसान परेशान है। 
"रोपनी अब दु कट्ठा भी नै रोपो हो। पहले चार कट्ठा रोप दे हल। रोपनी मिले में भी मुश्किल हो। और ई लहा–लोट रौदा हो..की रोपा होत, रोपनी भाग गेल..!"
रोपनी की अपनी समस्या है। 

" खेत के पानी खल–खल करो हो। एक घड़ी गोर रख के देख लहो, खाल उतर जैतो...? "

और वातानुकूलित कक्ष से धान रोपनी का प्रतिशत बढ़ाने पर रोज मंथन हो रहा। अधिकारी लक्ष्य पूरा करने के लिए नीचे के कर्मी को हड़का रहे। 

वहीं सावन में वर्षा बहुत कम हो रही। 

पर एक सुखद समाचार यह है कि अब पिछले एक, डेढ़ दशक से किसान धान की रोपनी के लिए पूरी तरह वर्षा पर निर्भर नहीं है। अब हर खेत, खंधा में समर्सिबल बोरिंग है।  ट्रांसफार्मर और बिजली है। इसलिए धान का रोपा हो जाता है। 

मजदूर एक बड़ी समस्या है। रोपनी मिलना अब मुश्किल है। 

इसीलिए बड़े किसान अब सहरसा से रोपना (पुरुष) लाते है। उसके रहने, खाने की व्यवस्था देते है। वह बहुत काम निकालता है।

और हां, खेत की मेड़ तक बिजली पहुंचाने की योजना का शुभारंभ मनमोहन सिंह की सरकार ने ही किया था। मुझे अच्छे से याद है। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना। बस इतना ही, बाकी सब ठीक है।

30 जुलाई 2026

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारने की क्षमता में है। इसमें गलतियां होती हैं, सरकारें असफल भी होती हैं, फैसलों पर सवाल भी उठते हैं। लेकिन इन सबका समाधान संविधान, कानून और चुनाव की प्रक्रिया में निहित है। यदि इनकी जगह भीड़ निर्णय लेने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाता है। आज भारत इसी चुनौती के एक कठिन दौर से गुजरता दिखाई देता है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध का अधिकार नागरिकों की सबसे बड़ी ताकत है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब विरोध प्रदर्शन हिंसा, धमकी, सार्वजनिक अपमान, संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव और कानून को चुनौती देने का माध्यम बनने लगे, तब यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रह जाता। यह भीड़ के दबाव से व्यवस्था को झुकाने का प्रयास बन जाता है। दुनिया के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि भीड़ कभी स्थायी समाधान नहीं देती। बांग्लादेश की हालिया घटनाओं ने दिखाया कि जब भीड़ सत्ता और संस्थाओं पर हावी होती है, तब सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं टूटती हैं। क्रांति का रोमांच क्षणिक हो सकता है, लेकिन संस्थाओं का क्षरण वर्षों तक राष्ट्र को अस्थिर करता है। भारत का लोकतंत्र भी इस समय कई दिशाओं से दबाव झेल रहा है। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन उसी मंच पर भीड़ की मनोवृत्ति भी तेजी से विकसित हुई है। किसी भी मुद्दे पर कुछ घंटों में भावनाओं का ऐसा उबाल पैदा कर दिया जाता है कि तथ्य और तर्क पीछे छूट जाते हैं। ट्रेंड, ट्रोल और वायरल संस्कृति कई बार विवेक पर भारी पड़ती दिखाई देती है। यह भी सच है कि इस स्थिति के लिए केवल भीड़ को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। लोकतंत्र संवाद पर चलता है। संवाद की कमी अविश्वास पैदा करती है और अविश्वास आक्रोश को जन्म देता है। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समय पर स्पष्ट संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाई जाती तो शायद स्थिति इतनी विस्फोटक नहीं बनती। जनता केवल निर्णय नहीं, उसका तर्क भी सुनना चाहती है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता को विश्वास में लेना भी है। जितना अधिक संवाद होगा, उतनी ही कम अफवाहें और उत्तेजना फैलेंगी। चुप्पी कई बार विपक्ष से अधिक नुकसान सत्ता को पहुंचाती है। दूसरी ओर, विपक्ष की भी समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन उसका माध्यम चुनाव है, न कि भय, अराजकता या संस्थाओं को अस्थिर करने की राजनीति। यदि हर असहमति का उत्तर भीड़ के दबाव से खोजा जाएगा, तो कल कोई भी सरकार सुरक्षित नहीं रहेगी और कोई भी संस्था स्वतंत्र नहीं बचेगी। चिंता केवल सरकार की नहीं है। चिंता उन संवैधानिक संस्थाओं की भी है, जिन पर लोकतंत्र टिका है। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और सुरक्षा बल। इन संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इन्हें अविश्वसनीय बनाने का सुनियोजित प्रयास अंततः पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान है। यही संविधान सरकार को सत्ता देता है और जनता को उसे बदलने का अधिकार भी देता है। इसलिए लोकतंत्र में अंतिम फैसला भीड़ नहीं, मतदाता करता है। सड़क पर जुटी भीड़ क्षणिक उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य मतदान केंद्र तय करते हैं। आज आवश्यकता किसी एक दल या विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा की है। सरकार अधिक संवेदनशील और संवादशील बने, विपक्ष अधिक जिम्मेदार बने और नागरिक यह समझें कि लोकतंत्र की रक्षा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि संयम और संवैधानिक आचरण से भी होती है। लोकतंत्र की कमियां लोकतंत्र ही दूर कर सकता है। भीड़तंत्र केवल व्यवस्था को अस्थिर करता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में संस्थाएं भीड़ के आगे झुकीं, वहां अंततः लोकतंत्र ही सबसे बड़ा पराजित हुआ।

28 जुलाई 2026

छात्र आंदोलन में भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

मुझे पहले दिन से ही लग रहा था कि फेसबुक, इंस्टा जैसी कंपनी भारत में हो रहे छात्र आंदोलन को हवा दे रही है। सोशल मीडिया पर शांतिपूर्वक चीजों को देखने और समझने वाले लोग इसे समझ सकते हैं। 
छात्र के आंदोलन को पुलिस के द्वारा छात्रों की पिटाई को काफी बर्बर तरीके से और खूब तेजी से वायरल किया गया । हर किसी के फीड में केवल और केवल इसे ही दिखाया जाता था। यह फेसबुक के एल्गोरिथम के द्वारा जानबूझकर किया गया।

उसे हर किसी को दिखाया गया परंतु छात्र आंदोलन को शांत करने के प्रयास को, छात्र आंदोलन में घुस आए उपद्रवियों के द्वारा किए गए उपद्रव और अराजकता को दबा दिया गया।

 उसके रीच को घटा दिया गया। और यह बात पूरी तरह से तब प्रमाणित हो गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी वीडियो को प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है परंतु इस पर और कड़ाई से संज्ञान लेकर सजा देने की जरूरत है। इस देश को, कमजोर करने, गिराने में पूरी दुनिया की ताकत लगी हुई है.. हमें इसे समझना होगा... अफसोस की कथित जेन जी इस साजिश का हिस्सा बन जाते हैं..

21 जुलाई 2026

गुस्सा तो बहुत है.... संसद के आगे हंगामा...

गुस्सा तो बहुत है....

अभी तो लगता है, यार लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन, आमरण अनशन, उग्र–प्रदर्शन, हल्ला–हंगामा.. लाठीचार्ज, पथराव, आंसू गैस सब लोकतांत्रिक है, देश द्रोह नहीं है...! कभी ये सीमाओं में रहेगा, कभी सीमाएं ऐसे टूटेगी, जैसे सैलाब आया हो...! कल संसद के आगे सैलाब दिखा..!
और, कभी कभी लगता है मोदी सरकार भी निष्ठुर है। किसी की नहीं सुनती। पेपर लीक पर चुप्पी । दूसरी बार नीट परीक्षा लिया पर पेपर लीक करने वालों पर ठोस कार्रवाई नहीं दिखी..! और यार, बातचीत ही तो लोकतंत्र है, फिर..?
और, अभी तो यह भी लग रहा कि बीजेपी की सरकार, बोलने की आजादी छीन रही है। बिहार में सोशल मीडिया पर अभद्रता के लिए अब गुंडा एक्ट लगेगा..?

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चुप्पी। बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी, फिर उधव ठाकरे, आम आदमी पार्टी का संसद इत्यादि की पार्टी को हाईजैक करना। 

कभी कभी लगता है कि मीडिया पर अंकुश क्यों लगाया गया..? 

कभी कभी लगता है, सोनम वांगचुक सज्जन है। जैसे अन्ना हजारे थे। पर वे राजनीतिक साजिश का शिकार नहीं होंगे, क्या गारंटी है..?

और, अभी तो यह भी लगता है, देश का विपक्ष, धूर मोदी विरोधी, श्री लंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह देश के जेन जी को करने के लिए लगातार भड़का रहा है, कहीं भड़क गए तो..?

कभी कभी लगता है, अपना देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है। यहां सर्व सम्मत नहीं है, यहां बहुमत है। इसका मतलब, आधे से कुछ कम लोग सरकार को नापसंद करते है..। 

कभी कभी लगता है, यार बात बात पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार, पेपर लीक, चढ़ावा चोरी को गंभीर अपराध नहीं मानती इसीलिए तो बुलडोजर भी मौन है..!

कभी कभी यह भी लगता है कि जिस देश पर ऐसे ही इतना बोझ है उसपर महिला आरक्षण के बहाने दोगुना सांसदों का बोझ डालने का प्रयास तो सरासर अन्याय है..! और यह अन्याय राष्ट्रवाद के नाम पर तो और असहनीय है..!

कभी कभी तो यह भी लगता है कि यार, इसरो जैसे संस्था से 100 से अधिक वैज्ञानिक छोड़ कर चले गए, क्या अब देश में व्यापार ही होगा, जन सरोकार कुछ नहीं..! 

कभी कभी लगता है, यार इस देश में बुलेट रेल और साधारण रेल के डिब्बे की असमानता की खाई को कौन मिटाएगा..? 


और देश की पूंजी पर कुछ व्यापारिक घरानों के कब्जे और गीगा वर्कर बन रहे युवा पीढ़ी को कौन संभालेगा..? 

देश में बढ़ रहे मॉल कल्चर और बेरोजगार होते छोटे व्यापारियों की, क्या कोई नहीं सुनेगा..?

अक्सर यह लगता है कि गंभीर बीमारियों में आम आदमी के लिए एम्स सहित बड़े अस्पतालों में बेड नहीं है और मॉल रूपी निजी अस्पताल में इलाज करवाने की जगह, आम आदमी मौत को ही चुनना पसंद करता है..।

कभी कभी यह भी लगता है कि अब तो मॉल रूपी विश्विद्यालय कल्चर है। इसमें तो इंटर के बाद आम आदमी अपने बच्चे को पढ़ा ही नहीं पाएगा.. और जन सरोकार की शिक्षा व्यवस्था को शनै शनै मृतप्राय बनाया जा रहा है..!

अभी तो यह भी लगता है कि यार अपनी बाइक का माइलेज कम हो गया, और सरकार इथेनॉल वाले तेल के झूठे दावे किए जा रही है। वहीं कोई सच बोले तो उसे दबा दिया जाता है..!

कभी कभी लगता है, यार भरत तिवारी तो गरीबों के लिए लड़ रहा था, उसे मार दिया गया..? 

और उन सब के बीच यह भी लगता है, यार अन्ना हजारे के बहाने देश ने वेगनआर गाड़ी वाले केजरीवाल को मौका तो दिया। कहा, राजनीति बदलनी है, वही बदल गया। 


और अंत में यही लगता है, यार अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहा दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के साथ देश को क्यों खड़ा होना चाहिए..? जिसमें मुख्य न्यायाधीश के उस कड़के सच को, जिसमें उन्होंने कहा था, 

" फर्जी डिग्री वाले बेरोजगार कॉकरोच की तरह है..!"

और दीपके इसी बहाने खुद को भीमवादी बता कर,  
भावनाओं को भड़का के, राजनीति कर सकता है, तो उसपर कैसे भरोसा करें..?

बहुत उथल पुथल चल रहा है। बहुत

07 जुलाई 2026

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

मंदिर में चढ़ावा चोरी की चर्चा गांव चौपाल में चर्चित है। गांव चौपाल में किसिम किसिम के लोग आते हैं। मसूदन बा  पुराने पार्टी के खांटी समर्थक हैं। अब 10 साल से कोई उनको बोलते नहीं देता था। 
जब भी सरकार की कमी निकालते, सब उनको उल्लू धुत्तू करके  लोलिया देता। 

अब मंदिर में चढ़ावा चोरी हुई तो मसूदन बा को मौका मिल गया। चौपाल में वे सीधा कट्टर भगत माहो दा पर धावा बोल दिए। 

"की हो महेंद्र , देख लेलहीं ने तोर धर्मात्मा पार्टी के हाल की हउ.. ई तो भगवानों के घर में चोरी कर लेलको ...?"


माहो दा बेचारे चुप हो गए । पहले जब भी कोई आरोप लगता , वे पुरानी सरकार और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत जीवन की कुंडली निकाल कर रख देते ..!

अब मसूदन बा रोज हल्ला करने लगे..। आज khe काका आ गए। मसूदन बा ने बात छेड़ी ..।

"बताहो तो आजकल लोग भगवानों के चढ़ावा चोरी कर ले हो ..! कलजुग हो, कलजुग..!


खेलावन काका ऐसे भड़के जैसे किसी ने बिगड़ैल कुत्ते को ढेला मार दिया हो...!

"आयां हो मसूदन ... , तों तो आय तक एगो चमन्नी नै देल्हीं हैं,  उल्टे तों तो भगवान के मानवे नै करों हीं त तोड़ा कहा ले उल्टी हो रहलो हैं..!" 


मंदिर हम्मर ! चढ़ावा हम्मर। चोरी करे वाला हम्मर अप्पन..!  तोर बाउजी के की 

मसूदन बाबू खुश हुए तीर निशाने पर लगा है 

तब बोर्ड लगवा दो हो सूचना मंदिर में दिए गए चढ़ावा को चोरी करने का सर्वाधिक कार्य सुरक्षित है कृपया बाहरी लोग इसमें हस्तक्षेप ना करें धन्यवाद...!
(नोट: यह एक व्यंग्य रचना है)

06 जुलाई 2026

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए, जीवन यात्रा के लिए

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए

मैच में जीवन का अनुभव मिलेगा। कभी भी कोई फॉल कर देगा। कभी येलो कार्ड दिखा कर जीवन संघर्ष में सतर्क होने की चेतावनी मिलेगी। कभी भी अचानक अपनी गलती अथवा गलती से हुई गलती से  रेड कार्ड मिल जाएगा और आप खेल से बाहर। 
पर। खिलाड़ी, निराश नहीं होता। गिव–अप नहीं करता। खेल है। जीवन है। जीवन एक खेल है। 
और, सब कुछ अच्छा, जरा सी गलती और पेनल्टी...! खेल खत्म होने की संभावना, पर सेकेंड के हजारवें हिस्से से खेल बचा लिया जाएगा..!

और सेकेंड के हजारवें हिस्से से हारी बाजी जीत सकते है। जीती बाजी हार सकते है..!

सब कुछ अनिश्चित..! और महाभारत  में अर्जुन ने सिर्फ लक्ष्य (मछली) की आँख देखा, यह पुरानी बात है ! अभी फुटबॉल में खिलाड़ी को सिर्फ लक्ष्य (फ़ुटबॉल) को देखते हुए देखिए..!

और, मैदान में 90 मिनट का खेल केवल 90 मिनट का नहीं होता। 365 दिन 24*7 निरंतर अभ्यास से यह सीखना कि कैसे हार से हारना नहीं चाहिए। जीत का गुमान नहीं करना चाहिए...सबकुछ...!

और टीम भावना  से जीत मिलती है, सीखिए...! और खेल के पीछे एक गुरु होता है। कोच..! वही तो गलती बताता है। गलती सुधारता है। गलती पर डांटता है..! 

कितना कुछ होता है खेल में। एकदम जीवन की तरह..! 

देखिए तो आंसू को। जीत की खुशी का आंसू, हार के दुख का आंसू...!

और, जीत का जश्न... सच्चा आनंद...सबकुछ सर्वोच्च शिखर पर...

आह, जीवन भी तो एक खेल ही है...खेल का मैदान है...

08 जून 2026

काव्य की स्वर लहरी

काव्य की स्वर लहरी दैनिक जागरण की काव्य संध्या में और हास्य, व्यंग, श्रृंगार, वीर रस और जन सरोकार के कवियों ने जिस तरह काव्य की स्वर लहरी बिखेरी वह अतुल्य था।
दिनकर की कर्मभूमि शेखपुरा की धरतीके सुधी श्रोताओं ने जिस आनंद से लगभग आधी रात तक टिक कर कविता का हृदय से आनंद लिया यह अपने आप में विभोर करने वाला रहा। साहित्य अनुरागी सुधी श्रोताओं की करतल ध्वनियों के निनाद ने इस काव्य संध्या को संगीतमय, अविस्मरणीय काव्य संध्या बना दिया। दैनिक जागरण मीडिया मार्केटिंग के मित्र प्रिंस जी ने कवियों का बेहतरीन संयोजन किया। इस वजह से एक मिनट के लिए भी श्रोता अलसाये नहीं। उमंग, ऊर्जा से भरकर करताल निनाद गूंजता रहा। काव्य पाठ में सभी कवि वृंद साहित्य और काव्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर तो थे ही, सभी अपने अपने शब्दों, प्रस्तुतियां और भावों से सम्मोहित करने वाले रहे। हास्य कवि अमित शुक्ला ने बूढ़ों की शादी पर प्रतिबंध की मांग ऐसे उठाई जैसे सभी के दुखती नस को दवा दिया हो। लोग ठठाते रहे। स्वयं श्रीवास्तव ..! वाणी में सरस्वती का बास । सबको झंकृत कर दिया। अशोक चारण जी ने राजस्थान के वीरता के प्रतीक को मंच पर ही जीवंत कर दिया। नीट पेपर लीक को लेकर सरकार पर व्यंग वाण और राष्ट्रवाद की धारा साथ साथ बहा दी। और नीलोत्पल मृणाल जी, मुरैठा कवि । गांव का मुरैठा विद्रोह और श्रम शक्ति का प्रतीक है। खेत में बैल से हल जोतते हुए किसान के सिर पर हमेशा मुरैठा रहता था। जब गांव में किसी बात से विवाद हो अथवा प्रतिकार, विद्रोह हो और आउ त आउ हो जाये, तो सबसे पहले मुरैठा बंधाता है। मृणाल जी ने अपनी वाणी की अप्रतिम ऊर्जा से इसी विद्रोह को शब्द से साधकर सिंह गर्जना की। सबको अभिभूत कर दिया। और आदरणीय डॉक्टर सरिता जी... मित्र गणनायक जी ने उनके लिए माँ सरिता लिखा है बस..... कवि सम्मेलन की इस महती जिम्मेवारी को मंच पर उतारने में सहयोग करने वाले सभी का हृदय से आभार...

20 मई 2026

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी रावणेश्वर महादेव की नगरी देवघर यात्रा पर अचानक जाना हुआ। बाबा नगरी 1993 से कई बार पैदल जाना हुआ। एक बार डाक बम भी गया। इतने सालों बाद, अब बहुत कुछ बदल गया। पर बहुत कुछ नहीं बदला है। सबसे बड़ा बदलाव शराब का है। दरअसल बिहार में शराबबंदी है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग समूह में शराब पीने देवघर जाते है। इसका असर भी दिखा। दरअसल , हमलोग साथियों से साथ शनिवार की शाम गए और रविवार को लौटने की योजना थी। पर वहां पहुंचने पर होटल में कमरा थोड़ा मुश्किल से मिला।
कारण, शराब। स्थानीय लोगों ने बताया कि बिहार से बड़ी संख्या में लोग शनिवार को शराब पीने आते हैं। रविवार को रहते है। सोमवार को पूजा करके लौटते है। यह हाल है। अपने पंडा जी उदय शंकर (दोरंगी पंडा) जी ने भी नकारात्मक अनुभव दिया। बताया कि उनके होटल में बरबीघा के कई लोग शराब पीकर हंगामा कर चुके है। खैर, हम लोगों को एक होटल मिला। शाम में मंदिर गया। वही पुरानी और टूटी फूटी सड़कें। गंदगी, बदबू ..! संकरी गलियां।
शाम में एक नया अनुभव मिला। वहां लाइव कथक नृत्य और गायन समारोह चल रहा था। अभिभूत करने वाला। देर तक आनंद लिया। पता चला कि देवघर के बड़े कथक नृत्य विद्यालय चलने वाले संजय परिहस्त जी गुरु है। उनके समूह की बच्चियों ने अति उत्कृष्ट कथक की प्रस्तुति दी। मैने गुरु जी को इस महान कार्य के लिए जाकर प्रणाम किया। अगले दिन रविवार। 6 बजे मंदिर पहुंचे। पता चला भारी भीड़ है। पंडा जी शीघ्र दर्शनम का कूपन लाकर दिए और बोले कि इसमें मेरा भी कमीशन रहता है। तब भी तीन घंटे लगे। नहीं बदला तो वहीं पंडा का धन लोभ। मुख्य दरवाजे से पहले एक महोदय बस के कंडक्टर की तरह हर प्रवेश करने वाले से नोट बसूल कर उंगली में फंसा के रख रहे थे और तभी आशीर्वाद दे रहे थे। मैने नहीं दिया। आशीर्वाद नहीं..! खैर, अंदर प्रवेश करते ही दिव्य आभा और ओज का आलिंगन। अपने गुरु और आराध्य भोलेनाथ पर जल अर्पित किया। वहां भी नोट देख कर भगवान को आराम से छूने की व्यवस्था। नहीं देने वाले को किनारे से हटाया जाता। अभी अचानक से एक घटना घटी। एक पंडा जी ने पीठ पर हाथ मारा, आशीर्वाद दिया और सिर में शिव लिंग से उठाकर एक माला डाल दी। फिर बड़े सद्भाव से बोले दक्षिणा, मैं भी स्वतःस्फूर्त एक छोटा सा सहगोग कर दिया। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। क्योंकि आज तक मैने ऐसा नहीं किया था। खैर, शिव की मर्जी, शिव ही जाने...

16 मई 2026

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

यह पालकी है। बहुत पुरानी पीढ़ी को इसका अनुभव होगा। मुझे भी थोड़ा अनुभव है। 1983 में। मैं 10 वर्ष का था। लखीसराय के नंदनामा से जमुई के घोंघसा बारात गई थी। मुकेश दा दूल्हा थे। मैं सहवाला (दूल्हा से साथ एक छोटा बच्चा रहता है) । दुआर लगने के लिए पालकी से गया था। 
खैर , शायद पहले जमींदार भी पालकी से जाते थे। गांव की नई बहु भी पालकी पर आती, जाती थी।

जमींदार को लेकर बरबीघा का अनुभव लिखते हुए दिनकर जी लिखते है, 
" तेउस गांव के जमींदार दोहरा जीवन जीने के आदि थे। गांव से बाहर आने के लिए वे पालकी से निकलते थे और गांव के बाहर निकल कर वे पैदल जाते  थे..!"


खैर, अभी डीजल, पेट्रोल बचाने का आह्वान और फोटो सेशन चल रहा है। वैसे में हाल में ही बरबीघा के पांक गांव में यह चित्र लिया था। दूल्हे को ले जाने के लिए पालकी कहीं कहीं आज भी यह चलन में है। अब लगता है पुराने दिनों लौटना होगा। पहले हम स्वाबलंबी थे। आज नहीं...

14 मई 2026

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

रात्रि में जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, एक भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक समाती चली गई।
एक बारगी चौंक गया। अरे, अभी तो हरसिंगार, रात की रानी इत्यादि में फूल भी नहीं हैं, फिर यह मीठी सुगंध कहाँ से...!

सर उठाया तो मधु मालती, गुलाबी और सफेद पंखुड़ी रूपी आँचल के पीछे से मुस्कुरा रही थी। तब भी मैं इधर-उधर देखने लगा, शायद कोई फूल खिला हो... पर कोई नहीं था।

फिर नासिका को मधु मालती के पास ले गया। अरे, सच में यह तो इसी की सुगंध है...! पहली बार यह जाना। मधु मालती भी इतनी भीनी सुगंध बिखेरती है।

पहली बार इसलिए, क्योंकि आज से पहले इसे गाँव में जंगल-झाड़ में उगा हुआ, खिला हुआ देखता रहा। घर में भी रही तो दृष्टि नहीं पड़ी।

क्योंकि इसे सर्वहारा ही मानता था। पर आज इसे अभिजात्य वर्ग जैसा पाकर विश्वास नहीं हुआ.. आज माना, सुगंध और सौंदर्य सर्वहारा और अभिजात्य में विभेद नहीं करते...

30 अप्रैल 2026

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया दिल्ली ! देश की राजधानी। इसकी लाखों कहानी । एक दिल्ली में अनेक दिल्ली है। हवाई अड्डे से निकल कर कुलीन क्षेत्र की एक दिल्ली है। लुटियंस जोन में एक दिल्ली है। झुग्गी झोपड़ियों में एक अलग दिल्ली। रेलवे स्टेशन पर एक अलग दिल्ली। और प्रेस क्लब में एक अलग दिल्ली..! खैर, बड़े भाई पवन भैया के सानिध्य में प्रेस क्लब जाना हुआ। पहली बार कई चीजों को देखा। एक अलग अनुभूति हुई। जैसे देश की राजधानी के इस हृदयस्थली में देश, विदेश की चिंताओं में उलझते हुए भी घूंट घूंट में चिंता मुक्त होने के कौशल में सभी सिद्धहस्त ..!
अब इस विवरण से इतर, पवन भैया की पुरानी यादें। वर्ष 2005–06 । युवावस्था में पत्रकारिता का जुनून। शिवकुमार दा से पता चला, दिल्ली में जी न्यूज में एक बड़े पत्रकार है, पवन जी। बड़े अच्छे आदमी है। फिर क्या। टीवी का क्रेज उस समय चरमोत्कर्ष पर था। सो। पता लेकर दिल्ली भाग गया। नोएडा फिल्म सीटी। उस समय बसाया जा रहा था। और मुझे कुछ ज्ञान भी नहीं। खैर, पवन भैया से टेलीफोन पर मिले निर्देश का पालन करते हुए बस की सवारी कर नोएडा के आसपास हाई वे पर बस वाले ने उतार दिया। फिर क्या, उमंग चरम। तपती धूप हाई वे नीचे उतरा। फिसल कर गिर पड़ा। दूर दूर तक कोई नहीं था। किसी ने नहीं देखा। संतोष हुआ। पूछते–पछाते पहुंच गया। गार्ड साहब को बताया। वे मैसेज लेकर गए। पवन भैया को पहली बार देखा तो एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ। अरे, ये तो कोई ब्रिटिश है। ये बिहार के कैसे हो सकते हैं! खैर, यह भरम तुरंत टूट गया। "की हाल हो। एत्ते दूर कन्ने आ गेलहो। चलो पहले चाय पी ले जाय।" मगही में एक खनकती हुई आवाज कानों में गूंज उठा तो भरोसा ही नहीं हुआ। यह अत्याधुनिक , प्रभावशाली व्यक्तित्व और यह मगही बोली..! टुकुर टुकुर देखने लगा। साथ चल दिए। जी न्यूज के ऑफ़िस के आगे चारों ओर खेत ही खेत थे। एक चारदीवारी के ऊपर प्लास्टिक देकर एक चाय दुकान चल रही थी। करीब आधा दर्जन लोग सिगरेट के धुएं के साथ चाय की चुस्की ले रहे थे। कोयले के चूल्हे पर चाय खौल रहा था और उसी अनुपात में कई लोगों का मन भी। खौलते हुए मन से लोग कांग्रेस पर उबाल ले रहे थे। मैं समझ गया। सभी पत्रकार ही होंगे..! खैर, चाय पी । फिर बातचीत हुआ। अपनी इच्छा बता दी।
"टीवी में रिपोर्टर बनना चाहते हैं।" तब पवन भैया ने बताया कि वे जी बिजनेस में है। फिर भी में मुख्य न्यूज ग्रुप में प्रयास करेंगे। खैर, वहां से लौट आया। तब से संपर्क बना हुआ है। एक यायावर है पवन भैया, इतना ही। आज पुनः दिल्ली में था। पवन भैया ने प्रेस क्लब बुलाया। मैं पहले पहुंच गया। रिसेप्शन पर बात किया। पहले से निर्देश था। मैं अंदर चला गया। गांव के रिपोर्टर के लिए प्रेस क्लब तीर्थ जैसा है। शाम ढल गई थी। प्रेस क्लब के खुले आकाश में पेड़ के नीचे कई टेबल लगे थे। लोग वहां ठीक वैसे ही आ रहे थे जैसे गोधूली की बेला में चरवाहे गाय के गले की घंटी की टुनुर टुनुर आवाज के साथ कंधे पर लाठी रख कर उसी के ऊपर दोनों हाथ रख, झूमता घर जा रहा हो। हां, एक अलग बात यह कि कई चेहरे ऐसे मुरझाए थे, जैसे शाम में सूरजमुखी का फूल। खैर, पवन भैया आए । इनके साथ भी एक व्यक्ति थे। परिचय कराया। प्रभात जी है। बेगूसराय के । फिर टेबल पर बैठे। "मांस, मछली खा हो..?" "नहीं.." मैने गर्दन डुलाया। पनीर पकौड़ा, आलू पकौड़ा इत्यादि आ गया। और फिर "दारू पीओ हो..." "नहीं..." "दुर्र महराज। तों कौन आदमी हा...प्रभाते नियर !" फिर वे अपने लिए व्हिस्की का ऑर्डर दिए। प्रभात जी और मेरे लिए नींबू शेक। शिप शिप कर चलने लगा। इस बीच कई लोगों से उन्होंने मेरा परिचय कराया। खैर, प्रेस क्लब में नए अनुभव कई हुए। पहला तो यह कि इतनी सज्जनता शराब पिए हुए आदमी को पहली बार देख रहा था। एक दम शांति से। और पहली बार सिनेमा के पर्दे से बाहर सिगरेट के धुएं का छल्ला बना कर बेफिक्र से उड़ाती हुई स्त्री को आँखें मूंद कर शराब की घूंट को गले में उतारता हुआ भी कौतूहल बस, बार बार मुड़ मुड़ कर देख रहा था। फिर दो दिन पवन भैया के यहां रुके..बाकी फिर कभी... बस..

22 अप्रैल 2026

मतलब निकल गया तो...

मतलब निकल गया तो...

महानगरीय संस्कृति में कुछ ज्यादा और वर्तमान मानवीय व्यवहार में कुछ कुछ, कहीं कहीं, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, चलन में है। 
अब पशुओं पर भी यह मानवीय अत्याचार आम है। वह भी उस पालतू के साथ, जिसने आदमी को अपना सबकुछ मान लिया। पालतू कुत्ता के साथ। दिल्ली सहित, महानगरों में यह आम है। कुत्ता को आवारा छोड़ देते हैं। कल दिल्ली के एक पॉश क्षेत्र में यह बहुत दिखा। दुख हुआ।

खैर, उसके कई कारण हो सकते है, जैसे घर, शहर बदलना, कुत्ता का काट लेना.. कुत्ता का बीमार होना, आदि इत्यादि..। तब क्या, हम जिससे प्यार करते हैं, उसे किसी भी कारण से छोड़ देना मानवता तो नहीं है..?

वह भी तब, पालतू कुत्ता अपने पालने वालों के हर खुशी का ध्यान रखता है। उसे अपना मालिक ही सबकुछ लगता है। घर आने पर वह खुशी कोई अपना भी रोज रोज नहीं दे सकता, यह देता है। घर आने का इंतजार, दरवाजे को ताकते रहना, घर आते है नितराने (झूमने) लगना। आदि, इत्यादि। पर इसे दूर से कोई समझ नहीं सकता। प्रेम करके ही प्रेम को जाना जा सकता है।

इसीलिए निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,

"होश वालों को खबर क्या,
बेखुदी क्या चीज है..."

एक निवेदन, शौक के लिए कुत्ता मत पाला करिए। किसी के कहने से भी मत पालिए। मनोरंजन के लिए मत पालिए। कुत्ता पालना एक बड़ी जिम्मेवारी है। परिवार का एक सदस्य बढ़ जाता। और परिवार के सदस्य की देखभाल , प्यार सब कुछ देना पड़ता है। वही फिर लौट कर मिलता है। 

बाकी, पालतू कुत्ते को सड़क पर छोड़ने का पाप, महा पाप है। और कुछ को देखा है, पालतू को सड़क पर छोड़ तो देते है, इसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आप नजर उठा कर देखिए, आसपास...!

इसलिए तो कबीरदास ने कहा है,

"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। 
बिना जीव की साँस से, लोह भसम हो जाय॥"

21 अप्रैल 2026

दिल्ली में हूं...

दिल्ली में हूं...  

(यात्रा वृतांत)

सोमवार को दिल्ली आना हुआ। कल तक के लिए। दिल्ली पहले भी आना हुआ। बीच में कई बार आया। अब दिल्ली बहुत कुछ बदल गया। आज पुरानी बातें याद आ गई।
पहले, शायद 1995 या 96 में पहली बार व्यापार के लिए आया था। पता चला था कि सदर बाजार में स्टेशनरी इत्यादि सामान सस्ता मिलता है। एक सहपाठी वहीं, एक दुकान में काम करता था। आया तो, यादें याद आ गई है।
एक छोटी झलक। जेनरल टिकट से यात्रा कर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद रिक्शे वाले से पूछा तो अनजान समझ कर अनाप शनाप पैसे मांगने लगा। एक एक पैसा कमाना, एक एक पैसा बचाना। 
तब  किसी से पूछा, सदर बाजार किधर और कितना दूर है। उसने बताया। मैं पैदल चल दिया। रास्ते में देखा सड़क के किनारे कई महिला, लड़कियां सज संवर कर खड़ी है। वे पुरुषों को इशारे से बुला रही। गांव का एक युवा को यह बेहद चौंकाने वाला लगा। फिर देखा, कुछ को तो बांह पकड़ कर लड़िकयां साथ लेकर चली गई। 

मैं डर गया। सड़क के दूसरे किनारे से सहमा सहमा जाने लगा। सड़क के दूसरे किनारे से एक महिला ने गंदा इशारा किया और गंदी गाली दी। मैं नजरअंदाज करके तेज कदमों से आगे बढ़ता चला गया। और सड़क पार कर गया। 

पूछता पूछता , सदर बाजार पहुंचा। आज भी याद है। रामअतर सिंह, स्वरूप सिंह की दुकान। बेल्ट, बैग इत्यादि । उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था। 

मेरा सहपाठी संजय राम, वहीं स्टाफ था। देखा कि उसके साथ भी बहुत अपने जैसा व्यवहार था। मुझे अच्छा लगा। 

अब दिल्ली में मैट्रो है। कैब है। बाइक है। रिक्शा नहीं...

भीषण गर्मी में पहले भी दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी, या कम, आज भी वही। आज भी 2 रुपए गिलास पानी बिकता है। कल भी। 

छोला बटुरा पहली बार दिल्ली में खाया था। तब से जब दिल्ली आया जरूर खाता। अब नहीं। 

और हां, तब संजय राम के यहां ही ठहरा था। पहाडगांव में। 

खूब आनंददायक। मोटा मोटा रोटी, और सब्जी बनाकर खिलाता था। जमीन पर गेंद्रा बिछा कर सो जाना। और भोर...! बस, आगे फिर कभी... 


बाकी दिल्ली के कुछ अपनों से बिना वजह मिलने का प्रयास कर रहा... पर डर लगता है कि यहां के भाग दौर की जिंदगी में किसी को परेशान करना भी ठीक नहीं...


बाकी सब ठीक है...